RSS 100 Years Journey: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS), जिसकी स्थापना 1925 में हुई थी, अपनी शताब्दी वर्ष की ओर अग्रसर है। संघ में सबसे अहम पद सरसंघचालक (Sarsanghchalak) का होता है, जो संगठन के विचार, कार्यपद्धति और विस्तार का मार्गदर्शन करता है। पिछले 100 वर्षों में, केवल छह महान व्यक्तित्वों ने इस सर्वोच्च दायित्व का निर्वहन किया है, जिन्होंने RSS की यात्रा को एक छोटे स्वयंसेवी समूह से विश्व के सबसे बड़े सांस्कृतिक संगठन तक पहुँचाया।
यहाँ उन सभी छह सरसंघचालकों की सूची, उनके कार्यकाल और प्रमुख योगदानों का विस्तृत विवरण दिया गया है:
सरसंघचालक परम्परा: त्याग और नेतृत्व की एक सदी
यह परम्परा संगठन के भीतर नेतृत्व के विकास, समर्पण और अनुशासन को दर्शाती है, जहाँ सरसंघचालक का चयन लोकतांत्रिक पद्धति से ‘प्रतिनिधि सभा’ द्वारा या निवर्तमान प्रमुख द्वारा नामांकन के माध्यम से होता है।
| क्र. | सरसंघचालक का नाम (उपाख्य) | कार्यकाल | प्रमुख योगदान और महत्व |
| 1. | डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार | 1925 – 1940 | संस्थापक और प्रथम सरसंघचालक। इन्होंने ‘राष्ट्र प्रथम’ के विचार पर शाखा (Shakha) कार्यपद्धति की नींव रखी और स्वयंसेवकों में राष्ट्रीय चरित्र निर्माण का कार्य शुरू किया। |
| 2. | माधव सदाशिव गोलवलकर (श्री गुरुजी) | 1940 – 1973 | सबसे लंबा कार्यकाल (33 वर्ष)। इन्होंने संघ का राष्ट्रीय स्तर पर विस्तार किया, वैचारिक आधार (हिंदुत्व और राष्ट्रवाद) को मजबूत किया, और संघ परिवार के विभिन्न अनुषांगिक संगठनों के निर्माण को प्रेरित किया। |
| 3. | माधव राव देवरस (बालासाहब) | 1973 – 1994 | इन्होंने सामाजिक समरसता (Social Harmony) पर विशेष जोर दिया। इनके नेतृत्व में ही संघ ने आपातकाल के दौरान लोकतांत्रिक संघर्ष किया और बाद में अपने कार्यों का विस्तार किया। |
| 4. | प्रो. राजेंद्र सिंह (रज्जू भैया) | 1994 – 2000 | संघ के इतिहास में पहले गैर-महाराष्ट्रियन सरसंघचालक। इन्होंने विज्ञान और प्रौद्योगिकी के साथ भारतीय ज्ञान परंपरा के समन्वय पर जोर दिया। |
| 5. | केशव सीताराम सुदर्शन (के. एस. सुदर्शन) | 2000 – 2009 | इन्होंने स्वदेशी (Swadeshi) और स्व-निर्भरता के विचार को बढ़ावा दिया। इनके कार्यकाल में संघ ने डिजिटल मीडिया के क्षेत्र में भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। |
| 6. | डॉ. मोहन राव मधुकरराव भागवत | 2009 – वर्तमान | वर्तमान सरसंघचालक। इनके नेतृत्व में संघ ने सामाजिक आउटरीच, गणवेश परिवर्तन, और ‘पंच परिवर्तन’ जैसे अभियानों को आगे बढ़ाया है, और संघ की शताब्दी वर्ष (RSS@100) की यात्रा का नेतृत्व कर रहे हैं। |
निष्कर्ष: निरंतरता और विकास
संघ की सरसंघचालक परम्परा का विकास इस बात का प्रमाण है कि संगठन समय के साथ परिवर्तन और विकास को स्वीकार करता है। हर प्रमुख ने संघ को नई दिशा दी है, लेकिन उनका मूल सिद्धांत—राष्ट्र प्रथम और हिंदू समाज का संगठन—अटल रहा है।
