भारत, जिसे अपनी समृद्ध संस्कृति, इतिहास और वास्तुकला के लिए जाना जाता है, अपने दामन में कई ऐसे रहस्य भी समेटे हुए है जिन पर विज्ञान और तर्कशास्त्र भी निरुत्तर हो जाते हैं। इन्हीं रहस्यों में सबसे गहरा और डरावना नाम है—भानगढ़ (Bhangarh)। राजस्थान के अलवर जिले में अरावली की पहाड़ियों और सरिस्का के घने जंगलों के बीच स्थित यह किला आज एक ‘वीरान खंडहर’ से ज्यादा कुछ नहीं है, लेकिन इसकी दीवारें आज भी उस खौफनाक अतीत की गवाही देती हैं, जिसने एक खुशहाल नगर को ‘भूतों के डेरे’ में बदल दिया।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा संरक्षित यह एकमात्र ऐसा ऐतिहासिक स्थल है, जहां “सूर्यास्त के बाद और सूर्योदय से पहले प्रवेश वर्जित है”। आखिर ऐसा क्या है इन दीवारों के पीछे? क्यों इसे भारत का ही नहीं, बल्कि एशिया का सबसे डरावना स्थान (Most Haunted Place) माना जाता है? आइए, इस विशेष रिपोर्ट में भानगढ़ के इतिहास, किंवदंतियों और वर्तमान स्थिति की गहराइयों में उतरते हैं।
खंडहरों में गूंजती है अतीत की भव्यता
भानगढ़ का किला 17वीं शताब्दी का एक शानदार निर्माण था। इसे आमेर के कछवाहा शासक राजा भगवंत दास ने 1583 ईस्वी में अपने छोटे बेटे माधो सिंह के लिए बनवाया था। माधो सिंह, मुगल बादशाह अकबर के नवरत्नों में शामिल और महान सेनापति मानसिंह के छोटे भाई थे।
उस समय भानगढ़ की भव्यता देखते ही बनती थी। नगर नियोजन (Town Planning) इतना बेहतरीन था कि आज भी खंडहरों को देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है। एक समय यहां 10,000 से अधिक लोगों की आबादी थी। आलीशान महल, कतारबद्ध बाजार, नर्तकियों की हवेलियां और भव्य मंदिर इस नगर की पहचान थे। लेकिन आज, यहां केवल बिना छत की दीवारें, वीरान रास्ते और एक अजीब सी खामोशी बची है।
भानगढ़ का भूगोल: प्रकृति और डर का संगम
भौगोलिक दृष्टि से भानगढ़ एक बेहद खूबसूरत लेकिन दुर्गम स्थान पर स्थित है। यह तीन तरफ से अरावली की पहाड़ियों से घिरा हुआ है, जो इसे सुरक्षित तो बनाती थीं, लेकिन आज यही पहाड़ियां इसे एक ‘मौत के कुएं’ जैसा डरावना लुक देती हैं। किले के परिसर में प्रवेश करते ही ‘केवड़े’ (Kewda) के पेड़ों की भरमार मिलती है। अजीब बात यह है कि केवड़े की खुशबू और खंडहरों की सीलन भरी बदबू मिलकर यहां एक ऐसा वातावरण बनाती हैं, जो किसी भी इंसान को असहज (Uncomfortable) करने के लिए काफी है।
वह श्राप जिसने सब कुछ तबाह कर दिया
भानगढ़ के वीरान होने के पीछे दो प्रमुख किंवदंतियां (Legends) प्रचलित हैं। स्थानीय लोग और इतिहासकार दोनों ही इन कहानियों को इस जगह की तबाही का कारण मानते हैं।
1. गुरु बालू नाथ का श्राप: “जिस दिन छाया मुझे छू लेगी, नगर मिट जाएगा”
पहली कहानी राजा माधो सिंह और एक तपस्वी गुरु बालू नाथ से जुड़ी है। कहा जाता है कि जहां आज भानगढ़ का किला है, वहां सदियों पहले गुरु बालू नाथ तपस्या किया करते थे। जब राजा भगवंत दास ने यहां किला बनवाने का फैसला किया, तो उन्होंने गुरु बालू नाथ से अनुमति मांगी। गुरु ने एक शर्त पर अनुमति दी: “तुम किला बनवा सकते हो, लेकिन ध्यान रहे, तुम्हारे महलों की परछाई कभी मेरी तपस्या स्थली (धूनी) पर नहीं पड़नी चाहिए। जिस दिन परछाई ने मुझे छू लिया, वह दिन इस नगर का आखिरी दिन होगा।”
