हाईकोर्ट के आदेश के बाद भी नहरों में नहीं छूटा पानी; भड़के कमांड क्षेत्र के किसान

Madhu Manjhi

करौली। करौली के सुप्रसिद्ध पांचना बांध से कमांड क्षेत्र की नहरों में सिंचाई का पानी नहीं छोड़े जाने को लेकर सवाई माधोपुर और गंगापुर सिटी जिले के किसानों का आंदोलन अब बेहद उग्र और आक्रामक रूप अख्तियार कर चुका है। उपखंड के खंडीप गांव में आयोजित हुई एक विशाल ‘किसान महापंचायत’ में हजारों की संख्या में पहुंचे किसानों ने सर्वसम्मति से राज्य सरकार के खिलाफ एक बड़ा मोर्चा खोल दिया है। महापंचायत में किसानों ने शासन-प्रशासन को आगामी 27 जून 2026 तक का कड़ा अल्टीमेटम (समय-सीमा) देते हुए चेतावनी दी है कि यदि तय तारीख तक बांध के मुख्य फाटकों को खोलकर नहरों में पानी नहीं बहाया गया, तो 28 जून को दिल्ली-मुंबई रेल मार्ग पर चक्का जाम कर ‘रेल रोको आंदोलन’ शुरू किया जाएगा। इसके साथ ही, किसानों ने अपनी विधिक मांगों को लेकर कल से ही खंडीप में एक अनिश्चितकालीन सामूहिक धरना भी प्रारंभ कर दिया है।

कृषि मंत्री डॉ. किरोड़ीलाल मीणा के आने पर ही थमेगा गतिरोध

इस महापंचायत को मुख्य वक्ता के रूप में संबोधित करते हुए विधानसभा के उपनेता प्रतिपक्ष एवं गंगापुर सिटी विधायक रामकेश मीणा ने साफ किया कि यह लड़ाई सीधे तौर पर सरकार की संवेदनहीनता के खिलाफ है। उन्होंने कहा कि माननीय उच्च न्यायालय (High Court) द्वारा स्पष्ट आदेश दिए जाने के बावजूद भी स्थानीय प्रशासन दबाव में आकर नहरों में पानी नहीं छोड़ रहा है, जो न्यायिक अवमानना के साथ-साथ किसानों के संवैधानिक अधिकारों का हनन है।

विधायक मीणा ने कड़े लहजे में कहा, “हम क्षेत्र के किसी भी कलेक्टर, एसपी या प्रशासनिक अधिकारी को कोई ज्ञापन नहीं सौंपेंगे। हमारा यह आंदोलन तब तक अनवरत जारी रहेगा, जब तक प्रदेश के कृषि मंत्री डॉ. किरोड़ीलाल मीणा स्वयं इस संकट का स्थाई निवारण करने के लिए ग्राउंड जीरो पर नहीं पहुंच जाते।” इस महापंचायत के दौरान करौली के पूर्व विधायक लाखन सिंह मीणा और टोडाभीम विधायक घनश्याम महर सहित पूर्वी राजस्थान के कई दिग्गज जनप्रतिनिधियों ने मंच साझा कर किसानों की इस मांग को अपना पूर्ण समर्थन दिया।

आंदोलन को लेकर ग्रामीणों में भारी उत्साह; बटुआ पटेल बने महापंचायत के सभापति

खंडीप में हुई इस ऐतिहासिक महापंचायत की अध्यक्षता और विधिक संचालन हेतु बटुआ पटेल कटकड को सभापति तथा श्यारौली के सरपंच तेज सिंह को उप सभापति मनोनीत किया गया। दोनों किसान नेताओं ने समूचे कमांड क्षेत्र के ग्रामीणों से अपनी एकता बनाए रखने की अपील की है।

वर्तमान में धरना स्थल पर ही हजारों किसानों के ठहरने, रात्रि विश्राम करने और सामूहिक रसोई (भोजन) की बेहद चाक-चौबंद व्यवस्था की गई है, ताकि इस तपती गर्मी में भी आंदोलन को लंबा चलाया जा सके। इस दौरान विधायक रामकेश मीणा ने वर्ष 2007 के ऐतिहासिक गुर्जर-मीणा आरक्षण आंदोलन के दौरान शहीद हुए हंसराज मीणा बगलाई की स्मृति में धरना स्थल के समीप एक भव्य स्मारक व मूर्ति बनाने की अधिकारिक घोषणा भी की।

इनसाइड स्टोरी: क्या है पांचना बांध का पूरा माजरा और दो दशकों का विवाद?

पांचना बांध का यह पूरा विवाद मुख्य रूप से ‘कमांड क्षेत्र’ और ‘डूब/गैर-कमांड क्षेत्र’ के स्थानीय किसानों के बीच आपसी हितों और जल विस्थापन के गंभीर टकराव से जुड़ा हुआ है। करौली में भद्रावती, बरखेड़ा, अटमा, मांची और भैंसावट नदियों के संगम पर मिट्टी से बना यह अनूठा बांध अपनी विशेष भौगोलिक बनावट के कारण पूरे उत्तर भारत में प्रसिद्ध है। इस बांध के पानी पर विधिक अधिकार को लेकर दो बड़े पक्ष पिछले दो दशकों से आमने-सामने खड़े हैं, जिनका विवरण इस प्रकार है:

1. कमांड क्षेत्र के किसान (मांगकर्ता पक्ष):

सवाई माधोपुर, गंगापुर सिटी और भरतपुर जिले के अंतर्गत आने वाले सैकड़ों डाउनस्ट्रीम (नदी के बहाव क्षेत्र वाले) गांवों के किसानों का साफ विधिक तर्क है कि इस बांध का मूल निर्माण ही उनके क्षेत्रों की सूखी कृषि भूमि को सिंचित करने और फसलों की पैदावार बढ़ाने के लिए किया गया था। वर्तमान में खरीफ की फसल की बुवाई का समय आ चुका है, ऐसे में फसलों को सूखने से बचाने के लिए नहरों में तुरंत पानी छोड़ना उनके लिए जीवन और मरण का सवाल बन चुका है।

2. डूब/गैर-कमांड क्षेत्र के किसान (विरोधी पक्ष):

दूसरी तरफ, करौली जिले के भराव और डूब क्षेत्र में आने वाले गुड़ला-पांचना क्षेत्र के लगभग 39 गांवों के किसान बांध से नीचे पानी बहाए जाने का पुरजोर विरोध कर रहे हैं। इन ग्रामीणों का कहना है कि जब बांध का निर्माण हुआ था, तब उनकी उपजाऊ जमीनें और पैतृक घर इस बांध के पानी में डूब गए थे। उनकी मुख्य मांग है कि जब तक सरकार उनके 39 गांवों को विशेष लिफ्ट सिंचाई परियोजना के जरिए पानी नहीं पहुंचाती और विस्थापितों को उचित मुआवजा नहीं देती, तब तक वे बांध के फाटकों को खोलने नहीं देंगे।

प्रशासन के लिए अब सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह 27 जून से पहले इन दोनों विरोधी गुटों के बीच किस तरह से सामंजस्य स्थापित कर 28 जून को होने वाले बड़े रेल चक्के जाम को टाल पाता है।

Live Sach – तेज़, भरोसेमंद हिंदी समाचार। राजनीति, राजस्थान से ब्रेकिंग न्यूज़, मनोरंजन, खेल और भारत की हर बड़ी खबर!

Share This Article