राजस्थान के प्रमुख स्तंभ और मीनारें: चित्तौड़ के विजय स्तंभ से लेकर जयपुर की ईसरलाट तक, जानें रोचक इतिहास

जयपुर: राजस्थान का नाम आते ही जेहन में विशालकाय किले, आलीशान महल और रेगिस्तान की तस्वीरें उभरती हैं। लेकिन, वीरों की इस भूमि पर कुछ ऐसी ऐतिहासिक इमारतें भी सीना तानकर खड़ी हैं, जो आसमान से बातें करती हैं। जी हाँ, हम बात कर रहे हैं प्रदेश के उन स्तंभों और मीनारों (Pillars & Towers) की, जो सदियों से आंधी-तूफानों का सामना करते हुए आज भी इतिहास की गवाही दे रहे हैं।

चाहे वह चित्तौड़गढ़ का विजय स्तंभ हो, जो जीत का जश्न मनाता है, या फिर जयपुर की ईसरलाट, जो एक दुखद अंत की कहानी कहती है। आइए, आपको ले चलते हैं राजस्थान के इन ‘आसमानी पहरेदारों’ के सफर पर।


1. विजय स्तंभ, चित्तौड़गढ़ (Vijay Stambh)

यह राजस्थान का सबसे प्रसिद्ध और ऐतिहासिक स्तंभ है। इसे भारतीय मूर्तिकला का ‘विश्वकोश’ भी कहा जाता है।

  • निर्माण: इसका निर्माण मेवाड़ के महाराणा कुंभा ने 1440 से 1448 ई. के बीच करवाया था।
  • उद्देश्य: 1437 ई. में सारंगपुर के युद्ध में मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी पर मिली ऐतिहासिक जीत के उपलक्ष्य में इसे बनवाया गया था।
  • स्थापत्य विवरण:
    • यह 9 मंजिला इमारत है, जिसकी ऊंचाई 122 फीट है।
    • इसमें ऊपर जाने के लिए 157 सीढ़ियां हैं।
    • यह भगवान विष्णु को समर्पित है, इसलिए इसे ‘विष्णु ध्वज’ भी कहा जाता है।
    • इसके मुख्य वास्तुकार जैता और उनके पुत्र नापा, पूंजा और पोमा थे।
  • विशेष तथ्य: इसकी तीसरी मंजिल पर अरबी भाषा में 9 बार ‘अल्लाह’ लिखा हुआ है। कर्नल जेम्स टॉड ने इसकी तुलना रोम के ‘टार्जन टॉवर’ से और फर्ग्युसन ने ‘कुतुबमीनार’ से की है। यह राजस्थान पुलिस और माध्यमिक शिक्षा बोर्ड का प्रतीक चिह्न (Logo) भी है।

2. जैन कीर्ति स्तंभ, चित्तौड़गढ़ (Jain Kirti Stambh)

अक्सर लोग विजय स्तंभ और जैन कीर्ति स्तंभ में भ्रमित हो जाते हैं, लेकिन ये दोनों अलग हैं और चित्तौड़गढ़ किले में ही स्थित हैं।

  • निर्माण: इसका निर्माण 12वीं शताब्दी में एक जैन व्यापारी जीजाक राठौड़ (बघेरवाल महाजन) ने करवाया था।
  • स्थापत्य विवरण:
    • यह 7 मंजिला इमारत है।
    • इसकी ऊंचाई लगभग 75 फीट है।
  • समर्पण: यह स्तंभ जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ (ऋषभदेव) को समर्पित है। इसे ‘मेरु कनक प्रभ’ भी कहा जाता है। इसकी दीवारों पर जैन तीर्थंकरों की सुंदर मूर्तियां उकेरी गई हैं, जो इसे जैन संस्कृति का एक बेजोड़ नमूना बनाती हैं।

3. ईसरलाट (सरगासूली), जयपुर (Isarlat / Sargasuli)

जयपुर के त्रिपोलिया बाजार में स्थित यह मीनार शहर की सबसे ऊंची ऐतिहासिक इमारतों में से एक है।

  • निर्माण: इसका निर्माण जयपुर के राजा सवाई ईश्वरी सिंह ने 1749 ई. में करवाया था।
  • उद्देश्य: 1747 ई. में हुए राजमहल (टोंक) के युद्ध में अपने सौतेले भाई माधो सिंह और मराठों की संयुक्त सेना को हराने के उपलक्ष्य में इसे बनवाया गया था। ‘सरगासूली’ का अर्थ है – स्वर्ग को छूने वाली सीढ़ी।
  • विशेषता: यह 7 मंजिला अष्टकोणीय (Octagonal) मीनार है। इसकी वास्तुकला में राजपूत और मुगल शैली का मिश्रण नहीं, बल्कि यह कुतुबमीनार और चित्तौड़ के विजय स्तंभ से प्रेरित मानी जाती है।
  • दुखद अंत: दुर्भाग्यवश, बाद में मराठों के बढ़ते दबाव और गृहकलह के कारण ईश्वरी सिंह ने इसी लाट से कूदकर आत्महत्या कर ली थी।

