नृसिंह और गोविन्द द्वादशी 2026: जानिए फाल्गुन शुक्ल द्वादशी की पूजा विधि, शुभ मंत्र और धान्य दान का विशेष महत्व

सनातन धर्म में फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि का विशेष धार्मिक महत्व है, जिसे मुख्य रूप से ‘नृसिंह द्वादशी’ के रूप में मनाया जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार, इस दिन भगवान विष्णु के प्रमुख दशावतारों में से चतुर्थ अवतार यानी भगवान नृसिंह की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान नृसिंह अपने भक्तों की हर प्रकार के संकटों से रक्षा करते हैं और उनके जीवन से सभी शत्रुओं का नाश करते हैं। इस दिन सच्चे मन से उपवास रखने और भगवान विष्णु के इस उग्र परंतु कल्याणकारी रूप की आराधना करने से मनुष्य के जीवन के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं।

गोविन्द द्वादशी के रूप में भी है विशेष मान्यता

नारद पुराण और भविष्य पुराण में इस पावन तिथि को लेकर एक अन्य महत्वपूर्ण वर्णन भी मिलता है। इन पुराणों के अनुसार, फाल्गुन शुक्ल द्वादशी के दिन भगवान गोविन्द की पूजा का भी विशेष विधान है। ‘गो’ का तात्पर्य गाय या पृथ्वी और ‘विन्द’ का अर्थ रक्षक होता है, अर्थात जो गाय और पृथ्वी के रक्षक हैं, वही गोविन्द हैं। भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण के अनेक मधुर नामों में से एक नाम गोविन्द भी है, इसी कारण से इस दिन को ‘गोविन्द द्वादशी’ के नाम से भी जाना जाता है। इसके अलावा भविष्य पुराण में इस दिन किए जाने वाले दो अन्य व्रतों- ‘सुकृत द्वादशी व्रत’ और ‘मनोरथ द्वादशी व्रत’ का भी उल्लेख मिलता है, जिनका अनुष्ठान एकादशी से शुरू होकर प्रति चार माह में पारण के साथ होता है।

नारद पुराण के अनुसार फाल्गुन द्वादशी की पूजा विधि

नारद पुराण में बताए गए विधान के अनुसार, इस दिन व्रत रखने वाले श्रद्धालुओं को स्नान आदि के बाद भगवान का ध्यान करते हुए ‘गोविन्दाय नमस्तुभ्यम्’ मंत्र से पूजा करनी चाहिए। पूजा के दौरान घी में मिले हुए तिल से 108 आहुतियां देकर हवन करना अत्यंत शुभ माना गया है। इसके साथ ही एक सेर शुद्ध दूध से पवित्रता के साथ भगवान गोविन्द का अभिषेक करना चाहिए। व्रत करने वाले व्यक्ति को दिन के तीनों समय भगवान की पूजा करनी चाहिए और रात के समय जागरण कर भगवान का ध्यान करना चाहिए। इसके बाद अगले दिन प्रातःकाल नित्य कर्मों से निवृत्त होकर फिर से भगवान गोविन्द की पूजा करने का विधान है।

दान का विशेष महत्व और अचूक प्रार्थना मंत्र

व्रत के अगले दिन पूजा संपन्न होने के बाद किसी योग्य ब्राह्मण को दक्षिणा और वस्त्र के साथ एक आढक (यानी करीब चार सेर) धान का दान अवश्य करना चाहिए। शास्त्र कहते हैं कि दान करते समय एक विशेष मंत्र का उच्चारण करना चाहिए- “नमो गोविन्द सर्वेश गोपिकाजनवल्लभ। अनेन धान्यदानेन प्रीतो भव जगद्गुरो॥” इसका अर्थ है कि हे सर्वेश्वर, गोपियों के प्राणवल्लभ, चराचर जगत के गुरु भगवान गोविन्द! मेरे द्वारा किए गए इस धान्य के दान से आप मुझ पर प्रसन्न हों। इस प्रकार पूरी विधि-विधान से फाल्गुन शुक्ल द्वादशी का व्रत करने से मनुष्य सभी प्रकार के पापों से मुक्त हो जाता है और उसे एक महान यज्ञ करने के समान सम्पूर्ण पुण्य फल की प्राप्ति होती है।सनातन धर्म में फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि का विशेष धार्मिक महत्व है, जिसे मुख्य रूप से ‘नृसिंह द्वादशी’ के रूप में मनाया जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार, इस दिन भगवान विष्णु के प्रमुख दशावतारों में से चतुर्थ अवतार यानी भगवान नृसिंह की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान नृसिंह अपने भक्तों की हर प्रकार के संकटों से रक्षा करते हैं और उनके जीवन से सभी शत्रुओं का नाश करते हैं। इस दिन सच्चे मन से उपवास रखने और भगवान विष्णु के इस उग्र परंतु कल्याणकारी रूप की आराधना करने से मनुष्य के जीवन के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं।

