कुल्लू (हिमाचल प्रदेश): विज्ञान जहाँ हार मान लेता है, वहीं से भारतीय अध्यात्म की गहराइयां शुरू होती हैं। हिमालय, जो सदियों से तपस्वियों और साधकों की भूमि रहा है, एक बार फिर दुनिया को अपनी एक अद्भूत रहस्यमय शक्ति का परिचय दे रहा है। हम बात कर रहे हैं योगी सत्येन्द्र नाथ (Yogi Satyendra Nath) की, जो पिछले दो दशकों (20 वर्षों) से हिमालय की दुर्गम चोटियों पर, शून्य से भी 55 डिग्री नीचे (-55°C) के तापमान में अपनी कठोर साधना में लीन हैं।
इस अकल्पनीय तपस्या की जानकारी कुल्लू स्थित प्रतिष्ठित आध्यात्मिक संस्था ‘कौलांतक पीठ’ (Kaulantak Peeth) ने साझा की है।
-55°C: जहां खून जम जाए, वहां तपस्या
कौलांतक पीठ द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, योगी सत्येन्द्र नाथ ने दुनिया के शोर-शराबे से दूर, हिमालय के उस हिस्से को अपनी तपस्या का केंद्र बनाया है जहाँ जीवन की कल्पना करना भी मुश्किल है। -55°C तापमान वह स्थिति है जहाँ पानी तो क्या, शरीर का खून भी जम सकता है।
लेकिन, योगी सत्येन्द्र नाथ ने अपनी वर्षों की कठिन साधना (Tapasya) और यौगिक क्रियाओं के बल पर अपने शरीर को इस तरह ढाल लिया है कि यह हाड़ कंपा देने वाली ठंड भी उनकी ध्यान समाधि को नहीं तोड़ पाती।
कठिन साधना का परिणाम
संस्था का कहना है कि यह कोई चमत्कार नहीं, बल्कि “कई वर्षों की कठिन साधना का यह परिणाम है।” भारतीय योग परंपरा में ऐसी ‘काया-कल्प’ क्रियाओं का वर्णन मिलता है, जिनके द्वारा एक योगी अपने शरीर के तापमान और चयापचय (Metabolism) को नियंत्रित कर सकता है। इसे ‘भीतरी अग्नि’ को जागृत करना भी कहा जाता है।
क्या है कौलांतक पीठ?
कुल्लू स्थित ‘कौलांतक पीठ’ (जिसे ‘कुलान्त पीठ’ भी कहा जाता है) हिमालय की प्राचीन और गुप्त आध्यात्मिक विद्याओं का एक प्रमुख केंद्र माना जाता है। यह पीठ समय-समय पर दुनिया के सामने ऐसे योगियों और उनकी साधनाओं को उजागर करता रहता है, जो आज भी सनातन परंपरा को जीवित रखे हुए हैं।
निष्कर्ष: योगी सत्येन्द्र नाथ की यह कहानी आधुनिक दुनिया के लिए एक बड़ा प्रश्न और प्रेरणा दोनों है। यह हमें बताती है कि मानव शरीर और मन की क्षमताएं असीमित हैं, बशर्ते उन्हें सही दिशा और तपस्या से साधा जाए। हिमालय आज भी ऐसे कई रहस्यों को अपनी बर्फ़ीली चादर में लपेटे हुए है।
