शोध कार्य समाज से जुड़े तभी उसका वास्तविक लाभ: सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने शोधार्थियों से किया संवाद

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जयपुर, राजस्थान: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक डॉ. मोहनराव भागवत ने आज ज्ञान और अनुसंधान के क्षेत्र में समाज के जुड़ाव की आवश्यकता पर जोर दिया। मालवीय नगर स्थित पाथेय कण संस्थान के नारद सभागार में आयोजित ‘युवा शोधार्थी संवाद: शाश्वत मूल्य, नये आयाम’ कार्यक्रम में शोधार्थियों से चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि समाज जिन बातों से लाभान्वित होता है, यह समझने के लिए शोधार्थियों और विश्वविद्यालयों को समाज से सीधा संवाद बढ़ाना होगा।

शोध कार्य समाज से जुड़े तभी उसका वास्तविक लाभ: सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत

विश्वविद्यालयों को समाज से निरंतर जुड़ना होगा

डॉ. भागवत ने कहा कि कुछ विषय केवल ज्ञान के होते हैं, जबकि कई विषय समाज के उपयोग और उत्थान से जुड़े हुए होते हैं। उन्होंने विश्वविद्यालयों को स्पष्ट निर्देश देते हुए कहा कि विश्वविद्यालयों का समाज से जुड़ाव मजबूत और निरंतर होना चाहिए। यह तभी संभव होगा जब शोध कार्य केवल अकादमिक न होकर, सामाजिक समस्याओं के समाधान पर केंद्रित हों।

  • कार्यक्रम में उपस्थिति: इस संवाद कार्यक्रम में राजस्थान के 34 विश्वविद्यालयों से आए 260 शोधार्थी एवं अध्येतागण शामिल हुए, जिन्होंने डॉ. भागवत से विभिन्न विषयों पर प्रश्न पूछकर मार्गदर्शन प्राप्त किया।

संघ को समझने के लिए ‘मूल स्रोतों’ पर जाँए

संघ की बाहरी छवि को लेकर चल रही चर्चाओं पर डॉ. भागवत ने स्पष्टीकरण दिया। उन्होंने कहा कि आज संघ के हितैषी भी हैं और बहुत से विरोधी भी हैं। उन्होंने माना कि हितैषी प्रचार—प्रसार में बहुत पीछे हैं, जबकि विरोधी इस काम में बहुत आगे हैं, जिन्होंने एक ‘झूठ का जाल’ बुन दिया है।

उन्होंने युवा शोधार्थियों से अपील की कि संघ के बारे में जानना है तो इसके मूल स्रोतों (original sources) पर जाइये।

“संघ साहित्य में क्या है, इसे ज़मीन पर जाकर देखिए। संघ को प्रत्यक्ष देखना है तो संघ की शाखा में जाइये। दायित्ववान स्वयंसेवकों का जीवन देखेंगे तो संघ समझ में आएगा। बाहरी छवि के आधार पर निर्णय न लें।”

शाखा: जीवन का ‘रियाज़’ और चरित्र निर्माण

डॉ. भागवत ने संघ की कार्यपद्धति की नींव समझाई। उन्होंने शाखा को जीवन और कार्य—दोनों को साधने के लिए आवश्यक बताते हुए कहा कि शाखा से अनुशासन, सामूहिकता, स्वभाव सुधार और अहंकार नियंत्रण का संस्कार प्राप्त होता है।

  • संघ का उद्देश्य: संघ का काम केवल व्यक्ति निर्माण का है और इसकी पद्धति शाखा है। उन्होंने कहा, “संघ केवल शाखा चलाता है, जबकि स्वयंसेवक सब कुछ करते हैं।” समाज परिवर्तन का काम स्वयंसेवक करते हैं।
  • सफलता का कारण: उन्होंने कहा कि स्वयंसेवकों ने समाज जीवन के विविध क्षेत्रों में उत्कृष्ट कार्य खड़े किए हैं। उनके समर्पण से ही संघ कार्य चलता है। “हमारे यहां किसी चीज का अभाव भी नहीं और प्रभाव भी नहीं, इसलिए सब कुछ ठीक चलता है।”

कीर्ति अर्जन नहीं, राष्ट्र निर्माण लक्ष्य

डॉ. भागवत ने कहा कि संघ आज बड़े स्वरूप में है और उसकी कीर्ति स्थापित है। फिर भी संघ का लक्ष्य कीर्ति अर्जन (fame acquisition) नहीं है, बल्कि राष्ट्र निर्माण है। यह काम अकेले संघ या किसी एक संगठन के प्रयास से नहीं हो सकता, इसके लिए पूरे समाज को साथ आना होगा।

उन्होंने चेताया कि यदि संगठन संतुष्ट होकर ठहर जाए तो उसकी उपयोगिता धीरे-धीरे समाप्त हो सकती है, इसलिए निरंतर सक्रियता आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि प्रश्न–उत्तर का क्रम अनंत है, लेकिन संगठन का मूल लक्ष्य देश का उत्थान है, और यह केवल संघ का काम नहीं, हम सबका काम है। उन्होंने शाखा को जीवन का रियाज़ (practice/rehearsal) बताते हुए कहा कि जिस तरह डॉक्टर, इंजीनियर या कलाकार के लिए नियमित अभ्यास आवश्यक है, वैसे ही शाखा से व्यक्ति अपने गुणों को श्रेष्ठतम रूप दे सकता है।

कार्यक्रम में राजस्थान क्षेत्र संघचालक डॉ. रमेशचंद्र अग्रवाल सहित अनेक गणमान्य लोग उपस्थित थे। आभार प्रदर्शन प्रो. विनोद यादव ने किया।

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