गोविन्द द्वादशी के रूप में भी है विशेष मान्यता

नारद पुराण और भविष्य पुराण में इस पावन तिथि को लेकर एक अन्य महत्वपूर्ण वर्णन भी मिलता है। इन पुराणों के अनुसार, फाल्गुन शुक्ल द्वादशी के दिन भगवान गोविन्द की पूजा का भी विशेष विधान है। ‘गो’ का तात्पर्य गाय या पृथ्वी और ‘विन्द’ का अर्थ रक्षक होता है, अर्थात जो गाय और पृथ्वी के रक्षक हैं, वही गोविन्द हैं। भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण के अनेक मधुर नामों में से एक नाम गोविन्द भी है, इसी कारण से इस दिन को ‘गोविन्द द्वादशी’ के नाम से भी जाना जाता है। इसके अलावा भविष्य पुराण में इस दिन किए जाने वाले दो अन्य व्रतों- ‘सुकृत द्वादशी व्रत’ और ‘मनोरथ द्वादशी व्रत’ का भी उल्लेख मिलता है, जिनका अनुष्ठान एकादशी से शुरू होकर प्रति चार माह में पारण के साथ होता है।

नारद पुराण के अनुसार फाल्गुन द्वादशी की पूजा विधि

नारद पुराण में बताए गए विधान के अनुसार, इस दिन व्रत रखने वाले श्रद्धालुओं को स्नान आदि के बाद भगवान का ध्यान करते हुए ‘गोविन्दाय नमस्तुभ्यम्’ मंत्र से पूजा करनी चाहिए। पूजा के दौरान घी में मिले हुए तिल से 108 आहुतियां देकर हवन करना अत्यंत शुभ माना गया है। इसके साथ ही एक सेर शुद्ध दूध से पवित्रता के साथ भगवान गोविन्द का अभिषेक करना चाहिए। व्रत करने वाले व्यक्ति को दिन के तीनों समय भगवान की पूजा करनी चाहिए और रात के समय जागरण कर भगवान का ध्यान करना चाहिए। इसके बाद अगले दिन प्रातःकाल नित्य कर्मों से निवृत्त होकर फिर से भगवान गोविन्द की पूजा करने का विधान है।

दान का विशेष महत्व और अचूक प्रार्थना मंत्र

व्रत के अगले दिन पूजा संपन्न होने के बाद किसी योग्य ब्राह्मण को दक्षिणा और वस्त्र के साथ एक आढक (यानी करीब चार सेर) धान का दान अवश्य करना चाहिए। शास्त्र कहते हैं कि दान करते समय एक विशेष मंत्र का उच्चारण करना चाहिए- “नमो गोविन्द सर्वेश गोपिकाजनवल्लभ। अनेन धान्यदानेन प्रीतो भव जगद्गुरो॥” इसका अर्थ है कि हे सर्वेश्वर, गोपियों के प्राणवल्लभ, चराचर जगत के गुरु भगवान गोविन्द! मेरे द्वारा किए गए इस धान्य के दान से आप मुझ पर प्रसन्न हों। इस प्रकार पूरी विधि-विधान से फाल्गुन शुक्ल द्वादशी का व्रत करने से मनुष्य सभी प्रकार के पापों से मुक्त हो जाता है और उसे एक महान यज्ञ करने के समान सम्पूर्ण पुण्य फल की प्राप्ति होती है।सनातन धर्म में फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि का विशेष धार्मिक महत्व है, जिसे मुख्य रूप से ‘नृसिंह द्वादशी’ के रूप में मनाया जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार, इस दिन भगवान विष्णु के प्रमुख दशावतारों में से चतुर्थ अवतार यानी भगवान नृसिंह की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान नृसिंह अपने भक्तों की हर प्रकार के संकटों से रक्षा करते हैं और उनके जीवन से सभी शत्रुओं का नाश करते हैं। इस दिन सच्चे मन से उपवास रखने और भगवान विष्णु के इस उग्र परंतु कल्याणकारी रूप की आराधना करने से मनुष्य के जीवन के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं।

