उदयपुर। झीलों की नगरी उदयपुर में भ्रष्टाचार का एक ऐसा “कंक्रीट साम्राज्य” खड़ा हो गया है जिसने प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) के आदेशों को भी बौना साबित कर दिया है। सज्जनगढ़ बायोलॉजिकल पार्क के सुरक्षित ईको-सेंसिटिव जोन (ESZ) में उदयपुर विकास प्राधिकरण (UDA) और वन विभाग की मिलीभगत से 300 करोड़ रुपये के फर्जीवाड़े का मामला सामने आया है। ताज्जुब की बात यह है कि पीएमओ की सख्ती के बावजूद स्थानीय प्रशासन कार्रवाई के बजाय लीपापोती में जुटा है।
दूरी में हेरफेर: 1050 मीटर का ‘झूठ’ और पट्टे का खेल
नियमों के अनुसार, ईको-सेंसिटिव जोन की एक किलोमीटर की परिधि में किसी भी प्रकार का व्यावसायिक निर्माण प्रतिबंधित है। लेकिन भ्रष्टाचार की जड़ें इतनी गहरी हैं कि वन विभाग और यूडीए के अधिकारियों ने मौका रिपोर्ट में खेल कर दिया।
- तथ्य: कालारोही गांव की विवादित भूमि (आराजी नं. 3347-3350 आदि) जो वास्तव में ईएसजेड के बेहद करीब है, उसे रिपोर्ट में 1050 मीटर दूर दर्शा दिया गया।
- नतीजा: इसी गलत रिपोर्ट के आधार पर यूडीए ने अवैध रूप से पट्टा और रिसॉर्ट निर्माण की स्वीकृति जारी कर दी।
मंजिलें बढ़ती रहीं, अधिकारी आंखें मूंदते रहे
अनुमति केवल दो मंजिल (G+2) की थी, लेकिन मौके पर रसूखदारों ने चार मंजिला (G+4) इमारत खड़ी कर दी। निर्माण क्षेत्रफल में भी भारी हेराफेरी की गई है। स्वीकृत 96,000 वर्ग फीट की जगह 4 लाख वर्ग फीट से ज्यादा का पक्का निर्माण कर लिया गया है, जिसे अधिकारी ‘अस्थाई ढांचा’ बताकर बचाने का प्रयास कर रहे हैं।
नियमों की ऐसी उड़ी धज्जियां (तुलनात्मक विवरण)
| मानक | नियम (ESZ) | मौके की स्थिति | उल्लंघन का स्तर |
| ग्राउंड कवरेज | अधिकतम 20% (52,000 ft) | 75% (1,50,000 ft) | 300% ज्यादा |
| कुल निर्माण | 96,000 sq. ft | 4,00,000 sq. ft | विशालकाय अतिक्रमण |
| ऊंचाई/मंजिल | G + 2 (दो मंजिल) | G + 4 (चार मंजिल) | नियम विरुद्ध |
| हरियाली क्षेत्र | 80% अनिवार्य | मात्र 15% शेष | पर्यावरण का विनाश |
पीएमओ के निर्देशों की अवहेलना और लीपापोती
इस पूरे मामले की शिकायत प्रधानमंत्री कार्यालय तक पहुंची थी, जिसके बाद पीएमओ ने जिला कलक्टर और प्रधान मुख्य वन संरक्षक को कार्रवाई के निर्देश दिए थे। उम्मीद थी कि ईएसजेड में बुलडोजर चलेगा, लेकिन अधिकारियों ने जांच के नाम पर केवल कागजी खानापूर्ति शुरू कर दी है। कालारोही में हो रहा यह निर्माण न केवल सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अवमानना है, बल्कि पर्यावरण के खिलाफ एक बड़ा संगठित अपराध भी है।
