जयपुर। भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने पुलिस कार्यप्रणाली और आम नागरिक के अधिकारों को लेकर एक ऐतिहासिक और नजीर पेश करने वाला फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि पुलिस किसी पीड़ित की शिकायत पर प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज नहीं करती है, तो यह न केवल संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का उल्लंघन है, बल्कि यह मानवाधिकारों का भी हनन है।
माननीय न्यायमूर्ति अभय एस. ओका की पीठ ने यह फैसला सुनाते हुए कहा कि ‘न्याय तक पहुंच’ (Access to Justice) हर नागरिक का संवैधानिक अधिकार है और पुलिस स्टेशन जाने वाले व्यक्ति के साथ मानवीय सम्मान के साथ व्यवहार किया जाना चाहिए।
क्या था पूरा मामला?
यह मामला ‘पांडुलये सुधसन बनाम रजिस्ट्रार, तमिलनाडु राज्य मानवाधिकार आयोग एवं अन्य’ (सिविल अपील संख्या- 6358/2025) से जुड़ा है। मामले के अनुसार, एक पुलिस उप-निरीक्षक (Inspector) ने एक शिकायतकर्ता की FIR दर्ज करने से यह कहकर इनकार कर दिया था कि घटना तीन अलग-अलग स्थानों पर हुई है, इसलिए वह इसे स्वीकार नहीं कर सकता। इसके साथ ही, पुलिस अधिकारी ने शिकायतकर्ता के साथ अभद्र भाषा का प्रयोग भी किया था।
मानवाधिकार आयोग ने लगाया था जुर्माना
तमिलनाडु राज्य मानवाधिकार आयोग ने जांच में पाया कि पुलिस अधिकारी ने न केवल FIR दर्ज करने से मना किया, बल्कि अपने कर्तव्यों का पालन नहीं किया। आयोग ने इसे मानवाधिकारों का उल्लंघन मानते हुए सरकार को निर्देश दिया कि वह पीड़ित को 2,00,000 रुपये (दो लाख रुपये) का मुआवजा दे और यह राशि दोषी पुलिस अधिकारी के वेतन से वसूली जाए।
सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की पुलिस अधिकारी की अपील
दोषी पुलिस अधिकारी ने मद्रास उच्च न्यायालय और बाद में सुप्रीम कोर्ट में अपील की। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट और मानवाधिकार आयोग के फैसले को सही ठहराया। कोर्ट ने कहा:
“मानव अधिकार अधिनियम 1993 की धारा 2 (घ) के तहत मानव अधिकार का अर्थ व्यक्ति के जीवन, स्वतंत्रता, समानता और सम्मान से संबंधित अधिकार हैं। कोई नागरिक जो किसी अपराध की रिपोर्ट करने पुलिस स्टेशन जाता है, उसे मानवीय सम्मान के साथ व्यवहार किए जाने का अधिकार है। उसके साथ अपराधी जैसा सुलूक नहीं किया जाना चाहिए।”
फैसले के मुख्य बिंदु:
- FIR अनिवार्य: पुलिस किसी भी पीड़ित को FIR दर्ज करने से मना नहीं कर सकती। यह न्याय प्रक्रिया की पहली सीढ़ी है।
- संवैधानिक उल्लंघन: रिपोर्ट न लिखना आर्टिकल 14 और 21 का सीधा उल्लंघन माना जाएगा।
- सम्मान का अधिकार: थाने में शिकायत लेकर जाने वाले व्यक्ति के साथ सम्मानजनक व्यवहार पुलिस का दायित्व है।
- सख्त संदेश: यह फैसला उन तमाम पुलिस अधिकारियों के लिए चेतावनी है जो सीमाओं (Jurisdiction) या अन्य बहानों से FIR टालते हैं।