4. निहाल टावर (घंटाघर), धौलपुर (Nihal Tower)

धौलपुर का निहाल टावर भारत का सबसे बड़ा और अनूठा घंटाघर माना जाता है।

  • निर्माण: इसका कार्य राजा निहाल सिंह ने 1880 ई. में शुरू करवाया था, जो 1910 ई. में राजा राम सिंह के समय में पूरा हुआ।
  • स्थापत्य: यह लाल पत्थर (Red Sandstone) से बनी 8 मंजिला (कुछ स्रोतों में 7, पर स्थानीय रूप से 8 मानी जाती है) इमारत है। इसकी ऊंचाई लगभग 150 फीट है।
  • विशेषता: इसकी घड़ी उस समय इंग्लैंड की मशहूर कंपनी ‘मैसर्स जिलेट जॉनसन’ से मंगवाई गई थी। यह टावर अपनी भव्यता और विशालता के लिए पूरे भारत में प्रसिद्ध है।

5. गमता गाजी की मीनार, जोधपुर (Gamta Gazi Minar)

यह जोधपुर के मेहरानगढ़ दुर्ग के पास स्थित एक ऐतिहासिक धार्मिक स्थल है।

  • विवरण: गमता गाजी एक सूफी संत और योद्धा थे। मारवाड़ के इतिहास में इनका विशेष स्थान है।
  • विशेषता: यह मीनार सांप्रदायिक सौहार्द का प्रतीक मानी जाती है। जोधपुर में राव जोधा के समय से ही सूफी संतों का सम्मान रहा है। यह मीनार अपनी सादगी और ऐतिहासिक महत्व के लिए जानी जाती है।

6. गूलर कालूदान की मीनार, जोधपुर (Gular Kaludan ki Minar)

जोधपुर की यह मीनार वास्तुकला का एक सुंदर नमूना है, जो अक्सर मुख्य धारा के इतिहास में दब जाती है।

  • इतिहास: इसका निर्माण जोधपुर के तत्कालीन प्रधानमंत्री सर प्रताप सिंह ने करवाया था। इसे लगभग 1937 ई. के आसपास बनवाया गया।
  • उद्देश्य: यह मीनार मारवाड़ राज्य के एक स्वामिभक्त कर्मचारी/हवलदार ‘कालूदान’ की याद में बनवाई गई थी। यह राजा और प्रजा (या स्वामी और सेवक) के बीच के प्रेम और सम्मान का दुर्लभ उदाहरण है।

7. परमार कालीन कीर्ति स्तंभ, जालौर (Parmar Kirti Stambh)

जालौर का किला (सुवर्णगिरी) अपने अभेद्य होने के लिए प्रसिद्ध है, और यहीं स्थित है यह प्राचीन स्तंभ।

  • निर्माण: इसे परमार वंश के शासकों द्वारा बनवाया गया था। इतिहासकार इसे परमार राजा वीसलदेव द्वारा निर्मित मानते हैं।
  • कला: यह लाल पत्थर से बना है और जैन धर्म से संबंधित है। परमार काल में जालौर कला और संस्कृति का केंद्र था। यह स्तंभ उस दौर की उत्कृष्ट नक्काशी को दर्शाता है। इसे ‘महान राजाओं की कीर्ति’ के रूप में देखा जाता है।

8. सफदरजंग की मीनार, अलवर (Safdarjung Minar)

अलवर जिले (विशेषकर तिजारा क्षेत्र के पास) में मुगल प्रभाव के कारण कई मीनारें देखने को मिलती हैं।

  • विवरण: यह मीनार मुगल स्थापत्य शैली का उत्कृष्ट उदाहरण है। इसका निर्माण सफदरजंग (जो अवध के नवाब और मुगल साम्राज्य में वजीर थे) के सम्मान या स्मृति से जुड़ा माना जाता है।
  • वास्तुकला: इसमें तीन मंजिलें हैं और ऊपर गुंबद है। इसमें लाल पत्थर और चूने का प्रयोग किया गया है।

9. नेहरू खां की मीनार, कोटा (Nehru Khan ki Minar)

