‘राजस्थान में संवैधानिक ब्रेकडाउन’: पंचायत चुनाव में देरी पर भड़के अशोक गहलोत, राष्ट्रपति से की दखल की मांग

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राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर की 135वीं जयंती के अवसर पर प्रदेश की भाजपा सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। गहलोत ने स्थानीय निकायों (ULB) और पंचायत चुनावों में हो रही लगातार देरी को ‘लोकतंत्र की हत्या’ और ‘संवैधानिक मर्यादाओं का खुला उल्लंघन’ बताया है।

राष्ट्रपति और राज्यपाल से हस्तक्षेप की अपील मीडिया से मुखातिब होते हुए गहलोत ने कहा कि राजस्थान के इतिहास में यह शायद पहली बार है जब किसी सरकार ने अदालतों के आदेशों को इस तरह दरकिनार किया है। उन्होंने सीधे तौर पर राष्ट्रपति और राज्यपाल से इस मामले में हस्तक्षेप करने की मांग की। गहलोत के अनुसार, जब राज्य सरकार अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों से भाग रही हो, तो संवैधानिक प्रमुखों का दखल देना अनिवार्य हो जाता है।

‘संविधान की धज्जियां उड़ा रही है सरकार’ गहलोत ने कड़े शब्दों में सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए कहा:

“यह केवल चुनाव टालना नहीं है, बल्कि यह संविधान का ब्रेकडाउन है। सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट द्वारा अप्रैल की डेडलाइन दिए जाने के बावजूद सरकार चुनाव कराने से कतरा रही है। जो सरकार संवैधानिक संस्थाओं के प्रति जवाबदेह नहीं है, उसे सत्ता में बने रहने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है।”

दिखावे की राजनीति का आरोप अंबेडकर जयंती समारोहों पर तंज कसते हुए पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि भाजपा का बाबा साहेब के उसूलों में कभी विश्वास नहीं रहा। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार केवल प्रतीकात्मक राजनीति कर रही है। गहलोत ने सवाल किया कि यदि सरकार को संविधान में यकीन होता, तो आज पंचायतों और नगरपालिकाओं में जनता द्वारा चुने हुए प्रतिनिधि होते, न कि सरकारी प्रशासकों का राज।

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सहकारी चुनाव और केंद्रीय एजेंसियां गहलोत ने यह भी याद दिलाया कि पिछले 10 वर्षों से को-ऑपरेटिव (सहकारी) संस्थाओं के चुनाव नहीं हुए हैं। उन्होंने देश के मौजूदा हालात पर चिंता जताते हुए कहा कि आज ज्यूडिशियरी और केंद्रीय जांच एजेंसियां दबाव में काम कर रही हैं, जिससे लोकतंत्र की जड़ें कमजोर हो रही हैं।


प्रमुख बिंदु: गहलोत के हमले के केंद्र में क्या है?

  • अदालत की अवमानना: हाई कोर्ट की अप्रैल डेडलाइन के बावजूद चुनाव प्रक्रिया शुरू न होना।
  • प्रशासक राज: निर्वाचित प्रतिनिधियों के बजाय अफसरों के हाथों में स्थानीय सत्ता।
  • संवैधानिक संकट: स्थानीय स्वशासन (Local Self-Government) के ढांचे को कमजोर करना।

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