जोधपुर: राजस्थान के जोधपुर में इन दिनों एक विदेशी नागरिक की चर्चा हर जुबान पर है। आयरलैंड के रहने वाले सेवानिवृत्त शिक्षक और पर्यावरणविद् कैरोन रॉन्सले (Caron Rawnsley) पिछले एक दशक से जोधपुर की लुप्तप्राय ऐतिहासिक बावलियों और जलाशयों के संरक्षण में दिन-रात जुटे हैं। स्थानीय लोग उन्हें प्यार से ‘पागल साब’ कहते हैं, क्योंकि 10 साल पहले जब उन्होंने बावलियों से कचरा साफ करना शुरू किया था, तब लोग उनका मजाक उड़ाते थे, लेकिन आज वही लगन उनके लिए सम्मान का प्रतीक बन गई है।

कचरे से पटी बावलियों को दिया नया जीवन
कैरोन 2014 में जोधपुर एक पर्यटक के रूप में आए थे, लेकिन यहाँ की ऐतिहासिक जल संरचनाओं की दुर्दशा देखकर उनका मन पसीज गया। उन्होंने बिना किसी सरकारी मदद के स्वयं कचरा साफ करने का बीड़ा उठाया। उनके प्रयासों से अब तक 10 से अधिक प्रमुख बावलियाँ फिर से जीवंत हो उठी हैं:
- राम बावड़ी: 1538 में राव मालदेव द्वारा निर्मित इस सबसे पुरानी बावड़ी को उन्होंने कचरे से मुक्त कराया।
- गुलाब सागर व झालरा: शहर के केंद्र में स्थित इस ऐतिहासिक जलाशय से उन्होंने टन कचरा निकालकर पानी के प्रवाह को बहाल किया।
- तापी और अन्य बावलियाँ: तापी बावड़ी, सुखदेव तिवारी का झालरा, जाडेजा का झालरा, गोविंद बावड़ी, क्रिया झालरा और महिला बाग झालरा जैसी धरोहरों को उन्होंने अपने हाथों से साफ कर उनका पुराना गौरव लौटाया है।

राष्ट्रीय स्तर पर मिली पहचान

कैरोन के इस निस्वार्थ सेवा भाव ने देश-दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है:
- आनंद महिंद्रा का सलाम: प्रसिद्ध उद्योगपति आनंद महिंद्रा ने सोशल मीडिया पर उनके जज्बे को सलाम करते हुए उन्हें ‘पागल साब’ कहकर संबोधित किया, जिससे यह अभियान राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में आ गया।
- उपमुख्यमंत्री दीया कुमारी: राजस्थान की उपमुख्यमंत्री दीया कुमारी ने भी व्यक्तिगत रूप से उनसे मुलाकात कर उनके जल संरक्षण के कार्यों की सराहना की है।
- युवा पीढ़ी की प्रेरणा: आज जोधपुर के विभिन्न स्कूलों और कॉलेजों के छात्र कैरोन के साथ मिलकर इन बावलियों पर श्रमदान करते हैं और जल विरासत के संरक्षण का महत्व समझते हैं।
मजाक से सम्मान का सफर
शुरुआत में कैरोन जब अपने हाथों से बावलियों से कचरा उठाते थे, तो लोग उन्हें ‘पागल’ कहते थे। लेकिन कैरोन ने हार नहीं मानी। उनकी अटूट लगन और जोधपुर की विरासत के प्रति प्रेम ने धीरे-धीरे लोगों की सोच बदल दी। आज ‘पागल साब’ का नाम न केवल जोधपुर, बल्कि पूरे देश में जल संरक्षण के पर्याय के रूप में लिया जाता है।

युवाओं के लिए बने प्रेरणा के स्रोत
आज जोधपुर के विभिन्न स्कूलों और कॉलेजों के छात्र कैरोन के साथ मिलकर इन बावलियों पर श्रमदान करते हैं। कैरोन इन बच्चों को खुद बावलियों पर ले जाते हैं और उन्हें विरासत व जल सुरक्षा का महत्व समझाते हैं। ‘पागल साब’ का यह अभियान अब राष्ट्रीय स्तर पर जल संरक्षण का पर्याय बन गया है।