नई दिल्ली: आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने संसद में बजट 2026 पर चर्चा के दौरान सैनिकों की ‘डिसेबिलिटी पेंशन’ (विकलांगता पेंशन) पर टैक्स लगाने के सरकार के नए प्रावधानों पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने इसे एक ‘पवित्र बलिदान का अपमान’ और ‘दोहरे मानदंडों’ का प्रतीक बताया। चड्ढा ने तर्क दिया कि सरकार सैनिकों के बलिदान को टैक्स स्लैब में बांधने का प्रयास कर रही है, जो पूरी तरह अनुचित और अनैतिक है।
क्या है बजट 2026 का विवादास्पद प्रावधान?
राघव चड्ढा ने संसद को बताया कि बजट 2026 के नए प्रावधानों के अनुसार, एक सैनिक की डिसेबिलिटी पेंशन टैक्स-फ्री होगी या नहीं, यह अब इस बात पर निर्भर करेगा कि वह सैनिक कब और किन परिस्थितियों में सेवानिवृत्त हुआ। चड्ढा ने इस विसंगति को एक बेहद संवेदनशील उदाहरण के साथ स्पष्ट किया:
चड्ढा ने ‘सैनिक A’ और ‘सैनिक B’ का उदाहरण दिया:
- सैनिक A: जिसे चोट लगी और उसने सेना छोड़ दी— उसकी डिसेबिलिटी पेंशन टैक्स-फ्री है।
- सैनिक B: जिसे वही चोट लगी, लेकिन उसने अदम्य साहस दिखाते हुए देश सेवा जारी रखी और बाद में सेवानिवृत्त हुआ— उसकी डिसेबिलिटी पेंशन पर अब टैक्स लगेगा।
राघव चड्ढा का तीखा सवाल: “ज्यादा सेवा करने वाले को टैक्स की सजा क्यों?”
इस विसंगति पर सवाल उठाते हुए सांसद चड्ढा ने कहा, “समान चोट। समान बलिदान। लेकिन जो ज्यादा समय तक देश की सेवा करता है, उसे सरकार टैक्स लगाकर सजा दे रही है?” उन्होंने केंद्र सरकार से पूछा कि यह नीति क्या यह संदेश नहीं दे रही है कि चोट लगते ही सेवा छोड़ देना बेहतर है? उन्होंने इसे ‘देशभक्ति का अपमान’ और ‘जवानों के मनोबल पर चोट’ बताया।
“पेंशन नहीं, जीवन भर के जख्म का मुआवजा है यह”
राघव चड्ढा ने भावुक अपील करते हुए कहा कि जब एक सैनिक सीमा पर खड़ा होकर देश की रक्षा करता है, तो वह यह नहीं सोचता कि उसे कितना टैक्स देना पड़ेगा। वह अपनी दिवाली बंकरों में बिताता है, ईद सीमा पर और परिवार के महत्वपूर्ण पलों को खो देता है। देश की सेवा में अपने शरीर का अंग गंवाने वाले सैनिक के लिए यह डिसेबिलिटी पेंशन कोई ‘आय’ नहीं है। यह उस गहरे जख्म और शारीरिक अक्षमता का मुआवजा है, जिसे वह सैनिक जीवन भर अपने साथ लेकर चलेगा। “आप आय पर टैक्स लगा सकते हैं, लेकिन किसी के बलिदान और उसके शरीर पर लगे घावों पर टैक्स लगाना पूरी तरह अनुचित है।”
क्या है पूर्व सैनिकों और विशेषज्ञों की राय?
सर्च परिणामों से स्पष्ट है कि पूर्व सैनिक समुदाय ने भी इस मुद्दे पर कड़ी नाराजगी व्यक्त की है। पूर्व सेना प्रमुख जनरल वीपी मलिक सहित कई वरिष्ठ अधिकारियों ने इसे सैनिकों की गरिमा पर चोट बताया है। उनका तर्क है कि यह डिसेबिलिटी पेंशन कोई विशेषाधिकार नहीं, बल्कि सेवा के दौरान आई चोटों के लिए एक वैधानिक मुआवजा है। पूर्व सैनिकों का कहना है कि सरकार के इस कदम से जवानों का मनोबल गिरेगा, विशेषकर उन जवानों का जो चोट लगने के बावजूद सेवा जारी रखना चाहते हैं।
राघव चड्ढा की स्पष्ट मांग: पूर्ण टैक्स छूट की बहाली
राघव चड्ढा ने संसद में सरकार से स्पष्ट मांग की कि सभी घायल सैनिकों की डिसेबिलिटी पेंशन पर पूरी तरह से आयकर छूट को बहाल किया जाए। उन्होंने कहा कि यह सुविधा केवल उन सैनिकों तक सीमित नहीं होनी चाहिए जिन्हें सेवा से अयोग्य घोषित कर बाहर किया गया है। उन्होंने मौजूदा नियमों को भेदभावपूर्ण बताते हुए सभी घायल सैनिकों के लिए समान अधिकार सुनिश्चित करने के लिए नीतिगत बदलाव की जरूरत पर जोर दिया।
