दिल्ली हाईकोर्ट का अहम फैसला: पिता के जीवित रहते दादा की संपत्ति पर पोते-पोती का कोई कानूनी हक नहीं

नई दिल्ली: दिल्ली हाई कोर्ट ने पैतृक और स्व-अर्जित संपत्ति के उत्तराधिकार से संबंधित एक ऐतिहासिक फैसले में स्पष्ट किया है कि कोई भी हिंदू व्यक्ति (पोता या पोती) अपने दादा की संपत्ति में तब तक हिस्सा नहीं मांग सकता, जब तक कि उसके माता-पिता जीवित हों। जस्टिस पुरुषेंद्र कुमार कौरव की पीठ ने एक याचिका को खारिज करते हुए यह महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है। अदालत ने हिंदू उत्तराधिकार कानून की धाराओं का हवाला देते हुए कहा कि पिता के जीवित रहते पोता ‘प्रथम श्रेणी’ (First Class Heir) का कानूनी उत्तराधिकारी नहीं माना जाता है, इसलिए वह सीधे तौर पर संपत्ति का दावा करने का हकदार नहीं है।

महिला की याचिका खारिज, कोर्ट ने स्पष्ट किए उत्तराधिकार के नियम

यह मामला एक हिंदू महिला द्वारा दायर याचिका से जुड़ा था, जिसने अपने दादा की मृत्यु के बाद उनकी संपत्ति में हिस्सेदारी की मांग की थी। याचिकाकर्ता ने अपने पिता और बुआ के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए तर्क दिया था कि चूंकि संपत्ति उसके दादा की स्व-अर्जित (Self-acquired) थी, इसलिए यह पैतृक संपत्ति की श्रेणी में आती है और उसे इसमें हिस्सा मिलना चाहिए। हालांकि, जस्टिस कौरव ने इस तर्क को कानूनी रूप से मान्य नहीं माना और याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि याचिकाकर्ता के पिता वर्तमान में जीवित हैं, जो कानूनन पहली प्राथमिकता रखते हैं।

धारा-8 की व्याख्या: पिता को मिली संपत्ति उनकी अपनी पूर्ण संपत्ति

कोर्ट ने अपने आदेश में हिंदू उत्तराधिकार कानून की धारा-8 का विशेष उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि कानून के अनुसार, दादा की मृत्यु पर संपत्ति में हिस्सा पाने का पहला अधिकार उनके बच्चों (यानी याचिकाकर्ता के पिता और बुआ) का होता है। चूंकि दादा की मृत्यु के समय याचिकाकर्ता के पिता जीवित थे, इसलिए उन्हें मिली संपत्ति उनकी अपनी ‘पूर्ण संपत्ति’ (Absolute Property) मानी जाएगी। ऐसी स्थिति में, याचिकाकर्ता का अपने पिता की उस संपत्ति पर कोई कानूनी अधिकार नहीं बनता है, जिसे उन्होंने विरासत में प्राप्त किया है।

कानूनी सलाह: संपत्ति विवादों पर पड़ेगा इस फैसले का बड़ा असर

विधिक विशेषज्ञों का मानना है कि दिल्ली हाई कोर्ट के इस फैसले से भविष्य में संपत्ति से जुड़े हजारों मुकदमों की दिशा बदल जाएगी। अक्सर देखा जाता है कि पोते-पोतियां अपने माता-पिता के रहते हुए ही दादा-दादी की संपत्ति पर अपना हक जताते हैं, जिससे पारिवारिक विवाद बढ़ते हैं। इस फैसले ने स्पष्ट कर दिया है कि स्व-अर्जित संपत्ति जब अगली पीढ़ी (पिता) को हस्तांतरित होती है, तो वह उनकी निजी संपत्ति बन जाती है और उनके जीवित रहते तीसरी पीढ़ी का उस पर कोई दखल नहीं हो सकता। यह निर्णय पारिवारिक संपत्ति के बंटवारे और कानूनी वारिसों के अधिकारों को लेकर बनी अस्पष्टता को दूर करने वाला है।

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