हाड़ौती क्षेत्र में कोटा अपनी अलग स्थापत्य शैली रखता है।

  • विवरण: यह मीनार कोटा शहर में स्थित है। ऐतिहासिक रूप से यह कोटा रियासत में सेवारत पठान अधिकारियों या सामंतों से जुड़ी मानी जाती है। हालांकि इसके बारे में बहुत विस्तृत लिखित इतिहास उपलब्ध नहीं है, लेकिन स्थानीय वास्तुकला में इसका महत्व है।

10. क्लॉक टॉवर (घंटाघर), अजमेर (Clock Tower, Ajmer)

अजमेर में स्थित यह टॉवर ब्रिटिश वास्तुकला का नमूना है।

  • स्थान: यह अजमेर रेलवे स्टेशन के सामने और चर्च के नजदीक स्थित है।
  • निर्माण: इसका निर्माण 1887 ई. में महारानी विक्टोरिया की ‘गोल्डन जुबली’ (स्वर्ण जयंती) के उपलक्ष्य में किया गया था। यह इंडो-ब्रिटिश शैली का मिश्रण है और शहर के व्यस्ततम इलाके में समय का पहरेदार बनकर खड़ा है।

11. रामगढ़ टावर, जैसलमेर (Ramgarh Tower)

जैसलमेर के रामगढ़ क्षेत्र में स्थित यह संरचना आधुनिक और सामरिक महत्व की है।

  • महत्व: रामगढ़ में स्थित टीवी टावर (TV Tower) एशिया के सबसे ऊंचे टावरों में से एक माना जाता है। इसकी ऊंचाई लगभग 300 मीटर (एफिल टावर के करीब) है।
  • सामरिक दृष्टि: यह पाकिस्तान सीमा के बेहद करीब है, इसलिए इसका सामरिक महत्व भी है। यहाँ से रेडियो और दूरदर्शन का प्रसारण सीमावर्ती क्षेत्रों तक किया जाता है। (नोट: यदि संदर्भ ऐतिहासिक किले की बुर्ज का है, तो रामगढ़ का पुराना किला भी प्रसिद्ध है, लेकिन ‘टावर’ के रूप में टीवी टावर ही परीक्षाओं में पूछा जाता है)।

12. भीमलाट, बयाना – भरतपुर (Bhimlat)

यह राजस्थान के इतिहास का एक ‘छुपा हुआ रत्न’ है, जिसे अक्सर पहला विजय स्तंभ माना जाता है।

  • स्थान: यह बयाना दुर्ग (भरतपुर) में स्थित है।
  • निर्माण: इसका निर्माण गुप्त वंश के समय समुद्रगुप्त के सामंत विष्णुवर्धन (वरिक वंश) ने 371-372 ई. में करवाया था।
  • ऐतिहासिक तथ्य: इसे ‘राजस्थान का पहला विजय स्तंभ’ (First Victory Tower of Rajasthan) माना जाता है, जो कुतुबमीनार और चित्तौड़ के विजय स्तंभ से भी सदियों पुराना है। यह एक अखंड पत्थर (Monolith) से बना स्तंभ है।

13. अधर थंभ (खंभा), नागौर (Adhar Stambh)

नागौर अपनी रहस्यमयी कहानियों और सूफी दरगाहों के लिए जाना जाता है।

  • विशेषता: यह नागौर के किले या शहर के मध्य स्थित है। इसे “अधर” (Hanging) इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसकी वास्तुकला ऐसी है कि यह जमीन से थोड़ा ऊपर उठा हुआ प्रतीत होता है (या इसके बारे में किंवदंती है कि यह बिना आधार के खड़ा था)। यह वास्तुकला का एक चमत्कार माना जाता है।

अन्य महत्वपूर्ण स्तंभ और मीनारें (Quick Facts)

  1. जसवंत थड़ा (जोधपुर): इसे ‘राजस्थान का ताज’ कहा जाता है, लेकिन इसकी मीनारें और गुंबद भी दर्शनीय हैं।
  2. एक थंबिया महल (डूंगरपुर): यह गेप सागर झील के पास स्थित है, जिसे शिव ज्ञानेश्वर शिवालय भी कहते हैं। यह वास्तव में एक विशाल स्तंभ जैसा महल है।
  3. बट्टाडू का कुआं (बाड़मेर): हालांकि यह कुआं है, लेकिन इसकी भव्य संगमरमर की गरुड़ प्रतिमा और प्रवेश द्वार किसी स्तंभ से कम नहीं हैं।
  4. वेलिंगटन क्लॉक टॉवर (सीकर): यह भी ब्रिटिश काल का एक प्रमुख घंटाघर है।

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