RSS 100 Years: इतिहास के पन्नों में कुछ घटनाएं ऐसी दर्ज होती हैं जो पीढ़ियों तक देशभक्ति की मिसाल बन जाती हैं। 1965 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुए युद्ध के दौरान भी एक ऐसा ही वाकया घटा था, जिसने भारतीय सेना और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के बीच के अटूट विश्वास को जगजाहिर कर दिया। यह कहानी संघ के वरिष्ठ प्रचारक और कुशल संगठक माननीय सोहन सिंह जी की संगठन क्षमता और स्वयंसेवकों के समर्पण की है, जब सेना की एक पुकार पर स्वंयसेवक उमड़ पडे़।
युद्ध की विभीषिका के बीच घायल जवानों के इलाज के लिए अस्पतालों में रक्त की भारी कमी महसूस की जा रही थी। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए भारतीय सेना के एक वरिष्ठ अधिकारी ने सोहन सिंह जी से संपर्क किया। उन्होंने सोहन सिंह जी से कहा कि घायल सैनिकों के जीवन रक्षा के लिए उन्हें अगली सुबह तक कम से कम 100 रक्तदाताओं की तत्काल आवश्यकता है। उस दौर में यह एक बड़ी चुनौती थी, क्योंकि आज की तरह मोबाइल फोन या इंटरनेट जैसे संचार के साधन उपलब्ध नहीं थे और रात का वक्त हो चुका था।
सेना की मांग सुनते ही सोहन सिंह जी ने बिना एक पल गंवाए अपने संगठन कौशल का परिचय दिया। उन्होंने तुरंत संघ के स्वयंसेवकों को सक्रिय किया। अंधेरी रात में साइकिलों और पैदल ही स्वयंसेवकों ने घर-घर जाकर संदेश पहुंचाना शुरू किया। संदेश स्पष्ट था कि “सीमा पर जवान अपना खून बहा रहे हैं, अब हमें अपना खून देकर उनका जीवन बचाना है।” यह सोहन सिंह जी का अद्भुत नेतृत्व और संघ का अनुशासित तंत्र ही था कि आधी रात को शुरू हुआ यह अभियान सुबह होते-होते एक जन-आंदोलन बन गया।
अगली सुबह जब सेना के अधिकारी रक्तदान शिविर में पहुंचे, तो वहां का दृश्य देखकर उनकी आंखें फटी की फटी रह गईं। उन्होंने मात्र 100 रक्तदाताओं की मांग की थी, लेकिन अस्पताल के बाहर करीब 500 स्वयंसेवकों की लंबी कतार लगी हुई थी। हर स्वयंसेवक रक्तदान करने के लिए अपनी बारी का इंतजार कर रहा था। वहां एक के बदले चार से पांच रक्तदाता उपलब्ध थे। यह दृश्य न केवल सेना के लिए राहत भरा था, बल्कि इसने यह सिद्ध कर दिया कि संकट के समय में संघ और समाज सेना के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा है।
सोहन सिंह जी के जीवन का यह प्रसंग आज भी याद किया जाता है। यह घटना बताती है कि संसाधन सीमित हो सकते हैं, लेकिन अगर राष्ट्र के प्रति समर्पण हो, तो बड़ी से बड़ी चुनौती को भी छोटा किया जा सकता है। संघ के स्वयंसेवकों द्वारा किया गया यह रक्तदान केवल एक चिकित्सीय सहायता नहीं थी, बल्कि यह सरहद पर लड़ रहे जवानों को यह संदेश था कि पूरा देश उनकी रगों में दौड़ने के लिए तैयार है।
संदर्भ (Reference)
यह जानकारी राजस्थान के प्रचारकों की जीवन गाथा पर केंद्रित पुस्तक ‘और यह जीवन समर्पित…’ से ली गई है। इस पुस्तक में सुरेश चंद्र जी (पूर्व क्षेत्र प्रचारक, राजस्थान एवं पूर्व अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख) ने वरिष्ठ प्रचारक सोहन सिंह जी के जीवन से जुड़े संस्मरणों में इस अविस्मरणीय घटना का उल्लेख किया है।
