जयपुर: राजस्थान की राजनीति में ज़मीनी स्तर पर बड़ा बदलाव होने जा रहा है। आगामी पंचायत और नगरीय निकाय चुनावों की तैयारी कर रहे दावेदारों के लिए ‘दो संतान’ और ‘शैक्षिक योग्यता’ को लेकर लंबे समय से चला आ रहा संशय अब खत्म हो गया है। भजनलाल सरकार ने स्पष्ट संकेत दे दिए हैं कि वह चुनावी मैदान के द्वार उन सभी के लिए खोलने जा रही है, जो अब तक कड़े नियमों की वजह से बाहर थे। यह खबर उन कार्यकर्ताओं के लिए किसी संजीवनी से कम नहीं है, जो तीसरी संतान या डिग्री न होने के कारण चुनावी दौड़ से बाहर हो गए थे।
पात्रता का नया गणित: क्या बदलेगा?
- न्यूनतम शिक्षा की शर्त खत्म: अब लोकतंत्र के बुनियादी स्तर पर चुनाव लड़ने के लिए ‘साक्षर’ होना या कोई विशेष डिग्री होना अनिवार्य नहीं होगा। सरकार ने साफ़ कर दिया है कि राजस्थान नगरपालिका अधिनियम और पंचायती राज नियमों में फिलहाल शैक्षिक योग्यता जोड़ने का कोई इरादा नहीं है। इसका उद्देश्य ज़मीनी नेतृत्व को बढ़ावा देना है।
- ‘दो संतान’ की लक्ष्मण रेखा मिटेगी: 1995 से लागू ‘दो संतान’ के नियम को खत्म करने की फाइल अब अंतिम चरण में है। विधि विभाग (Law Department) को भेजी गई इस फाइल पर मुहर लगते ही, दो से अधिक बच्चों वाले उम्मीदवार भी पार्षद और सरपंच पद के लिए नामांकन भर सकेंगे।
- ‘वन स्टेट, वन इलेक्शन’ का ब्लूप्रिंट: सरकार की मंशा पंचायत और निकाय चुनाव एक साथ कराने की है, जिससे चुनावी खर्च और आचार संहिता का प्रभाव कम किया जा सके।
दावेदारों के लिए राहत, विरोधियों के लिए चुनौती
सरकार के इस फैसले से गांव की चौपालों से लेकर शहर के वार्डों तक उत्साह का माहौल है। विशेषज्ञों का मानना है कि इन बदलावों से चुनावों में प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी और राजनीतिक दलों को उम्मीदवार चुनने के लिए अधिक विकल्प मिलेंगे। जहां पहले नियम के डर से लोग पीछे हट जाते थे, वहीं अब ‘सिर्फ अनुभव’ के दम पर चुनाव जीतना मुमकिन होगा।
