सीकर। सीकर शहर के रीको (RIICO) औद्योगिक क्षेत्र को बीकानेर बाइपास से सीधे जोड़ने वाली महत्वाकांक्षी सड़क परियोजना को लेकर एक बेहद बड़ी और राहत भरी खबर सामने आई है। पिछले 8 सालों से लालफीताशाही और वन विभाग के सख्त नियमों के बीच फंसी 1.35 हेक्टेयर वन भूमि के डायवर्जन को आखिरकार केंद्र सरकार से हरी झंडी मिल गई है। केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने इस महत्वपूर्ण परियोजना के लिए स्टेज-1 की सैद्धांतिक स्वीकृति जारी कर दी है। यूआइटी (नगर विकास न्यास) द्वारा अब वन विभाग को एक निश्चित राशि जमा कराने और निर्धारित शर्तें पूरी करने के साथ ही इस विवादित जमीन पर 450 मीटर लंबी व 30 मीटर चौड़ी मिसिंग-लिंक सड़क के निर्माण की राह पूरी तरह खुल जाएगी। इस निर्माण के पूरा होते ही सीकर रीको से बीकानेर बाइपास तक की कुल दूरी सिमटकर महज 1230 मीटर रह जाएगी।
इन कड़े नियमों और शर्तों को पूरा करते ही शुरू होगा धरातल पर काम
केंद्रीय मंत्रालय के क्षेत्रीय कार्यालय के एआइजीएफ (AIGF) बालाजी करी की ओर से जारी आधिकारिक स्वीकृति पत्र में पर्यावरण संतुलन को बनाए रखने के लिए कुछ जरूरी शर्तें लगाई गई हैं:
- भूमि हस्तांतरण: वन भूमि की कानूनी स्थिति को यथावत रखते हुए क्षतिपूर्ति (Compensatory Afforestation) के रूप में वन विभाग के नाम उतनी ही गैर-वन भूमि हस्तांतरित करनी होगी। इसके तहत यूआइटी द्वारा नीमकाथाना इलाके में वन विभाग को बदले में जमीन पहले ही आवंटित की जा चुकी है।
- हरित पट्टी का निर्माण: सड़क निर्माण के साथ ही उसके दोनों ओर घने छायादार पौधों का रोपण करना अनिवार्य होगा।
- पर्यावरण संरक्षण: निर्माण के दौरान वन्यजीवों के मूवमेंट और स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र को कोई नुकसान न पहुंचे, इसकी कड़ाई से पालना सुनिश्चित करनी होगी। यूआइटी द्वारा तय राशि और बाकी बची शर्तों की कंप्लायंस रिपोर्ट सौंपते ही दिल्ली से सड़क निर्माण की अंतिम वित्तीय व प्रशासनिक स्वीकृति मिल जाएगी।
साल 2018 से रेंग रही थी फाइल, मास्टर प्लान 2031 का था हिस्सा
सीकर के विकास के मास्टर प्लान 2031 के तहत रीको से बीकानेर बाइपास तक की इस सड़क का शिलापट्ट और शिलान्यास साल 2018 में तत्कालीन सांसद सुमेधानंद सरस्वती द्वारा किया गया था। कुल 1230 मीटर लंबी इस महत्वाकांक्षी परियोजना का अधिकांश सिविल कार्य तो समय पर पूरा कर लिया गया था, लेकिन बीच का 450 मीटर का टुकड़ा वन विभाग की 1.35 हेक्टेयर भूमि के दायरे में आने के कारण अटक गया था। तब से विकास की यह महत्वपूर्ण फाइल यूआइटी दफ्तर से जिला वन विभाग और वहां से जयपुर राज्य मुख्यालय होते हुए दिल्ली में केंद्रीय मंत्रालयों की टेबलों पर धूल फांक रही थी, जिससे शहर का एक बड़ा हिस्सा ट्रैफिक जाम से त्रस्त था।
जनता की आवाज और जन प्रतिनिधियों का दबाव लाया रंग
इस सड़क परियोजना को पूरा कराने और शहर को जाम से मुक्ति दिलाने के लिए स्थानीय मीडिया और प्रबुद्ध नागरिकों ने एक बड़ा समाचार अभियान चलाया था। जनहित के इस मुद्दे की गंभीरता को देखते हुए वर्तमान सांसद अमराराम, पूर्व केंद्रीय मंत्री सुभाष महरिया, विधायक राजेंद्र पारीक और भाजपा किसान मोर्चा के पूर्व प्रदेशाध्यक्ष हरिराम रणवां ने विभिन्न विकास बैठकों सहित वन व प्रभारी मंत्री संजय शर्मा के सामने इस मामले को पुरजोर तरीके से उठाया। इसके बाद स्थानीय डीएफओ (DFO) दीपक कुमार ने भी फाइलों को आगे बढ़ाने में प्रशासनिक तत्परता दिखाई, जिसका परिणाम आज केंद्रीय स्वीकृति के रूप में सीकर की जनता के सामने है।
इस बाईपास सड़क के बनने से सीकर को क्या-क्या होंगे फायदे?
- जाम से स्थाई मुक्ति: वर्तमान में कृषि उपज मंडी, रीको औद्योगिक क्षेत्र और जयपुर रोड की तरफ आने-जाने वाले हजारों भारी वाहनों को विवश होकर मुख्य शहर के बीच से गुजरना पड़ता है। इसके कारण बस डिपो, बजरंग कांटा और राणी सती माता मंदिर इलाके में हर समय भीषण जाम की स्थिति बनी रहती है, जिससे अब मुक्ति मिलेगी।
- ईंधन और समय की बचत: बाईपास लिंक रोड चालू होने से भारी वाहनों का दबाव शहर के मुख्य अंदरूनी रास्तों से पूरी तरह हट जाएगा। इस वैकल्पिक और सीधे रास्ते का उपयोग करने से किसानों, बड़े व्यापारियों, ट्रांसपोर्टरों और आम जनता का न केवल कीमती समय बचेगा, बल्कि भारी मात्रा में ईंधन की भी बचत होगी, जिससे वायु प्रदूषण कम करने में मदद मिलेगी।