Satish Poonia BJP: करियर खत्म होने की अटकलों से लेकर J&K और पंजाब के प्रभारी बनने तक, जानें सतीश पूनिया का सियासी सफर

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Dr Satish Poonia | Photo - Live Sach

राजनीति में किसी भी नेता का आकलन उसकी हार या पद छिनने से नहीं, बल्कि उसकी वापसी (Comeback) की क्षमता से किया जाता है। राजस्थान भाजपा की राजनीति में डॉ. सतीश पूनिया का सियासी सफर ‘फिनिक्स पक्षी’ की तरह राख से उठकर आसमान छूने की एक जीवंत मिसाल बन चुका है। मार्च 2023 में जब उन्हें राजस्थान भाजपा प्रदेशाध्यक्ष के पद से हटाया गया था, तब सियासी विश्लेषकों ने उनके राजनीतिक करियर का ‘शोकगीत’ लिखना शुरू कर दिया था। लेकिन मात्र तीन साल के भीतर, पूनिया ने न केवल अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता साबित की, बल्कि आज वे दिल्ली के भीतर पार्टी के एक बेहद मजबूत ‘पॉवर सेंटर’ और संकटमोचक के रूप में स्थापित हो चुके हैं।

प्रदेशाध्यक्ष पद से विदाई और ‘सियासी वनवास’ का दौर

मार्च 2023 में राजस्थान में विधानसभा चुनावों से ठीक पहले सतीश पूनिया को अचानक प्रदेशाध्यक्ष पद से हटा दिया गया था। पार्टी के भीतर की गुटबाजी और नए समीकरणों के चलते ऐसा माना गया कि पूनिया अब हाशिए पर धकेल दिए गए हैं। टिकट वितरण और चुनाव प्रचार में भी उनकी भूमिका को सीमित कर दिया गया था। आलोचकों का मानना था कि एक साधारण किसान परिवार से आने वाले पूनिया का सफर अब खत्म हो गया है। लेकिन, बिना किसी बगावत या बयानबाजी के, पूनिया ने एक अनुशासित सिपाही की तरह संगठन का काम जारी रखा। इसी धैर्य ने उनके राजनीतिक पुनरुत्थान की नींव रखी।

हरियाणा का रण: पूनिया का ‘मास्टरस्ट्रोक’ और ऐतिहासिक जीत

पूनिया की असली परीक्षा 2024 के मध्य में शुरू हुई। आलाकमान ने उन्हें एक ऐसी चुनौती दी, जिसे कई नेता स्वीकार करने से कतरा रहे थे— ‘हरियाणा का चुनाव प्रभारी’। हरियाणा में भाजपा 10 साल की सत्ता-विरोधी लहर (Anti-incumbency), किसान आंदोलन की नाराजगी और पहलवानों के मुद्दे से जूझ रही थी। सारे एग्जिट पोल्स भाजपा की करारी हार की भविष्यवाणी कर रहे थे।

यहीं पर पूनिया के रणनीतिक कौशल ने काम किया। उन्होंने:

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  • माइक्रो-मैनेजमेंट: बूथ स्तर पर रूठे हुए कार्यकर्ताओं को मनाया और पन्ना प्रमुखों को फिर से सक्रिय किया।
  • जाट और गैर-जाट समीकरण: एक जाट नेता होने के नाते उन्होंने जाट बेल्ट (रोहतक, झज्जर, सोनीपत) में डैमेज कंट्रोल किया और साथ ही गैर-जाट वोटों का भी सफल ध्रुवीकरण किया।
  • स्थानीय मुद्दों पर फोकस: राष्ट्रीय मुद्दों के बजाय चुनाव को पूरी तरह से स्थानीय और जमीनी मुद्दों पर केंद्रित रखा। नतीजतन, अक्टूबर 2024 में भाजपा ने हरियाणा में लगातार तीसरी बार प्रचंड जीत दर्ज कर इतिहास रच दिया। इस एक जीत ने पूनिया को रातों-रात आलाकमान की गुड-बुक में सबसे ऊपर ला खड़ा किया।

शानदार प्रदर्शन का इनाम: राज्यसभा और राष्ट्रीय महामंत्री का पद

हरियाणा की फतह कोई तुक्का नहीं थी, बल्कि पूनिया के जमीनी अनुभव का परिणाम थी। भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने उनके इस प्रदर्शन को न केवल सराहा, बल्कि उन्हें इसका बड़ा इनाम भी दिया। पार्टी ने उन्हें राजस्थान से बाहर निकालकर केंद्र की राजनीति में स्थापित किया। उन्हें सम्मानजनक तरीके से राज्यसभा सांसद बनाया गया और संगठन में भारी प्रमोशन देते हुए राष्ट्रीय महामंत्री (National General Secretary) की अहम कुर्सी सौंप दी। यह पद भाजपा के संगठनात्मक ढांचे में सबसे ताकतवर पदों में गिना जाता है।

पंजाब और जम्मू-कश्मीर: आलाकमान के भरोसे की सबसे बड़ी और जटिल परीक्षा

हरियाणा फतह के बाद, 23 सितंबर 2026 को भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन द्वारा जारी नई सांगठनिक सूची में सतीश पूनिया को एक और ‘असंभव’ सा दिखने वाला टास्क सौंपा गया है। उन्हें पंजाब और केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर का प्रदेश प्रभारी नियुक्त किया गया है। इन दोनों राज्यों की नियुक्ति पूनिया की रणनीतिक क्षमता पर आलाकमान के सर्वोच्च भरोसे का प्रतीक है।

  • पंजाब की चुनौती: पंजाब में भाजपा लंबे समय से अपने दम पर पैर जमाने की कोशिश कर रही है, लेकिन किसान आंदोलन के बाद से यहाँ की राह बेहद पथरीली है। एक जाट नेता और किसान पृष्ठभूमि से होने के कारण पूनिया से उम्मीद है कि वे पंजाब के ग्रामीण और कृषि बहुल इलाकों में पार्टी की स्वीकार्यता बढ़ाएंगे।
  • जम्मू-कश्मीर का चक्रव्यूह: जम्मू-कश्मीर में बदलती सुरक्षा स्थितियों, अनुच्छेद 370 हटने के बाद की राजनीतिक अस्थिरता और क्षेत्रीय दलों (NC-PDP) के प्रभाव के बीच पार्टी को एक ऐसे नेता की जरूरत थी जो शांति से, लेकिन मजबूती से संगठन का विस्तार कर सके।

सतीश पूनिया का सफर यह सिद्ध करता है कि राजनीति में धैर्य, सांगठनिक पकड़ और सही समय पर ‘डिलीवर’ करने की क्षमता किसी भी नेता को फर्श से अर्श तक पहुँचा सकती है। जो नेता कभी राजस्थान की राजनीति में दर-दर भटकने को मजबूर माने जा रहे थे, वे आज भाजपा की राष्ट्रीय रणनीति के मुख्य शिल्पकारों में से एक बन गए हैं।

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