अनाज का मोह छोड़ दलहन-तिलहन पर सरकार का फोकस; खरीफ लक्ष्यों में हुआ बड़ा नीतिगत बदलाव

Madhu Manjhi

जयपुर। राजस्थान कृषि विभाग ने आगामी मानसून सीजन को देखते हुए फसल उत्पादन कार्यक्रम खरीफ-2026 के तहत राज्य में बुवाई के विधिक और रणनीतिक लक्ष्यों की आधिकारिक घोषणा कर दी है। इस वर्ष प्रदेश में कृषि उत्पादन को नई ऊंचाइयों पर ले जाने के लिए कुल बुवाई का महत्वाकांक्षी लक्ष्य 1 करोड़ 65 लाख 39 हजार हेक्टेयर निर्धारित किया गया है। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, विभाग का यह लक्ष्य पिछले साल की तुलना में काफी प्रगतिशील है, क्योंकि पिछले वर्ष (खरीफ-2025) राज्य में कुल वास्तविक बुवाई और उत्पादन का आंकड़ा 1 करोड़ 58 लाख हेक्टेयर के स्तर पर सिमट गया था। विभाग ने इस बार समय पर मानसून की दस्तक और पांचना बांध सहित राज्य के विभिन्न सिंचाई बांधों से पानी की उपलब्धता की उम्मीदों के बीच यह बड़ा लक्ष्य तय किया है।

अनाज का रकबा घटा, दाल और तेल बीजों की फसलों को बड़ा प्रोत्साहन

इस वर्ष के बुवाई कार्यक्रम का गहन और खोजी विश्लेषण करने पर एक बड़ा नीतिगत बदलाव सामने आया है। कृषि विभाग ने इस बार पारंपरिक अनाज वाली फसलों के मुकाबले दलहन (दालें) और तिलहन (तेल बीज) की फसलों को बढ़ावा देने की विधिक रणनीति अपनाई है।

विभाग द्वारा जारी फसलवार बुवाई के मुख्य आंकड़े इस प्रकार हैं:

  • अनाज बुवाई का लक्ष्य: इस साल प्रदेश में अनाज (जैसे बाजरा, मक्का, ज्वार) की बुवाई के लिए 59 लाख 22 हजार हेक्टेयर का लक्ष्य रखा गया है।
  • दलहन बुवाई का लक्ष्य: प्रोटीन से भरपूर दालों के उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए दलहन का रकबा 41 लाख 72 हजार हेक्टेयर तय किया गया है।
  • तिलहन बुवाई का लक्ष्य: खाद्य तेलों में आत्मनिर्भरता के राष्ट्रीय संकल्प के तहत तिलहन फसलों के लिए 27 लाख 50 हजार हेक्टेयर भूमि का विधिक लक्ष्य निर्धारित हुआ है।

बुवाई लक्ष्यों का तुलनात्मक और सांख्यिकीय विश्लेषण

पिछले वर्ष के वास्तविक आंकड़ों की तुलना में इस बार कृषि विभाग ने श्रेणीवार निम्नलिखित महत्वपूर्ण और नीतिगत परिवर्तन किए हैं, जो मरुधरा के कृषि परिदृश्य की नई दिशा तय करेंगे:

फसल की श्रेणीखरीफ-2026 का नया लक्ष्य (हैक्टेयर)पिछले वर्ष के मुकाबले बदलाव (हैक्टेयर)रणनीतिक कारण
अनाज (Cereals)59 लाख 22 हजार1 लाख 98 हजार (कम किया)बाजार में मांग-आपूर्ति का संतुलन और पानी का प्रबंधन
दलहन (Pulses)41 लाख 72 हजार1 लाख 25 हजार (ज्यादा रखा)कम पानी की आवश्यकता, मिट्टी की उर्वरता और दालों के दाम
तिलहन (Oilseeds)27 लाख 50 हजार1 लाख 70 हजार (ज्यादा रखा)तिलहन उत्पादन बढ़ाकर खाद्य तेल आयात पर निर्भरता घटाना

क्यों किया गया यह बड़ा बदलाव? जानिए कृषि वैज्ञानिकों का तर्क

‘Expose Now’ की विशेष पड़ताल में सामने आया है कि अनाज के रकबे में 1 लाख 98 हजार हेक्टेयर की कमी करना और इसके विपरीत दलहन-तिलहन के संयुक्त रकबे में 295,000 हेक्टेयर की भारी बढ़ोतरी करना एक सोची-समझी विधिक कृषि नीति का हिस्सा है।

पश्चिमी और पूर्वी राजस्थान के बड़े हिस्सों में भूजल स्तर में आ रही गिरावट को देखते हुए सरकार कम पानी में पकने वाली और सूखारोधी फसलों (जैसे मूंग, मोठ, ग्वार, मूंगफली और तिल) पर फोकस कर रही है। दलहन फसलें हवा से नाइट्रोजन सोखकर जमीन की उपजाऊ क्षमता को प्राकृतिक रूप से बढ़ाती हैं, जिससे किसानों की रासायनिक खादों पर निर्भरता और लागत कम होती है।

साथ ही, सरसों तेल उद्योग के प्रमुख केंद्र जैसे भरतपुर और अलवर में तेल मिलों की विधिक आवश्यकताओं को पूरा करने और किसानों को उनकी उपज का बेहतर बाजार मूल्य (MSP) दिलाने के लिए भी तिलहन का रकबा बढ़ाना बेहद आवश्यक माना जा रहा था। कृषि विभाग ने सभी जिला उप-निदेशकों को निर्देश जारी कर दिए हैं कि वे मानसून की पहली बारिश के साथ ही ग्राम सेवा सहकारी समितियों के माध्यम से उन्नत बीजों और खादों का सुचारू वितरण सुनिश्चित करें, ताकि इस बार 1.65 करोड़ हेक्टेयर के इस महा-लक्ष्य को विधिक रूप से समय पर हासिल किया जा सके।

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