नतम मजदूरी रोज़ की ₹285 और कर्मचारी को महीने के ₹240! धौलपुर के आर्थिक शोषण पर भड़का राजस्थान उच्च न्यायालय

Madhu Manjhi

जयपुर। न्याय और आधुनिक प्रशासनिक व्यवस्था का दावा करने वाली सरकार की नाक के नीचे चल रहे बंधुआ मजदूरी जैसे एक बेहद शर्मनाक और अकल्पनीय आर्थिक शोषण का पर्दाफाश हुआ है। राजस्थान उच्च न्यायालय ने वर्ष 1990 से धौलपुर जिले के राजकीय होम्योपैथिक अस्पताल में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी (परिचारक/Attendant) के पद पर लगातार कार्यरत एक पीड़ित कर्मचारी को आज के इस डिजिटल और महंगाई के दौर में भी महज 240 रुपए मासिक वेतन का भुगतान किए जाने पर कड़ा रुख अपनाया है। हाईकोर्ट ने इस अमानवीय लापरवाही को गंभीरता से लेते हुए राज्य सरकार, चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग के प्रमुख सचिव सहित संबंधित उच्चाधिकारियों से विधिक जवाब तलब (Show Cause Notice) किया है।

इसके साथ ही, उच्च न्यायालय ने पीड़ित कर्मचारी को बड़ी अंतरिम राहत देते हुए स्पष्ट आदेश दिया है कि यदि याचिकाकर्ता वर्तमान में अपनी विधिक सेवा में तैनात है, तो आगामी न्यायिक आदेश तक विभाग द्वारा उसकी सेवाएं किसी भी परिस्थिति में समाप्त नहीं की जाएं। माननीय न्यायाधीश आनंद शर्मा की एकलपीठ ने यह ऐतिहासिक आदेश पीड़ित विजय सिंह गोस्वामी की ओर से दायर विधिक याचिका पर प्रारंभिक सुनवाई करते हुए जारी किया।

36 सालों का अंधकार: अधिवक्ता तनवीर अहमद ने अदालत में खोली पोल

अदालत के भीतर याचिकाकर्ता के वरिष्ठ अधिवक्ता तनवीर अहमद ने जब इस प्रकरण के विधिक और सांख्यिकीय दस्तावेज पेश किए, तो न्यायपीठ भी चौंक उठी। अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि याचिकाकर्ता विजय सिंह गोस्वामी की नियुक्ति वर्ष 1990 में धौलपुर के राजकीय होम्योपैथिक अस्पताल में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के तौर पर विधिक रूप से हुई थी। तब से लेकर आज तक (लगभग 36 वर्षों के लंबे सेवाकाल के दौरान) उसे प्रति माह सिर्फ 240 रुपए थमाए जा रहे हैं।

अधिवक्ता अहमद ने तीखा तर्क देते हुए कहा:

“आज के युग में जहाँ एक दिन का गुजारा भी सैकड़ों रुपयों में नहीं होता, वहाँ किसी पूर्णकालिक कर्मचारी को पूरे महीने काम कराने के बदले महज 240 रुपये देना आर्थिक शोषण और मानवाधिकारों के हनन की पराकाष्ठा है। याचिकाकर्ता ने अपनी सेवाओं के विधिक नियमितीकरण (Regularization) और उचित न्यूनतम वेतनमान के लिए पिछले साढ़े तीन दशकों में विभाग के समक्ष दर्जनों बार लिखित प्रतिवेदन (Representations) पेश किए, लेकिन सचिवालय से लेकर जिला स्तर के उच्चाधिकारियों ने 36 वर्ष में आज तक उन पर कोई ठोस विधिक कार्रवाई नहीं की, जो कि एक गंभीर प्रशासनिक अपराध है।”

सरकारी नियमों की धज्जियां: न्यूनतम मजदूरी से भी 30 गुना कम भुगतान

इस पूरे मामले में सबसे बड़ा विधिक विरोधाभास और सरकारी तंत्र की विफलता तब उजागर होती है, जब हम राजस्थान सरकार के श्रम विभाग द्वारा तय की गई मौजूदा न्यूनतम मजदूरी (Minimum Wages) के विधिक आंकड़ों का विश्लेषण करते हैं:

  • सरकारी नियम (अप्रैल 2026): राजस्थान सरकार के नियमानुसार वर्तमान में प्रदेश में अकुशल श्रेणी के श्रमिकों के लिए न्यूनतम मजदूरी ₹285 प्रतिदिन तय है। यानी एक मजदूर को भी महीने में कम से कम ₹7,410 से ₹9,334 के बीच विधिक भुगतान मिलना अनिवार्य है।
  • अस्पताल का क्रूर गणित: इस चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी को प्रतिदिन के हिसाब से महज ₹8 का भुगतान किया जा रहा है, जो कि सरकार के खुद के बनाए विधिक नियमों की सरेआम और बर्बर अनदेखी है।

नियमितीकरण और 36 साल के एरियर (बकाया) की मांग पर अड़ी अदालत

याचिकाकर्ता विजय सिंह गोस्वामी ने अब अदालत की शरण लेते हुए गुहार लगाई है कि उन्हें उनके पद पर तुरंत प्रभाव से नियमित (Permanent) किया जाए। इसके साथ ही, वर्ष 1990 से लेकर अब तक का उनका जितना भी विधिक बकाया वेतन, महंगाई भत्ता और अन्य भत्ते (Arrears & Allowances) बनते हैं, उन्हें ब्याज सहित रिकवर करवाकर सरकार से दिलाया जाए।

हाईकोर्ट के इस कड़े रुख और जवाब तलब के बाद अब राज्य के चिकित्सा एवं स्वास्थ्य मंत्रालय तथा धौलपुर जिला प्रशासन में हड़कंप मच गया है। विधिक विशेषज्ञों का मानना है कि इस मामले में विभाग के कई तत्कालीन और वर्तमान अधिकारियों पर गाज गिरना तय है, जिन्होंने 36 वर्षों तक एक गरीब कर्मचारी की चीख को फाइलों के नीचे दबाए रखा।

Live Sach – तेज़, भरोसेमंद हिंदी समाचार। राजनीति, राजस्थान से ब्रेकिंग न्यूज़, मनोरंजन, खेल और भारत की हर बड़ी खबर!

Share This Article