“पणिहारी जी रे… ओ पणिहारी…” रेगिस्तान की तपती रेत हो या उत्तर भारत के ग्रामीण इलाके, एक समय था जब शाम ढलते ही कुओं और तालाबों के किनारे चूड़ियों की खनक और पायलों की छनछन गूंज उठती थी। यह आहट थी ‘पणिहारी’ की।
आज जब हमारे घरों में ‘हर घर नल’ और ‘आरओ’ (RO) की सुविधाएं पहुंच गई हैं, तो सुविधा तो बढ़ी है, लेकिन हमारी शब्दावली से एक बेहद खूबसूरत शब्द और संस्कृति विलुप्त होती जा रही है। आज की ‘Gen-Z’ या युवा पीढ़ी को शायद पता भी नहीं कि ‘पणिहारी’ कौन होती थी और भारतीय संस्कृति में उसका क्या स्थान था। आइए, इस खोती हुई विरासत को करीब से जानते हैं।
1. कौन है पणिहारी? (अर्थ और परिभाषा)
शाब्दिक अर्थ में पणिहारी (Panihari) दो शब्दों से मिलकर बना है—’पानी’ और ‘हारी’ (लाने वाली)। अर्थात्, वह स्त्री जो दूर-दराज के कुओं, तालाबों, बावड़ियों या नाड़ी (तालाब) से सिर पर मटका रखकर अपने घर के लिए पानी लाती है, उसे पणिहारी कहा जाता है। राजस्थान की भीषण गर्मी में जब पानी मीलों दूर मिलता था, तब ये महिलाएं ही परिवार की जीवनरेखा हुआ करती थीं।
2. केवल पानी लाना नहीं, यह था महिलाओं का ‘सोशल मीडिया’
पुराने समय में जब समाज में पर्दा प्रथा थी और महिलाओं को घर से निकलने की आजादी कम थी, तब ‘पनघट’ (Panghat) ही वह एकमात्र जगह थी जहाँ महिलाएं खुलकर सांस ले सकती थीं।
- सुख-दुख का साझा मंच: पणिहारी का सफर केवल पानी लाने का नहीं था। यह वह समय था जब महिलाएं अपनी सहेलियों से मिलती थीं, अपने सुख-दुख साझा करती थीं और सास-बहू के किस्सों पर हंसती-बोलती थीं।
- संस्कृति का केंद्र: पनघट पर ही नए लोकगीत बनते थे। पणिहारी गीत भारतीय लोक संगीत की एक अलग विधा बन गई। “मिश्री को बाग लगा दे रसिया” या “पल्लो लटके” जैसे गीत इसी संस्कृति की देन हैं।
3. संतुलन और सौंदर्य की मिसाल
पणिहारी का दृश्य अपने आप में कलात्मक था।
- इंडोनी का महत्व: सिर पर मटके को संतुलित करने के लिए कपड़े या नारियल की रस्सी से बनी गोल गद्दी, जिसे ‘इंडोनी’ (Indoni) कहा जाता है, का प्रयोग होता था। इस इंडोनी पर बेशकीमती मोती और सजावट होती थी।
- गजब का संतुलन: एक पणिहारी अपने सिर पर एक के ऊपर एक 2 से 3 मटके रखकर, बिना हाथ लगाए मीलों चल सकती थी। उनकी चाल में एक विशेष लय (Rhythm) होती थी, जिसे कवियों ने अपनी कविताओं में ‘हंस गामिनी’ कहा है।
4. क्यों विलुप्त हो रहा है यह शब्द?
आधुनिकता ने जीवन को आसान बनाया है।
- पाइपलाइन और टैंकर: अब पानी के लिए मीलों चलना नहीं पड़ता। घर में नल है, मोटर है।
- बदलती जीवनशैली: सुविधा संपन्न होने के साथ ही मटके की जगह प्लास्टिक की बोतलों और फ्रिज ने ले ली है।
- नुकसान: शारीरिक श्रम कम होने से स्वास्थ्य समस्याएं बढ़ी हैं और सामुदायिक मिलन (Community Bonding) का वह बहाना खत्म हो गया है।
निष्कर्ष: यादों में जिंदा रहे विरासत
आज भले ही पणिहारी का दृश्य दुर्लभ हो गया हो, लेकिन यह शब्द भारतीय नारी के संघर्ष, उसके धैर्य और उसकी सुंदरता का प्रतीक है। यह जरूरी है कि हम अपनी नई पीढ़ी को बताएं कि एक गिलास पानी के लिए हमारे पूर्वजों (माताओं-बहनों) ने कितना पसीना बहाया है, ताकि वे पानी की कीमत समझ सकें और अपनी जड़ों से जुड़े रहें।
