भारत की सनातन परंपरा में आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा यानी ‘गुरु पूर्णिमा’ (व्यास पूर्णिमा) का स्थान सर्वोच्च है। यह दिन केवल शिक्षकों को नमन करने का नहीं, बल्कि उस ‘तत्व’ को पूजने का है जो अज्ञान के तिमिर को हरकर ज्ञान का प्रकाश फैलाता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के लिए यह पर्व महज एक औपचारिकता नहीं, बल्कि संगठन की आत्मा है। संघ के छह प्रमुख उत्सवों में से एक इस पर्व पर स्वयंसेवक एक अनूठी मिसाल पेश करते हैं—वे किसी हाड़-मांस के इंसान के आगे नहीं, बल्कि राष्ट्र की संस्कृति के प्रतीक ‘भगवा ध्वज’ के आगे नतमस्तक होते हैं।
आखिर संघ ने किसी महापुरुष को अपना गुरु क्यों नहीं बनाया? भगवा ही क्यों? आइए, इन प्रश्नों के उत्तर इतिहास और दर्शन की गहराई में तलाशते हैं।
1. डॉ. हेडगेवार की दूरदृष्टि: ‘व्यक्ति नश्वर है, तत्व अमर है’
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना के समय संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के सामने यह प्रश्न था कि इस संगठन का मार्गदर्शक या गुरु किसे बनाया जाए? उस समय कई महान विभूतियां जीवित थीं। लेकिन डॉक्टर साहब का चिंतन बहुत स्पष्ट और मनोवैज्ञानिक था।
उनका मानना था कि “मनुष्य कितना भी महान क्यों न हो, उसमें कभी न कभी दोष आ सकते हैं, उसका मन बदल सकता है या वह नश्वर है।” यदि संगठन किसी व्यक्ति पर केंद्रित होगा, तो उस व्यक्ति के चले जाने या पथभ्रष्ट होने पर संगठन भी बिखर जाएगा। गुरु ऐसा होना चाहिए जो कालजयी हो, विकार रहित हो और सदैव प्रेरणा का स्रोत बना रहे। इसलिए उन्होंने ‘व्यक्ति पूजा’ को नकारते हुए ‘तत्व पूजा’ की नींव रखी और भगवा ध्वज को गुरु के पद पर आसीन किया।
2. भगवा ध्वज: भारतीय संस्कृति की ‘जीवन रेखा’
संघ के विचार में भगवा ध्वज केवल कपड़े का टुकड़ा नहीं है, बल्कि यह भारत की हजारों वर्षों की तपस्या, त्याग और पराक्रम का मूक साक्षी है। इसे गुरु मानने के पीछे कई गहरे आयाम हैं:
- यज्ञ की ज्वाला: वैदिक काल से ही भारत में यज्ञ की परंपरा रही है। यज्ञ कुंड से जो अग्नि की लपटें उठती हैं, उनका रंग भगवा होता है। यह रंग हमें संदेश देता है कि जैसे आग सब कुछ जलाकर शुद्ध कर देती है और खुद ऊपर की ओर उठती है, वैसे ही हमें अपना जीवन राष्ट्र के लिए समर्पित (हवन) कर देना चाहिए।
- प्रकृति का शाश्वत रंग: जब सूर्य उगता है, तो वह भगवा होता है और जब डूबता है, तब भी भगवा होता है। यह रंग अंधकार (अज्ञान) के नाश और प्रकाश (ज्ञान) के आगमन का प्राकृतिक प्रतीक है।
- त्याग का वेश: भारत के ऋषि-मुनियों और संतों ने इसी रंग के वस्त्र धारण कर समाज सेवा और मोक्ष का मार्ग चुना। यह रंग भोग का नहीं, ‘त्याग’ का प्रतीक है।
3. इतिहास के पन्नों में भगवा: शौर्य की पहचान
भगवा ध्वज का इतिहास भारत के शौर्य के इतिहास से जुड़ा है।
- छत्रपति शिवाजी महाराज: जब शिवाजी महाराज ने हिंदवी स्वराज्य की स्थापना की, तो उन्होंने अपने गुरु समर्थ रामदास के कहने पर भगवा ध्वज को ही अपने राज्य का निशान बनाया।
- महाराणा प्रताप और रानी लक्ष्मीबाई: विदेशी आक्रांताओं के विरुद्ध हुए संघर्षों में, चाहे वह मेवाड़ के महाराणा प्रताप हों या 1857 की क्रांति में झांसी की रानी, सभी ने इसी ध्वज की छाया में धर्म और राष्ट्र की रक्षा के लिए युद्ध किया।
- सिख परंपरा: सिखों के दसवें गुरु और खालसा पंथ का इतिहास भी इसी रंग के बलिदानों से रंगा हुआ है।
4. भारत की गुरु-शिष्य परंपरा का वाहक
यह उत्सव भारत की उस महान परंपरा का स्मरण कराता है, जिसने विश्व को ज्ञान दिया।
- मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने वशिष्ठ और विश्वामित्र जैसे ऋषियों के चरणों में बैठकर ज्ञान और शस्त्र विद्या पाई।
- योगेश्वर श्रीकृष्ण ने संदीपन ऋषि के आश्रम में सामान्य शिष्य की भांति सेवा कर शिक्षा ग्रहण की।
- परशुराम और द्रोणाचार्य जैसे गुरुओं ने कर्ण और अर्जुन जैसे महायोद्धा तैयार किए।
5. संघ शाखा में गुरु पूजा: संस्कार और समर्पण
गुरु पूर्णिमा के दिन संघ की शाखाओं में एक विशेष दृश्य होता है। स्वयंसेवक पूर्ण गणवेश में ध्वज लगाते हैं। वैदिक मंत्रों का उच्चारण होता है:
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु र्गुरुर्देवो महेश्वरः | गुरु साक्षात परब्रह्मा तस्मै श्रीगुरवे नमः ||
इसके बाद स्वयंसेवक ध्वज के सम्मुख अपना ‘समर्पण’ (गुरु दक्षिणा) अर्पित करते हैं। यह समर्पण केवल धन का नहीं, बल्कि अपने अहंकार, अपने समय और अपनी प्रतिभा का समर्पण होता है। संघ का मानना है कि गुरु (ध्वज) के माध्यम से ही हमें संस्कार मिलते हैं और राष्ट्र कार्य करने का बल प्राप्त होता है।
निष्कर्ष: आज के दौर में जब दुनिया में व्यक्तिवाद (Individualism) हावी है, संघ का यह उत्सव ‘समष्टिवाद’ (Collectivism) का संदेश देता है। भगवा ध्वज को गुरु मानकर स्वयंसेवक यह संकल्प दोहराते हैं कि वे किसी नेता के पीछे नहीं, बल्कि एक शाश्वत विचार और राष्ट्र के पीछे चल रहे हैं।
