जोधपुर। नाबालिग से दुष्कर्म के संगीन मामले में जोधपुर सेंट्रल जेल में आजीवन कारावास की सजा भुगत रहे आसाराम की चिकित्सकीय स्थिति और जेल प्रशासन की जवाबदेही को लेकर राजस्थान हाईकोर्ट से एक महत्वपूर्ण विधिक रिपोर्ट सामने आई है. जस्टिस संजीत पुरोहित की एकल पीठ ने गुरुवार को आसाराम की लगातार गिरती सेहत और विधिक अधिकारों के बीच संतुलन बनाते हुए जेल प्रशासन को उन्हें उचित और समयबद्ध चिकित्सा सुविधाएं मुहैया कराने के कड़े निर्देश जारी किए हैं. माननीय न्यायालय ने अपने आदेश में स्पष्ट रेखांकित किया है कि यदि जेल के भीतर आसाराम की तबीयत अधिक गंभीर होती है, तो उन्हें कड़ी सुरक्षा के बीच आयुर्वेद अस्पताल में स्थानांतरित कर इलाज कराने की विशेष छूट दी जाएगी.
बंद कमरे की सुनवाई और प्रशासन की ढुलमुल पैरवी: बुधवार की अधूरी कहानी
इस संवेदनशील मामले की गहराई में जाएं तो यह विधिक हस्तक्षेप महज एक दिन की सुनवाई का नतीजा नहीं है. इससे पूर्व बुधवार (3 जून) को भी हाईकोर्ट में आसाराम की ओर से उनके वरिष्ठ अधिवक्ताओं— आर.एस. सलूजा और यशपाल राजपुरोहित द्वारा प्रस्तुत याचिका पर तीखी बहस हुई थी, जो समयाभाव और तकनीकी रिपोर्टों के कारण अधूरी रह गई थी.
विधिक सूत्रों के अनुसार, बुधवार को सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने राज्य सरकार और जेल प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए थे. कोर्ट ने सीधे तौर पर पूछा था कि क्या न्यायपालिका द्वारा पूर्व में जारी किए गए आदेशों— जिसमें आसाराम को समय पर आवश्यक दवाइयां, निरंतर डॉक्टरी निगरानी और जेल नियमावली के तहत घर का बना एक समय का सुपाच्य भोजन देने का प्रावधान था— का अक्षरशः पालन हो रहा है या नहीं? राज्य सरकार के विधिक प्रतिनिधि इस पर तुरंत कोई ठोस रिकॉर्ड पेश नहीं कर सके और उन्होंने वास्तविक स्थिति का ब्यौरा देने के लिए न्यायालय से अतिरिक्त समय की मांग की थी.
मंगलवार रात का घटनाक्रम: अचानक बिगड़ी तबीयत और ‘आरोग्यं’ में एंट्री
प्रशासन की इस विधिक कशमकश के पीछे मंगलवार की रात का वह आपातकालीन घटनाक्रम है, जिसने सेंट्रल जेल के सुरक्षा घेरे को हिलाकर रख दिया था. मंगलवार शाम को बैरक के भीतर आसाराम की तबीयत अचानक और अत्यंत संदिग्ध परिस्थितियों में बिगड़ गई. जेल के डॉक्टरों द्वारा प्राथमिक उपचार देने के बाद भी जब स्थिति नियंत्रण से बाहर होने लगी, तो सुरक्षा प्रोटोकॉल को ध्यान में रखते हुए उन्हें तुरंत जोधपुर के ‘आरोग्यं अस्पताल’ के इमरजेंसी वार्ड में भर्ती कराया गया, जहां उनकी कई पैथोलॉजिकल और कार्डियक जांचें की गईं.
विधिक संतुलन: ‘पीड़िता का सम्मान बनाम कैदी के मानवाधिकार’
गौरतलब है कि यह नया आदेश ऐसे समय में आया है जब हाल ही में कोर्ट ने आसाराम को स्वास्थ्य आधार पर पिछले लगभग 2 वर्षों से लगातार मिल रही अंतरिम (टेंपरेरी) जमानत की अवधि को आगे बढ़ाने से साफ इनकार कर दिया था. पिछली सुनवाई के दौरान अदालत ने एक बेहद ऐतिहासिक और मार्गदर्शक टिप्पणी करते हुए साफ कहा था कि ऐसे गंभीर और जघन्य आपराधिक मामलों में किसी भी आरोपी या दोषी के व्यक्तिगत अधिकारों की तुलना में देश की न्याय प्रणाली के लिए ‘पीड़िता का सम्मान, उसकी सुरक्षा और अंतिम न्याय’ कहीं अधिक सर्वोपरि है.
अदालत का वर्तमान आदेश इसी विधिक संतुलन को दर्शाता है, जहां एक ओर जमानत याचिका को खारिज रखकर सजा को बरकरार रखा गया है, तो दूसरी ओर एक कैदी के मूलभूत मानवाधिकारों के तहत उसे जेल मैनुअल और आयुर्वेद के अनुसार उचित इलाज का अधिकार सुनिश्चित किया गया है. अब देखना यह है कि हाईकोर्ट के इस कड़े निर्देश के बाद जोधपुर सेंट्रल जेल प्रशासन और चिकित्सा विभाग आने वाले दिनों में आसाराम की मेडिकल मॉनिटरिंग को लेकर क्या ठोस ब्लूप्रिंट अदालत के समक्ष पेश करता है.