जयपुर। राजनीति में ‘परिवारवाद’ को दीमक बताने वाली और इसे खत्म करने का बड़ा दावा करने वाली भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) राजस्थान में इसी परिवारवाद के पिच पर खुलकर बैटिंग कर रही है। सत्ता, पद और खेल संघों की मलाई बड़े नेताओं के बेटों को परोसी जा रही है, जबकि पार्टी के लिए दरी बिछाने और पसीना बहाने वाला आम कार्यकर्ता आज भी हाशिए पर दर-दर भटकने को मजबूर है। इसका सबसे ताजा और ज्वलंत उदाहरण 29 सितंबर 2026 को होने वाले राजस्थान क्रिकेट संघ (RCA) के चुनाव हैं।
क्रिकेट की सत्ता के जरिए अपनी राजनीतिक चमक बढ़ाने का यह खेल तब सामने आया, जब चुनाव अधिकारी ए.के. पांडे ने आरसीए चुनाव की वोटर लिस्ट और चुनाव लड़ने वाले दावेदारों की फाइनल सूची नोटिस बोर्ड पर चस्पा की। इस सूची ने स्पष्ट कर दिया है कि किस तरह रसूखदार राजनेताओं ने क्रिकेट को अपनी जागीर बनाने की बिसात बिछा रखी है।
क्रिकेट के पिच पर 7 ‘नेता-पुत्रों’ की पैठ
चुनाव लड़ने वाले दावेदारों की फाइनल लिस्ट में ऐसे 7 बड़े नेताओं के बेटों के नाम शामिल हैं, जिनका क्रिकेट के बल्ले या गेंद से कोई वास्ता नहीं रहा है। इनमें से अधिकांश ने कभी स्टेट या नेशनल लेवल पर कोई क्रिकेट नहीं खेला है, लेकिन राजनैतिक संरक्षण के दम पर वे आरसीए की सत्ता में काबिज होने की दौड़ में सबसे आगे हैं। इन नेता-पुत्रों में मुख्य रूप से सत्ताधारी भाजपा के दिग्गजों के बेटे शामिल हैं:
- मोहित यादव: भाजपा विधायक जसवंत यादव के पुत्र
- आशीष तिवाड़ी: वरिष्ठ भाजपा नेता घनश्याम तिवाड़ी के पुत्र
- धनंजय खींवसर: कैबिनेट मंत्री गजेन्द्र सिंह खींवसर के पुत्र
- पराक्रम सिंह: पूर्व मंत्री एवं दिग्गज भाजपा नेता राजेन्द्र राठौड़ के पुत्र
- पवन दिलावर: शिक्षा मंत्री मदन दिलावर के पुत्र
- विक्रम देवासी: राज्यमंत्री ओटाराम देवासी के पुत्र
- प्रेम प्रताप मालवीय: भाजपा नेता महेन्द्रजीत सिंह मालवीय के पुत्र
मंत्री, पूर्व मंत्री और विधायक भी रेस में
नेता-पुत्रों के अलावा, खुद माननीय भी क्रिकेट की पिच पर उतरने को बेताब हैं। इस सूची में पूर्व विधानसभा अध्यक्ष व कांग्रेस नेता सीपी जोशी (जो पहले भी आरसीए अध्यक्ष रह चुके हैं) और वर्तमान भाजपा सरकार में राजस्व मंत्री हेमंत मीणा का नाम भी शामिल है। हालांकि नियमों के अनुसार कोई मंत्री आरसीए का चुनाव नहीं लड़ सकता। इनके साथ ही 4 मौजूदा विधायक— जयदीप बिहाणी और दर्शन सिंह गुर्जर (भाजपा) तथा रतन देवासी और रोहित बोहरा (कांग्रेस) भी चुनाव लड़ने वाले अधिकारियों की सूची में शामिल हैं।
वोटिंग का अधिकार नहीं, फिर भी सत्ता की चाह
आरसीए चुनाव की सबसे रोचक और विरोधाभासी बात यह है कि चुनाव लड़ने का दावा ठोक रहे इन रसूखदार नेताओं और उनके बेटों में से किसी के पास भी ‘वोटिंग’ का अधिकार नहीं है। आरसीए के संविधान के अनुसार, वोट डालने का अधिकार केवल 33 जिला क्रिकेट संघों के सचिवों और दो पूर्व अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों (गगन खोड़ा और पंकज सिंह) को ही है। इसके बावजूद ये नेता पुत्र अध्यक्ष या कार्यकारिणी के अन्य पदों पर काबिज होने के लिए पूरा राजनैतिक रसूख इस्तेमाल कर रहे हैं।
बिना रिकॉर्ड के जोड़े गए 3 नए जिले
इस चुनाव में अनियमितताओं के भी गंभीर आरोप हैं। फाइनल लिस्ट में 3 नए जिले जोड़ दिए गए हैं, जबकि चुनाव अधिकारी के पास पूर्व में हुई वार्षिक आम बैठक (AGM) के कोई रिकॉर्ड ही उपलब्ध नहीं हैं। बिना एजीएम रिकॉर्ड के नए जिलों को जोड़ने का मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा था, हालांकि आपत्तियां खारिज हो गईं और सवाई माधोपुर को कोर्ट के आदेश से जोड़ा गया है।
आरसीए चुनाव की यह गहमागहमी स्पष्ट करती है कि खेलों में राजनैतिक दखलंदाजी चरम पर है। परिवारवाद को कोसने वाले दल जब अपनों को रेवड़ियां बांटते हैं, तो सबसे बड़ी चोट उस आम कार्यकर्ता के मनोबल पर पड़ती है, जो जीवन भर केवल झंडे उठाने के काम आता है।
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