आज जब हम अमीरों की बात करते हैं, तो एलन मस्क, जेफ बेजोस या अंबानी-अडानी का नाम जुबान पर आता है। लेकिन, 17वीं और 18वीं शताब्दी में भारत में एक ऐसा घराना था, जिसकी दौलत के आगे आज के अरबपतियों की चमक भी फीकी पड़ जाए। यह कहानी है राजस्थान की मिट्टी से निकले ‘जगत सेठ’ (Jagat Seth) घराने की, जिसे उस दौर का ‘Banker of the World’ (दुनिया का साहूकार) कहा जाता था।
इतिहास के पन्नों में दर्ज आंकड़ों के मुताबिक, इस परिवार के पास इतनी संपत्ति थी कि वे ब्रिटेन के सभी बैंकों को मिलाकर भी उनसे ज्यादा अमीर थे।
राजस्थान के नागौर से हुई थी शुरुआत
इस रसूखदार घराने की जड़ें राजस्थान के नागौर (Nagaur) जिले से जुड़ी हैं। 17वीं सदी में इस मारवाड़ी जैन (ओसवाल) परिवार के पूर्वज हीरानंद साहू अपनी किस्मत आजमाने के लिए राजस्थान से पटना और फिर बंगाल आए थे। उनके दत्तक पुत्र सेठ माणिकचंद (Seth Manikchand) ने परिवार के कारोबार को नई ऊंचाइयों पर पहुँचाया। उन्होंने मुर्शिदाबाद को अपना केंद्र बनाया, जो उस समय व्यापार का गढ़ था।
‘जगत सेठ’ की उपाधि और दुनिया का सबसे बड़ा बैंक
इस परिवार का असली उत्कर्ष फतेहचंद (Fatehchand) के समय में हुआ, जो माणिकचंद के भतीजे और दत्तक पुत्र थे।
- उपाधि: 1723 में मुगल बादशाह मुहम्मद शाह ने फतेहचंद को ‘जगत सेठ’ की उपाधि से नवाजा। इसका अर्थ था- ‘पूरे संसार का सेठ’।
- दौलत का अंबार: ब्रिटिश दस्तावेजों के अनुसार, 1720 के दशक में जगत सेठ घराने की कुल संपत्ति लगभग 10 मिलियन पाउंड (उस समय की मुद्रा में) थी। अगर आज के हिसाब से (महंगाई और सोने की कीमत जोड़कर) इसका आकलन करें, तो यह रकम 1000 बिलियन पाउंड से भी ज्यादा बैठती है।
- अंग्रेजों से ज्यादा पैसा: एक समय ऐसा था जब अकेले जगत सेठ की संपत्ति, बैंक ऑफ इंग्लैंड (Bank of England) सहित ब्रिटेन के सभी बैंकों की कुल जमा पूंजी से भी अधिक थी। ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी भी अपने व्यापार और युद्धों के लिए इन्हीं से कर्ज लेती थी।
सोने-चांदी से गंगा रोकने की थी ताकत
इस घराने के बारे में एक मशहूर कहावत थी कि “जगत सेठ के पास इतनी सोने-चांदी की मुहरें हैं कि अगर वे चाहें तो मुर्शिदाबाद में बहने वाली भागीरथी (गंगा) नदी की धारा को भी रोक सकते हैं।” यह परिवार न केवल बैंकर था, बल्कि उनके पास शाही टकसाल (Mint) चलाने का अधिकार भी था, यानी वे अपने सिक्के खुद ढालते थे। बंगाल, बिहार और ओडिशा का पूरा राजस्व (Tax) इन्हीं के जरिए मुगलों तक पहुँचता था।
पलासी के युद्ध और अंग्रेजों की जीत में भूमिका
जगत सेठ घराना केवल व्यापार तक सीमित नहीं था, वे ‘किंगमेकर’ थे।
- सिराज-उद-दौला से विवाद: बंगाल के नवाब सिराज-उद-दौला ने एक बार जगत सेठ महताब चंद का अपमान कर दिया था और उन्हें थप्पड़ मार दिया था।
- बदला और पलासी की लड़ाई (1757): अपमान का बदला लेने के लिए जगत सेठ ने रॉबर्ट क्लाइव (Robert Clive) का साथ दिया। उन्होंने अंग्रेजों को नवाब के खिलाफ युद्ध लड़ने के लिए भारी धनराशि दी। इतिहासकारों का मानना है कि अगर जगत सेठ का पैसा और समर्थन नहीं होता, तो अंग्रेज भारत में कभी अपने पैर नहीं जमा पाते।
दुखद अंत: अंग्रेजों ने ही किया किनारा
विडंबना देखिए, जिस परिवार ने अंग्रेजों को भारत का शासक बनाने में मदद की, अंत में अंग्रेजों ने ही उन्हें बर्बाद कर दिया। 1757 के बाद अंग्रेजों को जगत सेठ के पैसे की जरूरत नहीं रही क्योंकि उन्हें बंगाल का राजस्व मिल गया था।
- हत्या: 1763 में नवाब मीर कासिम ने इस परिवार के दो प्रमुख सदस्यों—जगत सेठ महताब चंद और स्वरूप चंद—को पकड़ लिया और मुंगेर के किले से गंगा नदी में फेंककर मरवा दिया।
- पतन: इसके बाद, ईस्ट इंडिया कंपनी ने इस घराने का कर्ज चुकाने से भी मना कर दिया और धीरे-धीरे दुनिया का सबसे अमीर घराना इतिहास के पन्नों में सिमट कर रह गया।
आज भी मुर्शिदाबाद में उनका खंडहर हो चुका महल ‘जगत सेठ का घर’ उनकी उस अविश्वसनीय अमीरी की गवाही देता है, जिसकी शुरुआत राजस्थान के रेगिस्तान से हुई थी।
