टोंक (राजस्थान): राजस्थान की वीर धरा केवल अपने किलों और महलों के लिए ही नहीं, बल्कि अपने कण-कण में समाए पौराणिक रहस्यों के लिए भी जानी जाती है। टोंक जिले में बनास नदी के तट पर स्थित बीसलदेव मंदिर एक ऐसा ही अद्भुत स्थान है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा संरक्षित यह स्मारक केवल पत्थर की इमारत नहीं है, बल्कि इसका संबंध त्रेता युग और रामायण काल से माना जाता है। किवदंतियों और स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, यह वही स्थान है जहाँ लंकापति रावण ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या की थी।
रामायण काल का साक्षी और गोकर्णेश्वर महादेव की महिमा
इस मंदिर को ‘गोकर्णेश्वर महादेव’ के नाम से भी जाना जाता है। पौराणिक कथाओं और शिव महापुराण के संदर्भों के अनुसार, रावण भगवान शिव का परम भक्त था। जनश्रुति है कि इसी स्थान पर रावण ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए घोर तप किया था। भक्ति की पराकाष्ठा यह थी कि रावण ने अपने एक-एक सिर काटकर शिवलिंग पर अर्पित करना शुरू कर दिया। रावण की इस हठधर्मिता और भक्ति को देखकर भगवान शिव यहाँ प्रकट हुए और उन्होंने रावण को वरदान दिया। चूँकि रावण ने यहाँ अपने शीश चढ़ाए थे और शिव की स्तुति की थी, इसलिए यह स्थान सिद्ध पीठ बन गया।
इतिहास के पन्नों में: राजा बीसलदेव का निर्माण
पौराणिक महत्व के बाद, ऐतिहासिक दृष्टि से इस वर्तमान मंदिर का निर्माण 12वीं शताब्दी में शाकम्भरी के चौहान वंश के प्रतापी राजा विग्रहराज चतुर्थ (जिन्हें बीसलदेव भी कहा जाता था) ने करवाया था। इतिहासकारों के अनुसार, इसका निर्माण लगभग 1153-1163 ईस्वी के बीच हुआ था। राजा बीसलदेव भी भगवान शिव के अनन्य भक्त थे। उन्होंने पुरानी मान्यताओं को देखते हुए इस स्थान पर एक भव्य मंदिर का निर्माण कराया, जो आज वास्तुकला का बेजोड़ नमूना है। मंदिर की दीवारों पर संस्कृत में खुदे हुए शिलालेख आज भी उस दौर की गवाही देते हैं।
जल समाधि लेता मंदिर: बांध के बीच अडिग आस्था
इस मंदिर की सबसे आश्चर्यजनक बात इसकी भौगोलिक स्थिति है। यह मंदिर बीसलपुर बांध के भराव क्षेत्र (Catchment Area) में स्थित है। जब मानसून में बांध पूरा भर जाता है, तो यह प्राचीन मंदिर आधा या कभी-कभी पूरा पानी में डूब जाता है। महीनों तक जलमग्न रहने के बावजूद, इसकी वास्तुकला और पत्थरों को कोई नुकसान नहीं पहुँचा है। जब पानी उतरता है, तो भक्त पुनः यहाँ पूजा-अर्चना के लिए पहुँचते हैं। यह स्थान यह सिद्ध करता है कि राजस्थान की माटी में इतिहास और पुराण एक साथ सांस लेते हैं।
