1947 का वह सच: जब जलते पंजाब के बीच अंबाला में ‘शांति की ढाल’ बनकर खड़े थे RSS प्रचारक सोहन सिंह; सेना ने भी माना था लोहा

Ravindar Nagar

RSS 100 Years History in Hindi: सन 1947 में जब देश आजादी का जश्न मना रहा था, तब पंजाब का एक बड़ा हिस्सा विभाजन की विभीषिका में जल रहा था। रेडक्लिफ लाइन खिंचने के बाद पाकिस्तान की तरफ से आ रही ट्रेनों में जिंदा इंसानों से ज्यादा लाशें आ रही थीं। प्रतिशोध और नफरत की आग चरम पर थी। ऐसे भयावह माहौल में अविभाजित पंजाब का प्रमुख शहर अंबाला बारूद के ढेर पर बैठा था। शरणार्थियों के आवागमन का मुख्य केंद्र होने के कारण आशंका थी कि यहां इतिहास का सबसे भीषण नरसंहार होगा। लेकिन, ऐसा नहीं हुआ। अंबाला शहर और छावनी क्षेत्र इस आग में भी सुरक्षित रहे। इसके पीछे कोई चमत्कार नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के तत्कालीन प्रचारक सोहन सिंह की फौलादी इच्छाशक्ति और रणनीतिक कौशल था।

महज 24 वर्ष की आयु में सोहन सिंह ने अंबाला में शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए जो भूमिका निभाई, वह किसी कुशल सेनापति से कम नहीं थी। उन्होंने वायु सेना में अधिकारी बनने का अवसर ठुकरा दिया था, लेकिन उस सैन्य प्रशिक्षण और अनुशासन का पूरा उपयोग उन्होंने 1947 के संकटकाल में किया।

सेना और संघ का अभूतपूर्व समन्वय उस समय अंबाला छावनी में सेना तैनात थी, लेकिन सैनिक बाहरी थे और उन्हें शहर की तंग गलियों, रास्तों और उपद्रवियों के संभावित ठिकानों की जानकारी नहीं थी। ऐसे में सोहन सिंह ने आगे बढ़कर मोर्चा संभाला। उन्होंने सेना के अधिकारियों से सीधा संपर्क साधा और अपने जांबाज स्वयंसेवकों को सेना के साथ ‘गाइड’ के रूप में तैनात किया। ये स्वयंसेवक सैनिकों को उन इलाकों में ले जाते जहां दंगाई छिपे होते या जहां हमले की योजना बन रही होती।

सटीक खुफिया तंत्र ने बचाई हजारों जानें सोहन सिंह ने अंबाला में एक समानांतर खुफिया तंत्र (Intelligence Network) खड़ा कर दिया था। दंगाई कब और कहाँ हमला करने वाले हैं, इसकी सटीक सूचना सोहन सिंह की टीम पहले ही सेना तक पहुँचा देती थी। इसके अलावा, हिंदुओं और शरणार्थियों की बस्तियों के चारों ओर दिन-रात पहरेदारी की व्यवस्था की गई। सोहन सिंह खुद रात-रात भर जागकर गश्त की निगरानी करते थे और सुनिश्चित करते थे कि कोई भी उपद्रवी सुरक्षा घेरे को न तोड़ सके।

जस्टिस जी.डी. खोसला ने माना था लोहा इस ऐतिहासिक घटना की पुष्टि उस समय के प्रशासनिक दस्तावेज भी करते हैं। 1947 के दंगों की जांच और पुनर्वास से जुड़े रहे तत्कालीन न्यायाधीश जी.डी. खोसला ने अपने संस्मरणों में स्पष्ट लिखा है कि “अंबाला के आस-पास के क्षेत्रों में काफी हिंसा और मारकाट हुई थी, किन्तु अंबाला शहर व छावनी में अपेक्षाकृत शांति बनी रही।” उन्होंने इसका श्रेय वहां संघ के मजबूत संगठन और सोहन सिंह के नेतृत्व को दिया।

वहीं, भारतीय जनसंघ के पूर्व अध्यक्ष श्री बलराम मधोक, जो उस समय अंबाला कॉलेज में प्राध्यापक थे, ने भी कई बार स्वीकार किया कि यदि सोहन सिंह और उनका संगठन सक्रिय न होता, तो अंबाला में खून की नदियां बह जातीं। सोहन सिंह की उस सूझबूझ ने अंबाला में हजारों निर्दोष बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों को एक नई जिंदगी दी थी।

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