बीकानेर की बिश्नोई धर्मशाला में गुरुवार को कुछ ऐसा हुआ जो राजस्थान की राजनीति में कम ही देखा जाता है। सरकारी आदेश और मंत्री के आश्वासन के बाद मनाए गए जश्न की उम्र महज 60 मिनट निकली। जैसे ही आदेश की कॉपी सार्वजनिक हुई, आंदोलनकारियों ने उसे सरकार की ‘चाल’ बताते हुए फाड़ दिया और फिर से अनशन पर बैठ गए। संदेश साफ है—खेजड़ी की सुरक्षा को लेकर कोई ‘समझौता’ नहीं होगा।
विवाद की जड़: जोधपुर-बीकानेर ही क्यों?
सरकार ने बड़ी चतुराई से केवल जोधपुर और बीकानेर संभाग में खेजड़ी कटाई पर रोक का आदेश जारी किया। आंदोलन की अगुवाई कर रहे परसराम विश्नोई ने इस पर कड़ा प्रहार करते हुए कहा, “क्या सरकार यह मानती है कि बाकी राजस्थान में खेजड़ी का अस्तित्व नहीं है? जब पेड़ ‘राज्य वृक्ष’ का दर्जा रखता है, तो उसकी सुरक्षा केवल दो संभागों तक सीमित क्यों?” आंदोलनकारियों ने इसे सरकार की ‘बांटो और राज करो’ वाली नीति करार दिया है।
अस्पताल और अनशन के बीच की जंग
अनशन स्थल अब किसी युद्ध क्षेत्र जैसा नज़र आ रहा है। अब तक 21 प्रदर्शनकारियों की सेहत जवाब दे चुकी है। पर्यावरण जीव रक्षा समिति के अध्यक्ष मुखराम धरणीया की हालत इतनी नाजुक हो गई कि उन्हें पीबीएम अस्पताल के आईसीयू में भर्ती कराना पड़ा। बावजूद इसके, पंडाल में बैठे बुजुर्गों और महिलाओं के हौसले कम नहीं हुए हैं। पड़ोसी राज्यों से भी लोग अपनी जान की बाजी लगाने बीकानेर पहुँच रहे हैं।
सियासी ड्रामा: मंच से विधायक की विदाई

आंदोलन में उस वक्त भारी हंगामा हुआ जब फलोदी विधायक पब्बाराम विश्नोई ने भाषण देना शुरू किया। उन्होंने जब आंदोलनकारियों की सुरक्षा की जिम्मेदारी को लेकर बात की, तो वहां मौजूद भीड़ भड़क गई। लोगों ने उन्हें “राजनीति बंद करो” के नारों के साथ बोलने से रोक दिया। यहाँ तक कि संत समाज ने भी मंत्री के सामने स्पष्ट कर दिया कि बिना पूरे प्रदेश के लिए लिखित आदेश के, वे उठने वाले नहीं हैं।
बड़ा सवाल: क्या सरकार के पास कोई जवाब है?
यह आंदोलन अब सिर्फ पेड़ों को बचाने का नहीं, बल्कि अस्मिता की लड़ाई बन चुका है। सरकार ने एक कदम तो आगे बढ़ाया है, लेकिन ‘आधा-अधूरा’। अब सवाल यह है कि क्या भजनलाल सरकार पूरे राजस्थान में खेजड़ी को बचाने के लिए कड़ा कानून लाएगी या यह संघर्ष और लंबा खिंचेगा?
