‘एकात्म मानवदर्शन’ विकास को केवल आर्थिक नहीं, बल्कि आत्मिक प्रगति से भी जोड़ता है: जे. नंदकुमार

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जयपुर। एकात्म मानववाद के प्रणेता पंडित दीनदयाल उपाध्याय की 110वीं जयंती के उपलक्ष्य में सोमवार को जयपुर में दो दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय शैक्षिक शोध संगोष्ठी का भव्य आगाज हुआ। केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, जयपुर परिसर और पंडित दीनदयाल उपाध्याय स्मृति समारोह समिति के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस संगोष्ठी का मुख्य विषय “पंडित दीनदयाल उपाध्याय: एकात्म मानवदर्शन एवं भारतीय ज्ञान परंपरा” है। विश्वविद्यालय के नूतन सभागार में शुरू हुआ यह आयोजन हाइब्रिड (ऑफलाइन और ऑनलाइन) मोड में संचालित किया जा रहा है, जिसमें देश-विदेश के करीब 300 विद्वान, शोधार्थी और शिक्षाविद् हिस्सा ले रहे हैं।

भारतीय चिंतन देता है सृष्टि और समाज में संतुलन की दृष्टि

उद्घाटन सत्र में मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. श्रीनिवास वरखेडी ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा केवल ज्ञान अर्जित करने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति, समाज, प्रकृति और पूरी सृष्टि के बीच एक संतुलित संबंध स्थापित करती है। पंडित दीनदयाल का एकात्म मानवदर्शन इसी चिंतन को आधुनिक संदर्भों में समझने का मजबूत आधार है।

कार्यक्रम के मुख्य वक्ता एवं प्रज्ञा प्रवाह के राष्ट्रीय संगठन मंत्री जे. नंदकुमार ने दीनदयाल जी के जीवन दर्शन पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि दीनदयाल जी ने विकास को केवल आर्थिक प्रगति तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और आत्मिक विकास से जोड़ा। उनके विचारों में स्वदेशी, आत्मनिर्भरता, सामाजिक समरसता और अंत्योदय जैसे विषयों का महत्वपूर्ण स्थान है, जिन पर आज अकादमिक विमर्श की सख्त आवश्यकता है।

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वैश्विक पटल पर बढ़ रही है भारतीय ज्ञान और संस्कृत की मांग

कार्यक्रम में ऑस्ट्रेलिया से ऑनलाइन जुड़ीं सिडनी संस्कृत स्कूल की संस्थापक व पीआरओ डॉ. मीनाक्षी श्रीनिवासन ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा और संस्कृत का अध्ययन अब भारत की सीमाओं से बहुत आगे निकल चुका है। वैश्विक स्तर पर भारतीय दर्शन के प्रति दुनिया की रुचि तेजी से बढ़ रही है।

समिति के अध्यक्ष प्रो. मोहन लाल छीपा ने बताया कि दीनदयाल जी का चिंतन समाज की वास्तविक आवश्यकताओं से जुड़ा है और यह संगोष्ठी उनके विचारों को अकादमिक व शोध के व्यापक क्षेत्र से जोड़ने का एक अहम प्रयास है। इससे पूर्व, केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय जयपुर परिसर के प्रभारी निदेशक प्रो. श्रीधर मिश्र ने सभी अतिथियों का स्वागत करते हुए शोध और अध्ययन को निरंतर प्रोत्साहित करने के विश्वविद्यालय के उद्देश्यों पर प्रकाश डाला।

दो पुस्तकों का विमोचन, शोधार्थी कर रहे हैं अकादमिक विमर्श उद्घाटन समारोह के दौरान वैचारिक साहित्य को विस्तार देते हुए दो महत्वपूर्ण पुस्तकों— ‘पंडित दीनदयाल उपाध्याय: एकात्म मानवदर्शन एवं भारतीय ज्ञान परंपरा’ और ‘दीनदयाल उपाध्याय विचारितम एकात्म मानवदर्शनम्’ का विधिवत विमोचन किया गया।

इस दो दिवसीय संगोष्ठी में कुल 14 तकनीकी सत्र (प्रतिदिन 7 सत्र) आयोजित किए जा रहे हैं। इन सत्रों में देश-विदेश के विभिन्न विश्वविद्यालयों और संस्थानों से आए शोधार्थी शिक्षा, संस्कृति, अर्थव्यवस्था, समरसता और राष्ट्रचिंतन जैसे समकालीन विषयों पर अपने शोधपत्र प्रस्तुत कर रहे हैं। मंगलवार (22 सितंबर) को तकनीकी सत्रों के पश्चात समापन समारोह आयोजित किया जाएगा, जिसमें इस दो दिवसीय वैचारिक मंथन के प्रमुख निष्कर्षों को प्रस्तुत किया जाएगा।

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