नई दिल्ली/जयपुर: देश के 77वें गणतंत्र दिवस पर आज दिल्ली के कर्तव्य पथ पर भारत की सैन्य ताकत के साथ-साथ सांस्कृतिक विविधता का अद्भुत संगम देखने को मिला। इस भव्य परेड में ‘रंगीलो राजस्थान’ की झांकी जैसे ही सामने आई, दर्शकों की तालियों की गड़गड़ाहट ने आसमान सिर पर उठा लिया। इस वर्ष राजस्थान की झांकी की थीम ‘राजस्थान-मरुस्थल का स्वर्ण स्पर्श’ (Rajasthan: Golden Touch of the Desert) रखी गई थी। सुनहरे रंगों, पारंपरिक शिल्प और लोक संगीत से सजी इस झांकी ने न केवल प्रदेश की कलात्मक गहराई को प्रदर्शित किया, बल्कि यह संदेश भी दिया कि रेगिस्तान की बंजर धरती भी कला के रंगों से कितनी जीवंत हो सकती है।
बीकानेर की ‘उस्ता कला’ और सुनहरे ऊंट का जादू झांकी का मुख्य आकर्षण बीकानेर की विश्वप्रसिद्ध ‘उस्ता कला’ (Usta Art) रही। झांकी के अग्रभाग में एक सुसज्जित ऊंट की विशाल प्रतिकृति थी, जिस पर उस्ता कला की बारीकी देखते ही बन रही थी। ऊंट की खाल और लकड़ी पर सोने की नक्काशी (Gold Embossing) वाली इस कला ने झांकी को एक शाही और दिव्य रूप दिया। झांकी के दोनों ओर बीकानेर की ऐतिहासिक हवेलियों और झरोखों की झलक दिखाई गई, जिन पर भी इसी स्वर्ण शिल्प का प्रदर्शन किया गया था। यह दृश्य बता रहा था कि कैसे राजस्थान के कारीगरों ने सदियों से इस विरासत को अपने हाथों में संजोकर रखा है।
रावणहत्था की झनकार और लोक संस्कृति का संगम दृश्य के साथ-साथ श्रव्य (Audio) अनुभव भी जादुई था। झांकी के साथ चल रहे लोक कलाकारों ने प्राचीन वाद्ययंत्र ‘रावणहत्था’ (Ravanhatha) की मधुर स्वर लहरियां बिखेरीं। किवदंती है कि इस वाद्ययंत्र का संबंध लंकापति रावण से है। रावणहत्था की धुन पर पारम्परिक वेशभूषा में थिरकते कलाकारों ने कर्तव्य पथ के माहौल को राजस्थानी रंग में रंग दिया। झांकी में केवल इमारतों का प्रदर्शन नहीं था, बल्कि महिला सशक्तिकरण और हस्तशिल्प में महिलाओं की भूमिका को भी रेखांकित किया गया। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और मुख्य अतिथि ने भी राजस्थान की इस प्रस्तुति को बड़ी उत्सुकता से निहारा।
