राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) अपनी स्थापना के शताब्दी वर्ष (100 Years) में प्रवेश कर चुका है। सन् 1925 में विजयदशमी के दिन नागपुर की मिट्टी में परम पूजनीय डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार जी ने जिस नन्हे पौधे को रोपा था, आज वह एक विशाल वटवृक्ष बनकर न केवल भारत, बल्कि पूरे विश्व में भारतीय संस्कृति और राष्ट्रवाद की सुगंध फैला रहा है।
यह 100 वर्षों की यात्रा केवल समय का गुजरना नहीं है, बल्कि यह लाखों-करोड़ों अनाम स्वयंसेवकों के त्याग, तपस्या और ‘सर्वस्व समर्पण’ की गाथा है। शाखा के धूल भरे मैदानों से निकलकर, आपदाओं में राहत पहुंचाने तक और राष्ट्र निर्माण में अपनी आहुति देने तक—संघ ने हर कालखंड में भारत को सशक्त किया है।
इसी गौरवशाली यात्रा, अनुशासन और समर्पण के भाव को शब्दों में पिरोया है कोटा की कवयित्री सपना राधांशी ने। संघ के शताब्दी वर्ष को समर्पित उनकी यह रचना ‘संघ ने भारत को विश्व विख्यात किया’, हमें उस संकल्प की याद दिलाती है जो हर स्वयंसेवक के हृदय में धड़कता है।
आइए, पढ़ते हैं राष्ट्रभक्ति से ओत-प्रोत यह विशेष रचना…
काव्य-रचना: संघ ने भारत को विश्व विख्यात किया
जब से समझने लगे, हमने संघ का नाम सुना… ‘संघ क्या होता है?’, माता–पिता से प्रश्न किया। प्रश्न का उत्तर देते हुए, सबने उसको ‘शाखा’ नाम दिया! सौ वर्षों में संघ ने, ऐसे भारत को विश्व विख्यात किया…!
प्रथम स्वयंसेवक केशव हेडगेवार जी के, गहन मंथन ने संघ स्थापना का काम किया। हिंदू समुदाय को एकजुट कर… मानव कल्याण का कार्य किया! सौ वर्षों में संघ ने, ऐसे भारत को विश्व विख्यात किया…!
सन् १९२५ को विजयादशमी के दिन, नागपुर में महान संघ ने जन्म लिया। नित्य सिद्ध हो शाखा में जाकर, तन-मन को मजबूत किया! सौ वर्षों में संघ ने, ऐसे भारत को विश्व विख्यात किया…!
संस्कृत में आज्ञाएं, प्रतिदिन एकत्र आना, शारीरिक-बौद्धिक के छोटे-छोटे अभ्यासों से… व्यक्तियों का निर्माण कर, प्रार्थना में सदैव लक्ष्य-क्रियान्वयन का स्मरण किया। सौ वर्षों में संघ ने, ऐसे भारत को विश्व विख्यात किया…!
हर घर से हिन्दू निकला, और संघ को आत्मसात किया। ‘जय भारत माता की’ और प्रणाम भगवे ध्वज को कर, स्वयंसेवकों ने सम्मान दिया! सौ वर्षों में संघ ने, ऐसे भारत को विश्व विख्यात किया…!
काली टोपी, काले जूते और खाकी-भूरी… धवल पेन्ट-शर्ट पहन, संचलन में जाना ठान लिया। भेदभाव को त्यागकर अब हिन्दू ने, हर हिंदू से कदम मिला लिया! सौ वर्षों में संघ ने, ऐसे भारत को विश्व विख्यात किया…!
सच्चे स्वयंसेवक के समर्पण भाव ने, सुख–सुविधाओं को त्याग कर… काँटो भरी बाधाओं को हटाकर, सर्वत्र संघ-भाव विस्तार किया। सौ वर्षों में संघ ने, ऐसे भारत को विश्व विख्यात किया…!
चुनौतियां संघर्ष, तीन-तीन प्रतिबन्ध झेले, अहिसंक सत्याग्रह का मार्ग चुना। समय-समय पर जागरण अभियान से, समाज को नित्य चेतन किया! सौ वर्षों में संघ ने, ऐसे भारत को विश्व विख्यात किया…!
जब-जब मानव सेवा का अवसर आया, हर संभव राहत प्रयास किया। परिवार–भाव का संवर्द्धन करके, मानवता को कुटुम्ब का संदेश दिया! सौ वर्षों में संघ ने, ऐसे भारत को विश्व विख्यात किया…!
भारत माता की सेवा में स्वयंसेवकों ने, अपना सबकुछ बलिदान किया। ‘स्व’ के गौरव से जागृत कर, भारत बोध का विचार दिया! सौ वर्षों में संघ ने, ऐसे भारत को विश्व विख्यात किया…!
कितने स्वयंसेवक आयु वृद्ध हो गए, कितनी पीढ़ियां अनाम खप गईं। तब संघ शताब्दी वर्ष का, शुभारम्भ पर्व आया! सौ वर्षों में संघ ने, ऐसे भारत को विश्व विख्यात किया…!
युगों–युगों भारत विचार जीवंत रहेगा, ऐसे कार्य का निर्माण किया। संपूर्ण विश्व भारत की गाथा सुनेगा, ऐसे बीज से वटवृक्ष तैयार किया! सौ वर्षों में संघ ने, ऐसे भारत को विश्व विख्यात किया…!
अपने से सिखाए कार्यकर्ता आचरण व्यवहार, दिखाएं स्वयंसेवकपन प्रखर। तब जाएगा माना… वैभव परम का स्वप्न साकार किया! सौ वर्षों में संघ ने, ऐसे भारत को विश्व विख्यात किया…!
नींव में विसृजित कर सम्पूर्ण जीवन, जीता विश्वास भारत जगत मानव का। भूलकर अपने आपको, संघ का सदैव मान किया! सौ वर्षों में संघ ने, ऐसे भारत को विश्व विख्यात किया…!

— सपना राधांशी,
कोटा
