भारतीय राजनीति के शिखर पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी केवल एक राजनेता नहीं थे, बल्कि एक बेहद संवेदनशील कवि भी थे। उनकी कविताएं उनके राजनीतिक भाषणों की तरह ही ओजस्वी और प्रेरणादायी हैं। आज उनकी जयंती के अवसर पर, हम आपके लिए लेकर आए हैं उनकी सबसे प्रसिद्ध रचनाओं में से एक—‘गीत नया गाता हूँ’।
यह कविता महज शब्दों का समूह नहीं, बल्कि जीवन की विडंबनाओं और संघर्षों के बीच आशा की किरण है। जब जीवन में सब कुछ विपरीत हो, तब भी नवनिर्माण का संकल्प कैसे लिया जाता है, यह कविता हमें सिखाती है।
यहाँ प्रस्तुत है अटल जी की वह पूरी कविता, जो पीढ़ियों से युवाओं को ‘हार न मानने’ की प्रेरणा देती आ रही है:
कविता: गीत नया गाता हूँ
टूटे हुए तारों से फूटे बासंती स्वर, पत्थर की छाती में उग आया नव अंकुर, झरे सब पीत पात, कोयलिया बात-बात, धरती को बसंती कपड़ों से सजाता हूँ। गीत नया गाता हूँ।।
टूटे हुए सपनों की कौन सुने सिसकी, अंतर की चीर व्यथा पलकों पर ठिठकी, हार नहीं मानूँगा, रार नहीं ठानूँगा, काल के कपाल पर लिखता मिटाता हूँ। गीत नया गाता हूँ।।
कविता का भावार्थ और विश्लेषण
अटल जी की इस कविता का हर शब्द एक मंत्र की तरह है जो निराशा को दूर भगाता है। आइए समझते हैं इस कविता की गहराइयों को:
1. विनाश में ही सृजन का बीज (टूटे हुए तारों से…) कविता की शुरुआती पंक्तियां अद्भुत आशावाद (Optimism) का परिचय देती हैं। अटल जी कहते हैं कि ‘टूटे हुए तारों से फूटे बासंती स्वर’, यानी जब वाद्य यंत्र के तार टूट जाते हैं, तब भी उनमें से वसंत के स्वर (संगीत) निकल सकते हैं। ‘पत्थर की छाती में उग आया नव अंकुर’—यह पंक्ति दर्शाती है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठोर (पत्थर जैसी) क्यों न हों, जीवन और उम्मीद अपनी राह बना ही लेते हैं। पतझड़ (पीत पात) के बाद वसंत का आना तय है, और कवि उसी नवनिर्माण का गीत गा रहा है।
2. मौन पीड़ा और संकल्प (टूटे हुए सपनों की…) दूसरे अंतरे में कवि जीवन की कड़वी सच्चाइयों का सामना करता है। वे पूछते हैं कि ‘टूटे हुए सपनों की कौन सुने सिसकी’, यानी असफलता और टूटे हुए सपनों का दर्द अक्सर दुनिया नहीं सुनती। ‘अंतर की चीर व्यथा पलकों पर ठिठकी’—दर्द इतना गहरा है कि वह आंसुओं के रूप में बाहर आने के बजाय पलकों पर ही जम गया है। लेकिन, इसके तुरंत बाद कवि का योद्धा रूप जाग उठता है।
3. महामंत्र: हार नहीं मानूँगा… कविता का यह हिस्सा सबसे शक्तिशाली है और भारतीय जनमानस में रचा-बसा है।
“हार नहीं मानूँगा, रार नहीं ठानूँगा, काल के कपाल पर लिखता मिटाता हूँ…”
यहाँ अटल जी स्पष्ट करते हैं कि वे परिस्थितियों के सामने घुटने नहीं टेकेंगे। वे ‘काल’ (समय/मृत्यु) के माथे (कपाल) पर अपनी किस्मत खुद लिखने और मिटाने का साहस रखते हैं। वे भाग्य के भरोसे बैठने वालों में से नहीं, बल्कि पुरुषार्थ से भाग्य बदलने वालों में से हैं। ‘रार नहीं ठानूँगा’ का अर्थ है कि वे संघर्ष से पीछे नहीं हटेंगे, लेकिन अनावश्यक शत्रुता भी नहीं पालेंगे, बस अपने कर्म पथ पर निरंतर आगे बढ़ते रहेंगे और हर पल जीवन का एक ‘नया गीत’ गाएंगे।
