फीस एक्ट बना मज़ाक ! राजस्थान के निजी स्कूलों पर कौन करेगा कार्रवाई ?

Desk

“कागज़ों में अभिभावकों को अधिकार, फिर भी स्कूलों की मनमानी जारी”…
शिक्षा विभाग मौन क्यों ?”

जयपुर। राजस्थान सरकार ने निजी स्कूलों की मनमानी फीस रोकने के लिए वर्ष 2016 में राजस्थान स्कूल्स एक्ट (रेगुलेशन ऑफ फीस) लागू किया था। कानून बनाया गया, समितियाँ बनाई गईं, दंड के प्रावधान जोड़े गए, लेकिन सवाल यह है कि आखिर इतने सालों के बाद भी अभिभावक राहत क्यों नहीं महसूस कर रहे ?
राज्य के हजारों अभिभावकों का आरोप है कि निजी स्कूल आज भी खुलेआम फीस एक्ट की धज्जियाँ उड़ा रहे हैं। यूनिफॉर्म, किताबें, स्मार्ट क्लास, एक्टिविटी, वार्षिक शुल्क और ट्रांसपोर्ट के नाम पर अभिभावकों से लाखों रुपये की अतिरिक्त वसूली की जा रही है।

सबसे बड़ा सवाल ?
क्या शिक्षा विभाग निजी स्कूलों के सामने बेबस है ?

एक्ट क्या कहता है… और क्या हो रहा है ?

फीस एक्ट के अनुसार :

1.स्कूल बिना अनुमति फीस नहीं बढ़ा सकते।
2.पीटीए और स्कूल लेवल फी कमिटी अनिवार्य है।
3.फीस प्रस्ताव 6 माह पहले समिति के सामने रखना होता है।
4.तय फीस 3 वर्षों तक लागू रहती है।
5.स्कूलों को फीस वेबसाइट और नोटिस बोर्ड पर सार्वजनिक करनी होती है।
6.अतिरिक्त फीस लेने पर जुर्माना और रकम वापसी का प्रावधान है।

लेकिन वास्तविकता यह है कि :

1.अधिकांश अभिभावकों को पीटीए की बैठक तक की जानकारी नहीं होती।
2.कई स्कूल फीस कमेटियों को “मैनेज” करने के आरोपों से घिरे हैं।
3.किताबें और यूनिफॉर्म तय दुकानों से खरीदने का दबाव अब भी जारी है।
4.हर वर्ष किसी न किसी नए शुल्क के नाम पर वसूली बढ़ती जा रही है।
5.शिकायत करने वाले अभिभावकों को मानसिक दबाव झेलने के आरोप भी सामने आते हैं।
6.फीस नहीं भरोगे या देरी से भरोगे तो बच्चों को परेशान करेंगे !

कई अभिभावकों ने नाम नहीं छापने की शर्त पर ‘द पब्लिक हब’ को बताया कि स्कूल प्रबंधन के खिलाफ खुलकर बोलना आसान नहीं है।
कुछ मामलों में आरोप लगे कि
परीक्षा रोकने की धमकी दी गई,
ऑनलाइन पोर्टल बंद किए गए,
बच्चों को गतिविधियों से अलग किया गया,
टीसी देने का दबाव बनाया गया।
किसी अन्य स्कूल में एडमिशन की बात की तो टीसी ना देने की धमकी तक दी गई ! हालांकि अधिकांश मामलों में अभिभावक औपचारिक शिकायत करने से भी डरते हैं।

शिक्षा विभाग की कार्रवाई भी सवालों में ?

फीस एक्ट में स्पष्ट प्रावधान होने के बावजूद कार्रवाई के आंकड़े बेहद सीमित दिखाई देते हैं।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कितने स्कूलों की फीस संरचना की जांच हुई ?
कितने स्कूलों पर जुर्माना लगा ?
कितनी अतिरिक्त फीस वापस कराई गई ?
कितने अधिकारियों ने स्वतः संज्ञान लिया ?
यदि कानून प्रभावी है तो अभिभावकों की शिकायतें लगातार क्यों बढ़ रही हैं ?
क्या सिर्फ “कागज़ी समितियाँ” चल रही हैं ?
कानून के तहत बनी समितियों में अभिभावकों की भागीदारी अनिवार्य है, लेकिन कई अभिभावकों का आरोप है कि
चयन प्रक्रिया पारदर्शी नहीं होती,
सामान्य अभिभावकों को जानकारी नहीं दी जाती!
फैसले पहले ही तय होते हैं, फीस निर्धारण में वास्तविक चर्चा नहीं होती।
यदि ऐसा है तो फिर यह एक्ट अभिभावकों की सुरक्षा कर रहा है या सिर्फ औपचारिकता निभा रहा है ?
“कानून में सख्ती, ज़मीन पर नरमी क्यों ?”
फीस एक्ट की धारा 15 के अनुसार
पहली बार उल्लंघन पर ₹50 हजार से ₹2.5 लाख तक जुर्माना,
दोबारा उल्लंघन पर ₹1 लाख से अधिक दंड,
अतिरिक्त फीस वापसी,
लगातार उल्लंघन पर प्रबंधन पद से अयोग्यता तक का प्रावधान है।
फिर भी सवाल वही
अब तक कितने बड़े स्कूलों पर सख्त कार्रवाई हुई ?

द पब्लिक हब’ का सवाल ?

यदि सरकार ने कानून बनाया है तो उसका पालन करवाना भी सरकार की जिम्मेदारी है।
आज अभिभावक पूछ रहे हैं
“क्या शिक्षा व्यवस्था सेवा है या खुला व्यवसाय?”
“क्या फीस एक्ट सिर्फ फाइलों तक सीमित है ?”
“क्या आम अभिभावक की आवाज़ सुनने वाला कोई है ?”
अगर लगातार यही हाल रहा तो राजस्थान में शिक्षा अब केवल पढ़ाई का विषय नहीं, बल्कि आर्थिक संघर्ष का मुद्दा बनती जा रही है।
और जब एक्ट होने के बावजूद मनमानी जारी हो..तो सवाल सिर्फ स्कूलों पर नहीं, सरकारी व्यवस्था पर भी उठते हैं ?

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