राजा ने शर्त मान ली और किले का निर्माण शुरू हुआ। माधो सिंह के समय तक सब ठीक रहा। लेकिन उनके बाद आए उत्तराधिकारियों, विशेषकर अजब सिंह, ने इस चेतावनी को नजरअंदाज कर दिया। उन्होंने महल को और ऊंचा करवाया, जिससे उसकी परछाई गुरु बालू नाथ के आश्रम पर जा पड़ी। क्रोधित तपस्वी का श्राप सच साबित हुआ। कहा जाता है कि एक भयंकर विपदा (संभवतः अकाल या युद्ध) आई और पूरा नगर नष्ट हो गया। आज भी बालू नाथ की ‘छतरी’ (समाधि) वहां मौजूद है, जो इस कहानी की याद दिलाती है।
2. रानी रत्नावती और तांत्रिक सिंघिया सेवड़ा: एक तरफा प्यार की खौफनाक दास्तान
दूसरी और सबसे चर्चित कहानी भानगढ़ की राजकुमारी रानी रत्नावती और एक काले जादूगर (तांत्रिक) सिंघिया सेवड़ा की है। रानी रत्नावती, जो भानगढ़ के राजा छत्रसिंह की पत्नी थीं, अपनी सुंदरता के लिए पूरे राजपूताना में प्रसिद्ध थीं। उनकी रूप-लावण्य की चर्चा दूर-दूर तक थी।
उसी राज्य में सिंघिया सेवड़ा नाम का एक तांत्रिक रहता था, जो काले जादू में माहिर था। वह रानी रत्नावती पर मोहित हो गया, लेकिन वह जानता था कि रानी उसे कभी स्वीकार नहीं करेंगी। उसने तंत्र-मंत्र के जरिए रानी को पाने की साजिश रची।
इत्र की शीशी और काला जादू: एक दिन रानी रत्नावती अपनी सखियों के साथ बाजार में इत्र (Perfume) खरीदने गईं। तांत्रिक ने मौका पाकर उस इत्र की शीशी पर वशीकरण मंत्र फूंक दिया, जिसे रानी खरीदने वाली थीं। उसका मकसद था कि जैसे ही रानी वह इत्र लगाएंगी, वे सम्मोहित होकर खुद उसके पास चली आएंगी। लेकिन रानी रत्नावती भी तंत्र विद्या की जानकार थीं। उन्होंने इत्र की शीशी को हाथ में लेते ही तांत्रिक की चाल भांप ली। गुस्से में रानी ने वह शीशी पास ही पड़े एक बड़े पत्थर (चट्टान) पर दे मारी।
पत्थर का बदला और तांत्रिक की मौत: काले जादू के असर से वह भारी-भरकम पत्थर, जिस पर इत्र गिरा था, लुढ़कता हुआ सीधे तांत्रिक सिंघिया की ओर जाने लगा और उसे कुचल दिया। मरते-मरते तांत्रिक ने भानगढ़ को श्राप दिया: “इस नगर के लोग जल्द ही मर जाएंगे और उनकी आत्माएं यहां सदियों तक भटकती रहेंगी। यह शहर कभी दोबारा नहीं बस पाएगा।”
कहा जाता है कि इस घटना के कुछ ही समय बाद, भानगढ़ और पड़ोसी राज्य अजबगढ़ के बीच भयंकर युद्ध हुआ। इसमें रानी रत्नावती समेत भानगढ़ के अधिकांश लोग मारे गए। तांत्रिक के श्राप के कारण, उनकी आत्माओं को मुक्ति नहीं मिली और वे आज भी उसी किले में भटक रही हैं।
शाम ढलते ही बदल जाती है भानगढ़ की दुनिया
स्थानीय निवासियों का दावा है कि आज भी रात के समय किले से अजीब आवाजें आती हैं। कभी पायल की छम-छम, तो कभी रोने और चिल्लाने की आवाजें। कई लोगों ने महसूस किया है कि कोई उनके पीछे चल रहा है या उन्हें घूर रहा है।
- छत नहीं टिकती: भानगढ़ के बाजार और घरों की एक और रहस्यमय बात यह है कि यहां किसी भी इमारत पर छत नहीं है। कहा जाता है कि जब भी कोई छत डालने की कोशिश करता है, वह अपने आप गिर जाती है।
- नर्तकियों की हवेली: किले के मुख्य द्वार के पास ‘नर्तकियों की हवेली’ है। लोग कहते हैं कि रात में आज भी यहां से घुंघरुओं की आवाज सुनाई देती है।
ASI का चेतावनी बोर्ड: वैधानिक मोहर या सुरक्षा उपाय?
