संगठन मंत्र: वह वैदिक शक्ति जो ‘मैं’ को ‘हम’ में बदल देती है; जानिए ऋग्वेद के इस मंत्र का गहरा अर्थ जो सिखाता है एकता का विज्ञान

'संगच्छध्वं संवदध्वं...' जिसे संगठन मंत्र कहा जाता है, यह ऋग्वेद का अंतिम सूक्त है। जानिए इस मंत्र का अर्थ, भावार्थ और यह कैसे किसी भी संगठन या समाज को एक सूत्र में पिरोने का कार्य करता

Ravindar Nagar

किसी भी राष्ट्र, समाज या संस्था की शक्ति उसकी ‘एकता’ (Unity) में निहित होती है। भारतीय संस्कृति में हजारों साल पहले ही ‘टीम मैनेजमेंट’ और ‘सामूहिकता’ के इस सूत्र को खोज लिया गया था। ऋग्वेद के अंतिम मंडल का अंतिम सूक्त, जिसे ‘संगठन मंत्र’ या ‘संज्ञान सूक्त’ कहा जाता है, आज भी प्रासंगिक है।

अक्सर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की शाखाओं और विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में गूंजने वाला यह मंत्र केवल संस्कृत के शब्द नहीं, बल्कि समाज को एक सूत्र में बांधने का मनोवैज्ञानिक विज्ञान है। आइए जानते हैं इस मंत्र के तीन भागों का विस्तृत अर्थ और महत्व।

पहला श्लोक: साथ चलने और बोलने का संकल्प

ॐ संड्गच्छध्वं संवदध्वं, सं वो मनांसि जानताम्। देवा भागं यथा पूर्वे, संञ्ञनानां उपासते।।

अर्थ: हम सब एक साथ चलें (कदम से कदम मिलाकर), एक साथ बोलें (हमारी वाणी में विरोधाभास न हो), और हमारे मन एक समान होकर ज्ञान को प्राप्त करें। जिस प्रकार प्राचीन काल में देवता ज्ञानपूर्वक अपने-अपने हवि (भाग) को ग्रहण करते थे, वैसे ही हम भी मिल-जुलकर अपने कर्तव्यों का पालन करें।

  • सन्देश: यह श्लोक शारीरिक और मानसिक एकता की बात करता है। जब समाज एक दिशा में चलता है और एक स्वर में बोलता है, तभी प्रगति होती है।

दूसरा श्लोक: विचारों और निर्णयों में समानता

समानो मंत्र: समिति: समानी, समानं मन: सहचित्तमेषाम्। समानं मंत्र अभिमंत्रये वः, समानेन वा हविषा जुहोमि।।

अर्थ: हमारी प्रार्थना (विचार) एक समान हो, हमारी सभा (समिति) या लक्ष्य एक हो। हमारे मन एक हों और हमारे चित्त (विचारने की शक्ति) भी एक जैसे हों। मैं (ईश्वर/पुरोहित) तुम्हें समान मंत्र (उद्देश्य) से अभिमंत्रित करता हूं और समान हवि से तुम्हें जोड़ता हूं।

  • सन्देश: यह श्लोक ‘निर्णय प्रक्रिया’ (Decision Making) में एकता पर जोर देता है। किसी भी संगठन की सफलता के लिए जरूरी है कि सभी सदस्यों का लक्ष्य (Goal) एक ही हो।

तीसरा श्लोक: दिलों का मिलन

समानी व आकूति:, समाना हृदयानि वः। समानमस्तु वो मनो, यथा व: सुसहासति।।

अर्थ: तुम्हारे संकल्प (Intention) एक समान हों, तुम्हारे हृदय (Feelings) एक समान हों। तुम्हारे मन एक जैसे हों, ताकि तुम सब एक साथ (संगठित होकर) अच्छी तरह से रह सको।

  • सन्देश: यह सबसे महत्वपूर्ण भाग है। यह ‘भावनात्मक एकता’ (Emotional Bonding) की बात करता है। केवल साथ चलना काफी नहीं है, दिलों का मिलना भी जरूरी है।

आधुनिक दौर में महत्व

आज के दौर में जब समाज में बिखराव और वैचारिक मतभेद बढ़ रहे हैं, ‘संगठन मंत्र’ हमें सिखाता है कि मतभेद होने के बावजूद ‘मनभेद’ नहीं होना चाहिए।

  • मैनेजमेंट गुरु: आधुनिक मैनेजमेंट भी अब ‘Team Building’ के लिए इसी सिद्धांत का पालन करता है— Common Goal (समान लक्ष्य) और Collective Effort (सामूहिक प्रयास)।

अंत में ‘ॐ शांति: शांति: शांति:’ के उद्घोष के साथ यह मंत्र न केवल संगठन, बल्कि विश्व शांति की कामना करता है। यह मंत्र हमें याद दिलाता है कि ‘संगठन में ही शक्ति है’ (Sanghe Shakti Kalau Yuge)।

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