एक प्रचारक, जो बन गए ‘वीतरागी स्वभाव’ की साक्षात मिसाल: सोहन सिंह जी के जीवन का वह सच, जो सबको जानना चाहिए

वीतरागी होना केवल हिमालय पर संभव नहीं। रा.स्व.संघ के प्रचारकों ने समाज के बीच रहकर 'अनासक्ति' और 'अपरिग्रह' को सिद्ध किया है। सोहन सिंह जी के जीवन से समझें इस कठिन साधना के 3 बड़े सूत्र।

Ravindar Nagar

भारतीय आध्यात्म दर्शन में ‘वीतरागी’ (Vitaragi) होना मोक्ष के सबसे निकट की अवस्था मानी जाती है। शाब्दिक अर्थ में, ‘वीत-राग’ का तात्पर्य है—”जिसका राग (आसक्ति/Moh) पूरी तरह चला गया हो”। सिद्धांत रूप में यह पढ़ना सरल है, लेकिन व्यावहारिक जीवन में, विशेषकर इस भौतिकवादी युग में, इस स्वभाव को उतारना लोहे के चने चबाने जैसा है।

आज जब समाज का बड़ा हिस्सा सुख-सुविधाओं और संग्रह की अंधी दौड़ में शामिल है, तब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के ‘प्रचारक’ और ध्येयनिष्ठ ‘स्वयंसेवक’ इस ‘वीतरागी स्वभाव’ की जीती-जागती मिसाल बनकर खड़े हैं। वरिष्ठ प्रचारक स्वर्गीय सोहन सिंह जी का जीवन इस बात का प्रमाण है कि वीतरागी होने के लिए हिमालय की कंदराओं में जाने की आवश्यकता नहीं है; समाज के शोर-शराबे के बीच रहकर भी ‘कमल’ की तरह निर्लिप्त रहा जा सकता है।

वरिष्ठ प्रचारक स्व. सोहन सिंह जी

एक आदर्श प्रचारक का जीवन जिन तीन स्तंभों पर टिका होता है, वे ही वीतरागी स्वभाव के 3 प्रमुख लक्षण हैं। सोहन सिंह जी ने अपने आचरण से इन्हें सिद्ध किया:


1. सुख-दुख से परे: ‘देह’ का मोह नहीं (Titiksha)

वीतरागी वह है जिसे शारीरिक कष्ट विचलित न कर सके और सुख ललचा न सके। इसे शास्त्रों में ‘तितिक्षा’ कहा गया है। एक संघ प्रचारक का जीवन इसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। वे न तो गद्देदार बिस्तरों की मांग करते हैं और न ही वातानुकूलित कमरों की।

  • सोहन सिंह जी का उदाहरण: उनके जीवन का वह प्रसंग इस स्वभाव की पराकाष्ठा है जब उन्होंने भीषण गर्मी में भी पंखे का त्याग कर दिया। जब कार्यकर्ताओं ने आग्रह किया, तो उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि “साधना में सुविधा बाधक है।” एक साधारण मनुष्य गर्मी से परेशान हो सकता है, लेकिन एक वीतरागी अपने शरीर को मौसम के अधीन नहीं, बल्कि अपने ‘मन’ के अधीन रखता है। उन्होंने पसीने को तपस्या का श्रृंगार बना लिया।

2. संबंधों में ‘अनासक्ति’: ‘व्यष्टि’ से ‘समष्टि’ की यात्रा

वीतरागी व्यक्ति के लिए ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ (पूरी धरती ही परिवार है) केवल एक नारा नहीं, बल्कि सत्य होता है। प्रचारक जब घर से निकलता है, तो वह अपने रक्त-संबंधियों (Blood Relations) के प्रति मोह त्याग देता है, ताकि वह पूरे समाज को अपना परिवार बना सके। यह बहुत कठिन निर्णय होता है।

