कोटा में 123 करोड़ का सफाई टेंडर घोटाला: डीबार फर्म को दिया ठेका, UDH मंत्री के आदेश भी दरकिनार

कोटा: कोटा दक्षिण नगर निगम के अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं, जहाँ 123 करोड़ रुपये का बड़ा सफाई ठेका नियमों को ताक पर रखकर एक ऐसी फर्म को दे दिया गया जिसकी मुख्य पार्टनर कंपनी पहले से ही प्रतिबंधित (Debarred) है। यह ठेका ‘एसपीएस ट्रैश हैंडलर्स जेवी’ (ज्वॉइंट वेंचर) को दिया गया है, जिसकी लीड पार्टनर फर्म ‘मेसर्स सुखपाल सिंह कंस्ट्रक्शन’ सरकारी टेंडर प्रक्रिया में भाग लेने से प्रतिबंधित है। चौंकाने वाली बात यह है कि फर्म ने टेंडर दस्तावेजों के साथ डीबार न होने का झूठा शपथ पत्र पेश किया और निगम के अधिकारियों ने उपलब्ध दस्तावेजों के बावजूद इस बड़ी अनियमितता को नजरअंदाज कर वर्क ऑर्डर जारी कर दिया।

झालावाड़ नगर परिषद ने 3 साल के लिए किया था ब्लैकलिस्ट

जांच में सामने आया है कि झालावाड़ नगर परिषद ने 19 अक्टूबर 2023 को ही मेसर्स सुखपाल सिंह कंस्ट्रक्शन को तीन साल के लिए डीबार किया था। नियमानुसार, टेंडर लेने के लिए ज्वॉइंट वेंचर की दोनों कंपनियों का बेदाग होना अनिवार्य है, लेकिन इस मामले में तथ्यों को छुपाया गया। झालावाड़ नगर परिषद के आयुक्त अशोक शर्मा ने पुष्टि की है कि फर्म 2023 से वर्तमान में भी डीबार है और इसकी सूचना पूर्व में ही संबंधित विभागों को भेजी जा चुकी थी। इसके बावजूद कोटा दक्षिण नगर निगम ने अनुभव की शर्तों में बदलाव कर और पुराने अनुभवों को दरकिनार कर इस कंपनी को लाभ पहुँचाया।

यूडीएच मंत्री के जांच के निर्देश के बाद भी अधिकारियों ने दी मंजूरी

इस टेंडर में गड़बड़ी की शिकायत 9 मई 2025 को यूडीएच राज्य मंत्री झाबर सिंह खर्रा को की गई थी, जिसके बाद मंत्री ने 15 मई 2025 को निदेशक को मामले की गहन जांच के निर्देश दिए थे। हालांकि, मंत्री के आदेश की अवहेलना करते हुए नगर निगम ने महज 11 दिन बाद, यानी 26 मई को टेंडर की अंतिम स्वीकृति दे दी। अधिकारियों ने इस दौरान तकनीकी बिड की शर्तों में भी कई बदलाव किए, जैसे अनुभव की अवधि को 7 साल से बढ़ाकर 10 साल करना और टेंडर की अंतिम तिथि अचानक बढ़ाना, जिसे सीधे तौर पर फर्म को फायदा पहुँचाने की कोशिश माना जा रहा है।

1.40 लाख घरों से कचरा कलेक्शन का है काम, 210 टीपर खरीदे

यह सफाई ठेका कोटा दक्षिण के करीब 1.40 लाख घरों से कचरा कलेक्शन के लिए दिया गया है, जिसमें 210 नए टीपर निगम के संसाधनों से खरीदे गए हैं। इस पूरे सिस्टम की निगरानी के लिए अतिरिक्त 7 करोड़ रुपये का अलग से प्रावधान किया गया है। विभागीय सूत्रों के अनुसार, अधिकारियों ने डीबार फर्म को बचाने के लिए आरटीपीपी एक्ट के नियमों की भी अनदेखी की। फिलहाल, संभागीय आयुक्त एवं निगम प्रशासक अंशुल अग्रवाल ने मामले की जांच कर कड़ी कार्रवाई करने का आश्वासन दिया है।

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