जयपुर: राजस्थान की उप मुख्यमंत्री और वित्त मंत्री दीया कुमारी ने विधानसभा में बजट बहस का जवाब देते हुए राज्य के सरकारी कर्मचारियों और युवाओं के लिए बड़े चुनावी वादों को हकीकत में बदलने की दिशा में कदम बढ़ाया है। सरकार ने उन नियमों में ढील दी है जो दशकों से कर्मचारियों के लिए मानसिक और आर्थिक बोझ बने हुए थे।
1. वेतन-भत्तों की वसूली पर पूर्ण रोक
अब तक के नियम के अनुसार, यदि कोई कर्मचारी अपनी दो साल की प्रोबेशन (ट्रेनिंग) अवधि के दौरान किसी दूसरी बेहतर नौकरी में चयन होने पर पद छोड़ता था, तो उससे ट्रेनिंग के दौरान मिले वेतन और भत्तों की वसूली की जाती थी।
- बदलाव: सरकार ने इस वसूली को अब पूरी तरह खत्म कर दिया है। यह उन मेधावी युवाओं के लिए बड़ी राहत है जो करियर में निरंतर आगे बढ़ना चाहते हैं।
2. रिटायरमेंट तक ‘बीमा सुरक्षा कवच’
राज्य कर्मचारियों के लिए एक और बड़ी घोषणा करते हुए वित्त मंत्री ने कहा कि अब कर्मचारियों को उनकी सेवानिवृत्ति (Retirement) तक अनिवार्य बीमा सुरक्षा (Insurance Cover) मिलती रहेगी। इससे न केवल कर्मचारी बल्कि उनके परिवार का भविष्य भी अधिक सुरक्षित होगा।
आंकड़ों की बाजीगरी: राजकोषीय घाटे पर प्रहार
वित्त मंत्री ने विपक्ष के ‘खजाना खाली’ होने के दावों पर पलटवार करते हुए राजकोषीय घाटे (Fiscal Deficit) को कम करने का एक स्पष्ट रोडमैप पेश किया। उन्होंने शायराना अंदाज में तंज कसा:
“खजाना खाली कर गए और सीख हमें देते हैं, घाटे के बीज बोकर हिसाब हमसे लेते हैं।”
राजकोषीय घाटा (GSDP का %): | कालखंड / लक्ष्य | राजकोषीय घाटा (अनुमानित) |
| कांग्रेस शासन काल | 4.4% | | लक्ष्य 2025-26 | 3.87% | | लक्ष्य 2026-27 | 3.69% |
विपक्ष के आरोपों का जवाब: “पढ़ तो लिया, यह अच्छी बात है”
नेता प्रतिपक्ष द्वारा शिक्षा और कृषि बजट में कटौती के आरोपों को दीया कुमारी ने सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने आंकड़ों के साथ स्पष्ट किया:
- कृषि बजट: पिछली सरकार की तुलना में 34% अधिक आवंटित किया गया है।
- शिक्षा बजट: इसमें भी पिछले वर्षों के मुकाबले महत्वपूर्ण बढ़ोतरी की गई है।
उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि यह जानकर खुशी हुई कि विपक्ष ने कम से कम बजट पढ़ तो लिया है, भले ही उसे समझने में उनसे चूक हुई हो।
निष्कर्ष: ‘सबका साथ’ का मंत्र
दीया कुमारी के इस जवाब ने यह साफ कर दिया है कि सरकार का विजन केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि वह राज्य के ‘सेवादारों’ (कर्मचारियों) की कार्यदशा सुधारने और युवाओं को बेहतर अवसर देने के लिए प्रतिबद्ध है। नौकरी छोड़ने पर वसूली बंद करने का फैसला प्रशासनिक सुधार की दिशा में एक ‘संजीवनी’ माना जा रहा है।
