नई दिल्ली: भारतीय राजनीति में ‘सरपंच पति’ या ‘पंचायत पति’ जैसे शब्द अब किसी से छिपे नहीं हैं। इसी गंभीर मुद्दे को आम आदमी पार्टी के सांसद राघव चड्ढा ने संसद में बेहद मजबूती के साथ उठाया है। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि पंचायतों में महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों पर चुनाव तो महिलाएं लड़ती हैं, लेकिन असली सत्ता की चाबी उनके घर के पुरुषों (पति, पिता या भाई) के पास ही रहती है। चड्ढा ने इसे संविधान की मूल भावना के खिलाफ बताते हुए सरकार से इस पर जवाब मांगा है।
73वें संशोधन का सच और ‘चेहरे’ की राजनीति
राघव चड्ढा ने सदन को याद दिलाया कि 73वें संविधान संशोधन के जरिए पंचायती राज संस्थानों में महिलाओं को 33% आरक्षण दिया गया था। इसका मकसद यह था कि स्थानीय शासन में महिलाओं की आवाज बुलंद हो सके। आंकड़ों के अनुसार, देश के करीब 31 लाख निर्वाचित पंचायत प्रतिनिधियों में से लगभग एक-तिहाई महिलाएं हैं। लेकिन जमीन पर हकीकत कुछ और ही है। कई जगहों पर चुनी हुई महिला प्रतिनिधि केवल एक ‘चेहरा’ बनकर रह जाती हैं, जबकि निर्णय लेने की असली ताकत उनके पुरुष रिश्तेदार इस्तेमाल करते हैं।
समानांतर और असंवैधानिक सत्ता का उदय
संसद में एक पूरक प्रश्न पूछते हुए राघव चड्ढा ने इस ‘प्रॉक्सी गवर्नेंस’ यानी छद्म शासन पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि जब एक चुनी हुई महिला की जगह कोई और सत्ता चलाता है, तो यह एक समानांतर और गैर-निर्वाचित सत्ता को जन्म देता है। संविधान ने कभी भी ऐसी व्यवस्था की कल्पना नहीं की थी। यह उन महिलाओं के अधिकारों का हनन है जिन्होंने जनता का भरोसा जीतकर जीत हासिल की है। ‘लाइव सच’ (Live Sach) के विश्लेषण के अनुसार, यह मुद्दा ग्रामीण भारत के लोकतांत्रिक ढांचे को भीतर से कमजोर कर रहा है।
सरकार से पूछे कड़े सवाल
राघव चड्ढा ने सीधे तौर पर सरकार से दो अहम सवाल किए। पहला, क्या सरकार स्वीकार करती है कि देश में ‘सरपंच पति’ की यह प्रथा आज भी बड़े पैमाने पर मौजूद है? और दूसरा, सरकार यह सुनिश्चित करने के लिए क्या कदम उठा रही है कि पंचायतों में चुनी गई महिलाएं केवल नाम की मुखिया न रहें, बल्कि अपने अधिकारों का वास्तविक रूप से प्रयोग कर सकें? उन्होंने मांग की कि इस प्रथा को खत्म करने के लिए नीतिगत बदलाव और जागरूकता की तत्काल आवश्यकता है।
