राजस्थान में आगामी पंचायत और स्थानीय निकाय चुनावों से ठीक पहले भजनलाल सरकार ने एक बेहद बड़ा और ऐतिहासिक फैसला लिया है। राज्य सरकार ने पंचायत और निकाय चुनाव लड़ने की योग्यता के नियमों में बड़ा बदलाव करते हुए दो से अधिक संतान वाले उम्मीदवारों को भी चुनाव लड़ने की अनुमति दे दी है। इस फैसले के बाद अब वे लोग भी सरपंच, पंच और पार्षद का चुनाव लड़ सकेंगे, जिनके दो से ज्यादा बच्चे हैं। यह उन हजारों संभावित उम्मीदवारों और सक्रिय जमीनी नेताओं के लिए एक बड़ी राहत है, जो पिछले कई सालों से इस नियम के कारण चुनाव लड़ने से वंचित रह जाते थे।
क्यों हटाया गया 31 साल पुराना यह प्रतिबंध?
इस बड़े फैसले के पीछे का मुख्य कारण राज्य में प्रजनन दर (Fertility Rate) में आई भारी कमी और जनप्रतिनिधियों को समान अवसर प्रदान करना है। उपमुख्यमंत्री प्रेमचंद बैरवा, उद्योग मंत्री राज्यवर्धन राठौड़ और संसदीय कार्य मंत्री जोगाराम पटेल के अनुसार, जब यह नियम लागू किया गया था (वर्ष 1991-94 के बीच), तब राज्य की प्रजनन दर 3.6 थी और जनसंख्या विस्फोट को रोकना बेहद जरूरी था। वर्तमान में यह दर घटकर 2 रह गई है, जिससे इस प्रतिबंध का औचित्य अब खत्म सा हो गया था। इसके अलावा, सांसद और विधायक के चुनाव में ऐसी कोई पाबंदी नहीं होने के कारण निचले स्तर के जनप्रतिनिधियों को भी समान अवसर देने की पुरजोर मांग उठ रही थी। सरकारी कर्मचारियों के प्रमोशन से भी यह शर्त पहले ही हटाई जा चुकी है।
इसी विधानसभा सत्र में पारित होंगे दोनों विधेयक
कानून मंत्री जोगाराम पटेल ने स्पष्ट किया है कि कैबिनेट ने इस बदलाव को अपनी मंजूरी दे दी है। इसके लिए ‘राजस्थान पंचायती राज अधिनियम, 1994’ की धारा-19 और ‘राजस्थान नगरपालिका अधिनियम 2009’ की धारा-24 में संशोधन किया जाएगा। सरकार की तैयारी है कि ‘राजस्थान पंचायतीराज संशोधन बिल’ और ‘राजस्थान नगरपालिका संशोधन बिल 2026’ को इसी वर्तमान विधानसभा सत्र में ही पेश करके पारित करा लिया जाए। इन दोनों विधेयकों के कानून बनते ही दो से अधिक संतानों वाले व्यक्तियों पर लगी चुनाव लड़ने की रोक पूरी तरह से समाप्त हो जाएगी।
1995 में भैरोंसिंह शेखावत सरकार ने लगाया था नियम
गौरतलब है कि यह नियम 31 साल पहले वर्ष 1995 में तत्कालीन मुख्यमंत्री भैरोंसिंह शेखावत के कार्यकाल में लागू किया गया था, जिसका मुख्य उद्देश्य जनसंख्या नियंत्रण को बढ़ावा देना था। नियम लागू होने के बाद कई निर्वाचित प्रतिनिधियों की सदस्यता समाप्त भी हुई थी, जिस पर काफी सियासी बवाल मचा था। 1997 में राजस्थान हाईकोर्ट ने भी इस कदम को सही ठहराया था। पिछले कई सालों से कांग्रेस और बीजेपी दोनों ही पार्टियों के नेता, जिनमें हेमाराम चौधरी, चंद्रभान सिंह आक्या और वर्तमान मंत्री झाबर सिंह खर्रा शामिल हैं, इस नियम को खत्म करने की लगातार मांग कर रहे थे।
