भीलवाड़ा/जयपुर: राजस्थान की वीर प्रसूता भूमि न केवल अपने शौर्य के लिए जानी जाती है, बल्कि यह अध्यात्म और लोक आस्था का भी एक बड़ा केंद्र है। इसी मरुधरा के भीलवाड़ा जिले में एक ऐसा स्थान मौजूद है, जो करोड़ों लोगों की श्रद्धा का केंद्र बिंदु है—मालासेरी डूंगरी (Malaseri Dungri)।
यह स्थान मात्र एक पहाड़ी नहीं है, बल्कि यह गुर्जर समाज के आराध्य और भगवान विष्णु के अवतार माने जाने वाले भगवान देवनारायण का प्राकट्य स्थल (जन्मभूमि) है। हाल के वर्षों में, यह धार्मिक स्थल क्षेत्रीय पहचान से आगे बढ़कर राष्ट्रीय पटल पर अपनी छाप छोड़ रहा है।
क्या है मालासेरी डूंगरी? राजस्थानी भाषा में ‘डूंगरी’ का अर्थ छोटी पहाड़ी होता है। भीलवाड़ा जिले की आसींद तहसील से कुछ किलोमीटर दूर स्थित मालासेरी गांव में यह पवित्र पहाड़ी स्थित है। गुर्जर समुदाय और सर्वसमाज के लिए यह स्थान उतना ही पवित्र है, जितना हिंदुओं के लिए अयोध्या या मथुरा। यहाँ पहाड़ी पर भगवान देवनारायण का भव्य मंदिर सुशोभित है, जहाँ साल भर श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है।
अद्भुत इतिहास: माता साडू की तपस्या और कमल पर अवतरण मालासेरी डूंगरी का इतिहास एक चमत्कारिक घटना से जुड़ा है। जनश्रुतियों और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान देवनारायण का जन्म माँ के गर्भ से नहीं हुआ था, बल्कि वे अवतरित हुए थे।
किवदंती है कि बगड़ावत वंश के वीर सवाई भोज की पत्नी, माता साडू, भगवान विष्णु की अनन्य भक्त थीं। उन्होंने मालासेरी की इसी पहाड़ी पर घोर तपस्या की थी। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर, माघ माह के शुक्ल पक्ष की छठ (षष्ठी) तिथि को (संवत 968, लगभग 911 ईस्वी में) एक चमत्कार हुआ।
मान्यता है कि पहाड़ी पर स्थित एक विशाल चट्टान फटी, उसमें से जल का स्रोत फूटा और उसी जल में एक कमल के फूल पर भगवान देवनारायण शिशु रूप में प्रकट हुए। आज भी मंदिर परिसर में वह स्थान मौजूद है जहाँ यह चट्टान फटी थी, जिसे अत्यंत पवित्र माना जाता है।
मालासेरी डूंगरी का सामाजिक और धार्मिक महत्व
- आस्था का महाकेंद्र: भगवान देवनारायण को विष्णु का अवतार माना जाता है, जिन्होंने गौ-रक्षा, समाज सुधार और अन्याय के खिलाफ जीवन भर संघर्ष किया। इसलिए, यह स्थान त्याग और धर्म का प्रतीक है।
- गुर्जर समाज का सर्वोच्च तीर्थ: वैसे तो देवनारायण जी सर्वसमाज के लोक देवता हैं, लेकिन गुर्जर समुदाय के लिए मालासेरी डूंगरी आस्था का सबसे बड़ा केंद्र (Epicenter) है। समुदाय के लोग इसे अपना सर्वोच्च तीर्थ मानते हैं।
- लोक संस्कृति का आधार: राजस्थान की प्रसिद्ध ‘फड़’ चित्रकारी और गायन परंपरा भगवान देवनारायण की गाथाओं पर ही आधारित है। यह स्थान उस समृद्ध लोक परंपरा का जीवंत साक्ष्य है।
राष्ट्रीय पटल पर उदय सदियों से यह स्थान लोक आस्था का केंद्र रहा है, लेकिन जनवरी 2023 में भगवान देवनारायण के 1111वें प्राकट्य महोत्सव पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दौरे ने इसे राष्ट्रीय सुर्खियों में ला दिया। प्रधानमंत्री ने यहाँ दर्शन कर कमल का फूल अर्पित किया था। इस दौरे ने इस तीर्थ स्थल के महत्व को और रेखांकित किया, जिसके बाद यहाँ विकास कार्यों और श्रद्धालुओं की संख्या में भारी वृद्धि हुई है।