भानगढ़ संभवतः भारत का एकमात्र ऐसा पर्यटन स्थल है, जहां सरकारी एजेंसी (ASI) ने खुद बोर्ड लगाकर चेतावनी दी है। बोर्ड पर साफ लिखा है: “सूर्यास्त के बाद और सूर्योदय से पहले इस सीमा में प्रवेश करना सख्त मना है।” हालांकि, तर्कशास्त्री मानते हैं कि यह नियम भूतों के कारण नहीं, बल्कि जंगली जानवरों और सुरक्षा कारणों से है। सरिस्का टाइगर रिजर्व पास होने के कारण यहां बाघ और तेंदुओं का खतरा रहता है। साथ ही, किले के अंदर गहरे गड्ढे और जर्जर दीवारें रात के अंधेरे में जानलेवा साबित हो सकती हैं।
वास्तुकला का अद्भुत नमूना: क्या-क्या है देखने लायक?
डर अपनी जगह है, लेकिन भानगढ़ वास्तुकला का बेजोड़ नमूना है। किले में प्रवेश करने के लिए पांच मुख्य द्वार हैं—लाहौरी गेट, अजमेरी गेट, फुलवारी गेट, दिल्ली गेट और हनुमान गेट। परिसर के अंदर कई भव्य मंदिर हैं जो आज भी सुरक्षित हैं:
- गोपीनाथ मंदिर: इसकी नक्काशी और गुंबद अद्भुत हैं।
- सोमेश्वर महादेव मंदिर: यह मंदिर तांत्रिक अनुष्ठानों के लिए जाना जाता था।
- मंगल देवी और केशव राय मंदिर: ये मंदिर नागर शैली में बने हैं।
दिलचस्प बात यह है कि जहां पूरे शहर के घरों की छतें गिर चुकी हैं, वहीं मंदिरों के शिखर आज भी सुरक्षित हैं। यह तथ्य श्रद्धालुओं की आस्था को और गहरा करता है कि ईश्वर की शक्ति के आगे कोई श्राप नहीं टिकता।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण: क्या सच में भूत हैं?
पैरानॉर्मल इन्वेस्टिगेटर्स (Paranormal Investigators) ने कई बार यहां मशीनों के साथ जांच की है। कई जांचकर्ताओं ने यहाँ उच्च इलेक्ट्रोमैग्नेटिक फील्ड (EMF) और तापमान में अचानक गिरावट दर्ज करने का दावा किया है। हालांकि, विज्ञान इसे “नेगेटिव एनर्जी” या मानसिक भ्रम मान सकता है, लेकिन स्थानीय लोगों का विश्वास अडिग है।
मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि भानगढ़ के बारे में इतनी कहानियां प्रचलित हैं कि जब कोई वहां जाता है, तो उसका दिमाग हर सरसराहट को ‘भूत’ से जोड़ लेता है। इसे ‘Pareidolia’ या मनोवैज्ञानिक डर कहा जा सकता है।
पर्यटकों के लिए गाइड: कैसे और कब जाएं?
यदि आप इस रहस्यमय किले को अपनी आंखों से देखना चाहते हैं, तो यह एक बेहतरीन वीकेंड डेस्टिनेशन है।
- कैसे पहुंचें: भानगढ़ जयपुर से लगभग 85 किमी और दिल्ली से 235 किमी दूर है। निकटतम रेलवे स्टेशन दौसा (Dausa) है, जो यहां से 22 किमी दूर है।
- समय: सुबह 6:00 बजे से शाम 6:00 बजे तक। (याद रखें, शाम के बाद रुकना गैरकानूनी है।)
- सही मौसम: अक्टूबर से मार्च के बीच का समय सबसे अच्छा है, क्योंकि गर्मियों में यहां भीषण गर्मी पड़ती है।
निष्कर्ष: भानगढ़ का सच चाहे जो भी हो—एक श्रापित नगरी या केवल एक प्राकृतिक आपदा का शिकार हुआ शहर—लेकिन इसकी दीवारों में कैद खामोशी आज भी चीख-चीख कर कहती है कि यहां कुछ तो ऐसा हुआ था, जो सामान्य नहीं था। यह किला हमें याद दिलाता है कि समय कितना बलवान है; जो कभी महलों में रहते थे, आज उनके नाम केवल पत्थरों पर लिखे मिटते हुए अक्षर बनकर रह गए हैं।