  • सोहन सिंह जी का उदाहरण: जब सोहन सिंह जी ने अपने सगे भांजे से कहा कि “मिलने आने की जरूरत नहीं, पोस्टकार्ड से काम चलाओ”, तो यह उनकी निष्ठुरता नहीं थी। यह वीतरागी स्वभाव की वह उच्च अवस्था थी जहाँ ‘व्यक्तिगत रिश्तों’ का मोह ‘राष्ट्रीय कर्तव्य’ के आड़े नहीं आने दिया जाता। उन्होंने घर छोड़ा, तो फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्होंने सिद्ध किया कि राष्ट्र ही उनका एकमात्र स्वजन है।

3. मान-अपमान से मुक्ति: ‘अहंकार’ का पूर्ण नाश

वीतरागी स्वभाव का सबसे बड़ा और दुर्लभ लक्षण है—अहंकार (Ego) का नाश। सामान्य व्यक्ति काम करके श्रेय (Credit) चाहता है, लेकिन एक प्रचारक ‘नेति-नेति’ (मैं कुछ नहीं, सब तेरा है) के भाव में जीता है। उसे न सम्मान की खुशी होती है, न अपमान का दुख।

  • सोहन सिंह जी का उदाहरण: एक अत्यंत वरिष्ठ और पूजनीय प्रचारक होने के बावजूद, जब सोहन सिंह जी ने रात के अंधेरे में एक सोते हुए कार्यकर्ता के हिस्से का काम (पानी भरना) चुपचाप कर दिया, तो उन्होंने एक मौन संदेश दिया। उन्होंने उस कार्यकर्ता को जगाकर लज्जित नहीं किया, बल्कि स्वयं सेवा करके ‘सेवक’ धर्म निभाया। यह सिद्ध करता है कि वीतरागी पद और प्रतिष्ठा का भूखा नहीं होता, वह केवल ‘सेवा’ जानता है।

अपरिग्रह: जब ‘न्यूनतम’ भी ‘अधिक’ लगने लगे

संघ का हर प्रचारक निजी संपत्ति का त्याग करता है, लेकिन सोहन सिंह जी ने ‘अपरिग्रह’ (Non-possession) को एक नई परिभाषा दी।

सामान्यतः जीवन जीने के लिए व्यक्ति कुछ न कुछ संग्रह करता है। लेकिन सोहन सिंह जी ‘न्यूनतम में भी न्यूनतम’ (Minimum of the minimum) के सिद्धांत पर जिए।

  • जब उन्होंने देह त्यागी, तो पीछे संपत्ति के नाम पर कोई विवाद या वसीयत नहीं थी।
  • थी तो बस—एक आधी खाली अटैची
  • उसमें न बैंक बैलेंस था, न जमीन के कागज। थे तो बस—एक जोड़ी कपड़े, एक डायरी और कुछ पत्र।

उन्होंने जीवन भर ‘वस्तुओं’ का नहीं, बल्कि ‘व्यक्तियों’ और ‘संस्कारों’ का संग्रह किया। उनकी वह आधी खाली अटैची आज भी लाखों स्वयंसेवकों को यह याद दिलाती है कि सिकंदर भी खाली हाथ गया था, लेकिन एक प्रचारक तो जीते जी ही ‘खाली हाथ’ हो जाता है।

निष्कर्ष: ‘वीतरागी’ होना दुनिया से भागना (Escapism) नहीं है, बल्कि दुनिया में ‘कमल के फूल’ की तरह रहना है—जो कीचड़ (संसार) में रहता तो है, पर उससे भीगता नहीं। संघ के प्रचारक इसी कठिन मार्ग के पथिक हैं। सोहन सिंह जी जैसे महापुरुषों का जीवन हमें यही सिखाता है कि राष्ट्र और समाज के लिए जीने के लिए सबसे पहले अपने भीतर के ‘राग’ को मारना पड़ता है। यही सच्चा वीतरागी स्वभाव है।

संदर्भ (Reference)

यह जानकारी राजस्थान के प्रचारकों की जीवन गाथा पर केंद्रित पुस्तक ‘और यह जीवन समर्पित…’ से ली गई है। इस पुस्तक में सुरेश चंद्र जी (पूर्व क्षेत्र प्रचारक, राजस्थान एवं पूर्व अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख) ने वरिष्ठ प्रचारक सोहन सिंह जी के जीवन से जुड़े संस्मरणों में इस अविस्मरणीय घटना का उल्लेख किया है।

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