भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास ऐसे वीरों की कहानियों से भरा पड़ा है, जिन्होंने अपनी जवानी देश के नाम कुर्बान कर दी। इन्हीं नामों में एक नाम सुनहरे अक्षरों में दर्ज है— हेमू कालाणी (Hemu Kalani)। जिन्हें अक्सर ‘सिंध का भगत सिंह’ कहा जाता है। मात्र 19 साल की उम्र में जब युवा अपने भविष्य के सपने बुनते हैं, उस उम्र में हेमू ने देश की आजादी के लिए फांसी के फंदे को अपना गले का हार बना लिया था।
आज हम आपको बताने जा रहे हैं इस महान क्रांतिकारी के जीवन (Biography) का वो पूरा सफर, जो हर भारतीय को जानना चाहिए।
बचपन से ही रगों में दौड़ता था देशभक्ति का खून
हेमू कालाणी का जन्म 23 मार्च 1923 को अविभाजित भारत के सिंध प्रांत के सक्खर (Sukkur) शहर (अब पाकिस्तान) में हुआ था। यह तारीख अपने आप में ऐतिहासिक है क्योंकि इसी तारीख को 1931 में भगत सिंह को फांसी दी गई थी। मानो नियति ने तय कर दिया था कि एक क्रांतिकारी के जाने वाले दिन ही दूसरा क्रांतिकारी जन्म ले चुका है।
उनके पिता का नाम पेसूमल कालाणी और माता का नाम जेठी बाई था। बचपन से ही हेमू के मन में विदेशी शासन के खिलाफ गुस्सा था। स्कूल के दिनों में ही उन्होंने अपने साथियों के साथ मिलकर ‘स्वराज्य सेना’ का गठन किया। यह सेना विदेशी कपड़ों का बहिष्कार करती और लोगों को स्वदेशी अपनाने के लिए प्रेरित करती।
1942 की क्रांति और वो खौफनाक रात
साल 1942 में जब महात्मा गांधी ने ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ का आगाज किया, तो पूरा देश अंग्रेजों के खिलाफ उठ खड़ा हुआ। सिंध में इस आंदोलन की आग बहुत तेज थी।
अक्टूबर 1942 में हेमू कालाणी को एक गुप्त और बेहद अहम जानकारी मिली। उन्हें पता चला कि अंग्रेजी सरकार बलूचिस्तान में चल रहे विद्रोह को कुचलने के लिए हथियारों और बारूद से भरी एक विशेष ट्रेन भेज रही है। यह ट्रेन उनके शहर सक्खर से होकर गुजरने वाली थी। हेमू जानते थे कि अगर यह ट्रेन वहां पहुंच गई, तो हजारों निर्दोष भारतीयों की जान चली जाएगी।
मौत से खेलने का फैसला
हेमू ने ठान लिया कि चाहे जान चली जाए, यह ट्रेन अपनी मंजिल तक नहीं पहुंचनी चाहिए। 23 अक्टूबर 1942 की रात, वे अपने दो साथियों के साथ रेलवे ट्रैक पर पहुंचे। उनके पास पटरियां उखाड़ने के लिए कोई बड़े औजार नहीं थे, फिर भी वे फिशप्लेट्स (Fishplates) खोलने में जुट गए।
लेकिन, किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। पटरियों पर काम करते वक्त वहां तैनात ब्रिटिश पुलिस की भारी टुकड़ी की नजर उन पर पड़ गई।
दोस्ती की मिसाल: ‘तुम भाग जाओ, मैं संभाल लूंगा’
पुलिस को अपनी ओर आता देख हेमू कालाणी ने वो किया जो इतिहास में दर्ज हो गया। उन्होंने तुरंत अपने साथियों को वहां से भाग जाने का आदेश दिया ताकि वे पकड़े न जाएं। वे खुद वहीं डटे रहे और पुलिस के सामने सरेंडर कर दिया ताकि उनका ध्यान भटक जाए और साथी बच निकलें।
अत्याचार के आगे नहीं झुका हिमालय
गिरफ्तारी के बाद अंग्रेजों ने हेमू पर जुल्म की इंतहा कर दी। उन्हें कोड़े मारे गए, उल्टा लटकाया गया और अमानवीय यातनाएं दी गईं। अंग्रेज चाहते थे कि हेमू अपने साथियों का नाम बता दें। लेकिन 19 साल के इस शेर ने मुंह नहीं खोला। उन्होंने सारी जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली और कहा, “हाँ, मैंने यह किया है और मुझे इसका गर्व है।”
अंग्रेजी हुकूमत ने उन पर ‘मार्शल लॉ’ (Martial Law) के तहत मुकदमा चलाया और उन्हें फांसी की सजा सुनाई।
आखिरी इच्छा: ‘फिर जन्म लूं इसी मिट्टी में’
हेमू की फांसी की खबर सुनकर पूरे सिंध में कोहराम मच गया। हजारों लोगों ने वायसराय से दया याचिका लगाई, लेकिन क्रूर ब्रिटिश सरकार ने किसी की नहीं सुनी।
21 जनवरी 1943 की सुबह जब उन्हें फांसी के तख्ते पर ले जाया गया, तो जेलर ने उनसे उनकी आखिरी इच्छा पूछी। हेमू कालाणी ने मुस्कुराते हुए कहा:
“मेरी कोई निजी इच्छा नहीं है। बस ईश्वर से प्रार्थना है कि मुझे दोबारा इसी भारत भूमि पर जन्म मिले, ताकि मैं फिर से अपनी मातृभूमि की सेवा कर सकूं और इसे आजाद देख सकूं।”
इसके बाद ‘इंकलाब जिंदाबाद’ और ‘भारत माता की जय’ के गगनभेदी नारों के साथ उन्होंने हंसते-हंसते फांसी के फंदे को चूम लिया।
हेमू कालाणी का बलिदान व्यर्थ नहीं गया। उनकी शहादत ने सिंध के घर-घर में आजादी की अलख जगा दी। आज भी भारत के संसद भवन परिसर में लगी उनकी प्रतिमा देश के युवाओं को यह याद दिलाती है कि आजादी की कीमत क्या होती है।
