कड़ाके की ठंड, हलवाई की भट्ठी और हवेली का वो एक कमरा… जहाँ से शुरू हुई राजस्थान में संघ की यात्रा

Ravindar Nagar

जयपुर: वर्तमान परिदृश्य में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की जो व्यापकता और शक्ति राजस्थान में दिखाई देती है, उसकी नींव दशकों पहले एक तपस्वी प्रचारक के अदम्य साहस और संघर्ष पर रखी गई थी। आज जब हम संघ के विशाल कार्यालयों को देखते हैं, तो इतिहास के पन्नों में दर्ज वह घटना और भी महत्वपूर्ण हो जाती है, जब राजस्थान का पहला ‘संघ कार्यालय’ किसी भवन में नहीं, बल्कि एक हवेली के साधारण से कक्ष में शुरू हुआ था।

यह कहानी है राजस्थान के प्रथम प्रचारक श्री विश्वनाथ जी लिमये की और उस ऐतिहासिक पल की, जिसने मरुधरा में संघ कार्य का बीजारोपण किया।

1941 की वो सर्द रात और हलवाई की भट्ठी

कहानी 1941 की है। संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरुजी ने नागपुर से एक युवा प्रचारक, विश्वनाथ जी लिमये को राजस्थान में संघ कार्य खड़ा करने की जिम्मेदारी देकर भेजा। लिमये जी जब दिल्ली से ट्रेन द्वारा अजमेर स्टेशन पर उतरे, तो कड़ाके की सर्दी पड़ रही थी। रात्रि का समय था और अपरिचित शहर में सिर छिपाने की कोई जगह नहीं थी।

संघ के इतिहास में यह घटना दर्ज है कि उस रात लिमये जी ने स्टेशन के बाहर एक हलवाई की दुकान के सामने जल रही भट्ठी के पास बैठकर रात बिताई। वह पूरी रात ठिठुरन भरी थी, लेकिन राष्ट्रभक्ति की अग्नि उनके हृदय में जल रही थी।

चांदकरण शारदा की हवेली: राजस्थान का पहला ‘संघ कार्यालय’

सुबह होते ही लिमये जी उस पते की खोज में निकले जो श्री गुरुजी ने उन्हें दिया था। वह पता था अजमेर के प्रतिष्ठित समाजसेवी श्री चांदकरण जी शारदा का। शारदा जी डॉ. हेडगेवार के समय से ही संघ से परिचित थे।

जब लिमये जी ने गुरुजी का पत्र उन्हें सौंपा, तो शारदा जी ने आत्मीयता से उनका स्वागत किया और अपनी हवेली का एक कक्ष उन्हें रहने के लिए दे दिया। ऐतिहासिक दृष्टि से, चांदकरण जी की हवेली का वह कक्ष ही राजस्थान का प्रथम विधिवत ‘संघ कार्यालय’ बना। यही वह स्थान था जहाँ से राजस्थान में संघ के विस्तार की योजनाओं ने आकार लिया।

अखाड़े से निकली पहली शाखा: ‘चंद्रकुण्ड शाखा’

कार्यालय तो मिल गया, लेकिन स्वयंसेवक जोड़ना अब भी चुनौती थी। लिमये जी 6-7 दिनों तक अजमेर में घूमते रहे, लेकिन सफलता नहीं मिली। तब चांदकरण जी ने उन्हें एक युक्ति सुझाई। उन्होंने लिमये जी को आनासागर स्थित ‘ऋषिउद्यान’ (शाहपुरा महाराज का उद्यान) जाने को कहा, जहाँ आर्यवीर दल का अखाड़ा चलता था।

लिमये जी ने वहाँ जाना शुरू किया, युवाओं से मित्रता की और धीरे-धीरे उन्हें संघ के विचार से जोड़ा। इसी प्रयास के परिणामस्वरूप ‘चंद्रकुण्ड’ स्थान पर राजस्थान की पहली विधिवत शाखा प्रारंभ हुई, जिसका नाम ‘चंद्रकुण्ड शाखा’ रखा गया। बाद में यह शाखा सुभाष उद्यान में स्थानांतरित हुई, लेकिन नाम वही रहा।

चुनौतियों के बीच विस्तार

उस दौर में राजस्थान (तब राजपूताना) 20 अलग-अलग रियासतों में बंटा था और ब्रिटिश रेजिडेंट का कड़ा पहरा था। गुप्तचरों का जाल और सामंती प्रभाव के बीच संघ का कार्य करना ‘असाध्य’ को साधने जैसा था। श्री बच्छराज जी व्यास के संस्मरणों के अनुसार, 1940 तक यहाँ राजनीतिक चेतना नगण्य थी। लेकिन लिमये जी के अथक परिश्रम से 1946 आते-आते प्रदेश के प्रमुख नगरों से लेकर तहसीलों तक संघ की शाखाएं फैल गईं और अजमेर में दैनिक उपस्थिति 3000 के पार पहुँच गई।

तपस्वी जीवन का समापन

विश्वनाथ जी लिमये ने अपना पूरा जीवन राष्ट्र और धर्म को समर्पित कर दिया। बाद के वर्षों में वे संन्यास लेकर ‘स्वामी’ बने और वनवासी क्षेत्रों में धर्म जागरण का कार्य किया। उन्होंने ‘वाल्मीकि के ऐतिहासिक राम’ जैसे ग्रंथों की रचना भी की। 1 फरवरी 1993 को कोयम्बटूर में इस महामानव ने देह त्याग दी, लेकिन उनके द्वारा 1941 में अजमेर की उस हवेली से जलाया गया दीपक आज पूरे राजस्थान में प्रकाशमान है।

स्रोत संदर्भ: यह आलेख राजस्थान के प्रचारकों की जीवन गाथा पर केंद्रित पुस्तक ‘औऱ यह जीवन समर्पित…’ में वर्णित तथ्यों और वरिष्ठ प्रचारक शंकर लाल जी के संस्मरणों पर आधारित है।

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