गोविन्द द्वादशी के रूप में भी है विशेष मान्यता

नारद पुराण और भविष्य पुराण में इस पावन तिथि को लेकर एक अन्य महत्वपूर्ण वर्णन भी मिलता है। इन पुराणों के अनुसार, फाल्गुन शुक्ल द्वादशी के दिन भगवान गोविन्द की पूजा का भी विशेष विधान है। ‘गो’ का तात्पर्य गाय या पृथ्वी और ‘विन्द’ का अर्थ रक्षक होता है, अर्थात जो गाय और पृथ्वी के रक्षक हैं, वही गोविन्द हैं। भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण के अनेक मधुर नामों में से एक नाम गोविन्द भी है, इसी कारण से इस दिन को ‘गोविन्द द्वादशी’ के नाम से भी जाना जाता है। इसके अलावा भविष्य पुराण में इस दिन किए जाने वाले दो अन्य व्रतों- ‘सुकृत द्वादशी व्रत’ और ‘मनोरथ द्वादशी व्रत’ का भी उल्लेख मिलता है, जिनका अनुष्ठान एकादशी से शुरू होकर प्रति चार माह में पारण के साथ होता है।

नारद पुराण के अनुसार फाल्गुन द्वादशी की पूजा विधि

नारद पुराण में बताए गए विधान के अनुसार, इस दिन व्रत रखने वाले श्रद्धालुओं को स्नान आदि के बाद भगवान का ध्यान करते हुए ‘गोविन्दाय नमस्तुभ्यम्’ मंत्र से पूजा करनी चाहिए। पूजा के दौरान घी में मिले हुए तिल से 108 आहुतियां देकर हवन करना अत्यंत शुभ माना गया है। इसके साथ ही एक सेर शुद्ध दूध से पवित्रता के साथ भगवान गोविन्द का अभिषेक करना चाहिए। व्रत करने वाले व्यक्ति को दिन के तीनों समय भगवान की पूजा करनी चाहिए और रात के समय जागरण कर भगवान का ध्यान करना चाहिए। इसके बाद अगले दिन प्रातःकाल नित्य कर्मों से निवृत्त होकर फिर से भगवान गोविन्द की पूजा करने का विधान है।

दान का विशेष महत्व और अचूक प्रार्थना मंत्र

व्रत के अगले दिन पूजा संपन्न होने के बाद किसी योग्य ब्राह्मण को दक्षिणा और वस्त्र के साथ एक आढक (यानी करीब चार सेर) धान का दान अवश्य करना चाहिए। शास्त्र कहते हैं कि दान करते समय एक विशेष मंत्र का उच्चारण करना चाहिए- “नमो गोविन्द सर्वेश गोपिकाजनवल्लभ। अनेन धान्यदानेन प्रीतो भव जगद्गुरो॥” इसका अर्थ है कि हे सर्वेश्वर, गोपियों के प्राणवल्लभ, चराचर जगत के गुरु भगवान गोविन्द! मेरे द्वारा किए गए इस धान्य के दान से आप मुझ पर प्रसन्न हों। इस प्रकार पूरी विधि-विधान से फाल्गुन शुक्ल द्वादशी का व्रत करने से मनुष्य सभी प्रकार के पापों से मुक्त हो जाता है और उसे एक महान यज्ञ करने के समान सम्पूर्ण पुण्य फल की प्राप्ति होती है।सनातन धर्म में फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि का विशेष धार्मिक महत्व है, जिसे मुख्य रूप से ‘नृसिंह द्वादशी’ के रूप में मनाया जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार, इस दिन भगवान विष्णु के प्रमुख दशावतारों में से चतुर्थ अवतार यानी भगवान नृसिंह की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान नृसिंह अपने भक्तों की हर प्रकार के संकटों से रक्षा करते हैं और उनके जीवन से सभी शत्रुओं का नाश करते हैं। इस दिन सच्चे मन से उपवास रखने और भगवान विष्णु के इस उग्र परंतु कल्याणकारी रूप की आराधना करने से मनुष्य के जीवन के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं।

गोविन्द द्वादशी के रूप में भी है विशेष मान्यता

नारद पुराण और भविष्य पुराण में इस पावन तिथि को लेकर एक अन्य महत्वपूर्ण वर्णन भी मिलता है। इन पुराणों के अनुसार, फाल्गुन शुक्ल द्वादशी के दिन भगवान गोविन्द की पूजा का भी विशेष विधान है। ‘गो’ का तात्पर्य गाय या पृथ्वी और ‘विन्द’ का अर्थ रक्षक होता है, अर्थात जो गाय और पृथ्वी के रक्षक हैं, वही गोविन्द हैं। भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण के अनेक मधुर नामों में से एक नाम गोविन्द भी है, इसी कारण से इस दिन को ‘गोविन्द द्वादशी’ के नाम से भी जाना जाता है। इसके अलावा भविष्य पुराण में इस दिन किए जाने वाले दो अन्य व्रतों- ‘सुकृत द्वादशी व्रत’ और ‘मनोरथ द्वादशी व्रत’ का भी उल्लेख मिलता है, जिनका अनुष्ठान एकादशी से शुरू होकर प्रति चार माह में पारण के साथ होता है।

नारद पुराण के अनुसार फाल्गुन द्वादशी की पूजा विधि

नारद पुराण में बताए गए विधान के अनुसार, इस दिन व्रत रखने वाले श्रद्धालुओं को स्नान आदि के बाद भगवान का ध्यान करते हुए ‘गोविन्दाय नमस्तुभ्यम्’ मंत्र से पूजा करनी चाहिए। पूजा के दौरान घी में मिले हुए तिल से 108 आहुतियां देकर हवन करना अत्यंत शुभ माना गया है। इसके साथ ही एक सेर शुद्ध दूध से पवित्रता के साथ भगवान गोविन्द का अभिषेक करना चाहिए। व्रत करने वाले व्यक्ति को दिन के तीनों समय भगवान की पूजा करनी चाहिए और रात के समय जागरण कर भगवान का ध्यान करना चाहिए। इसके बाद अगले दिन प्रातःकाल नित्य कर्मों से निवृत्त होकर फिर से भगवान गोविन्द की पूजा करने का विधान है।

दान का विशेष महत्व और अचूक प्रार्थना मंत्र

व्रत के अगले दिन पूजा संपन्न होने के बाद किसी योग्य ब्राह्मण को दक्षिणा और वस्त्र के साथ एक आढक (यानी करीब चार सेर) धान का दान अवश्य करना चाहिए। शास्त्र कहते हैं कि दान करते समय एक विशेष मंत्र का उच्चारण करना चाहिए- “नमो गोविन्द सर्वेश गोपिकाजनवल्लभ। अनेन धान्यदानेन प्रीतो भव जगद्गुरो॥” इसका अर्थ है कि हे सर्वेश्वर, गोपियों के प्राणवल्लभ, चराचर जगत के गुरु भगवान गोविन्द! मेरे द्वारा किए गए इस धान्य के दान से आप मुझ पर प्रसन्न हों। इस प्रकार पूरी विधि-विधान से फाल्गुन शुक्ल द्वादशी का व्रत करने से मनुष्य सभी प्रकार के पापों से मुक्त हो जाता है और उसे एक महान यज्ञ करने के समान सम्पूर्ण पुण्य फल की प्राप्ति होती है।

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