भारतीय संस्कृति में भोजन (Food) को कभी भी केवल भूख मिटाने का साधन नहीं माना गया। हमारे शास्त्रों में कहा गया है— “अन्नं ब्रह्म” (अन्न ही ब्रह्म है)। यही कारण है कि पारंपरिक भारतीय परिवारों में खाने से पहले हाथ जोड़कर मंत्र बोलने की परंपरा सदियों से चली आ रही है।
लेकिन क्या यह महज एक रस्म है? या इसके पीछे कोई गहरा विज्ञान और मनोविज्ञान छिपा है? आइए, भोजन मंत्र की गहराई में उतरते हैं।
1. भोजन को ‘यज्ञ’ बनाता है यह मंत्र (गीता का श्लोक)
खाने से पहले सबसे प्रचलित मंत्र श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय 4, श्लोक 24) से लिया गया है। यह मंत्र भोजन करने की क्रिया को एक पवित्र यज्ञ में बदल देता है।
मंत्र:
ॐ ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविः ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्। ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना।।
अर्थ (Meaning): इस मंत्र का अर्थ अद्वैत वेदांत का निचोड़ है। इसमें कहा गया है:
- ब्रह्मार्पणं: अर्पण करने का पात्र (चम्मच/हाथ) ब्रह्म है।
- ब्रह्म हविः: जो भोजन (हवि) हम खा रहे हैं, वह भी ब्रह्म है।
- ब्रह्माग्नौ: पेट के अंदर की जठराग्नि (पाचन अग्नि) भी ब्रह्म है।
- ब्रह्मणा हुतम्: भोजन करने वाला (कर्ता) भी ब्रह्म है।
भावार्थ: जब हम यह मंत्र बोलते हैं, तो हम यह स्वीकार करते हैं कि भोजन करने वाला, भोजन और उसे पचाने वाली शक्ति—सब कुछ ईश्वर का ही रूप है। इससे खाने के प्रति आदर का भाव पैदा होता है।
2. साथ मिलकर खाने का मंत्र (शांति मंत्र)
गुरुकुलों और सामूहिक भोज में अक्सर यह मंत्र बोला जाता है:
मंत्र:
ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै। तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै।। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।।
अर्थ:
- हे ईश्वर! हम दोनों (गुरु-शिष्य या साथ खाने वाले) की साथ-साथ रक्षा करें।
- हमारा साथ-साथ पालन-पोषण हो।
- हम साथ मिलकर शक्ति प्राप्त करें।
- हमारी बुद्धि तेज हो और हम आपस में कभी द्वेष न करें।
3. भोजन मंत्र का वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक कारण
आयुर्वेद और आधुनिक विज्ञान भी मानते हैं कि खाने से पहले प्रार्थना करना स्वास्थ्य के लिए लाभकारी है:
- पाचन में सुधार (Digestion): जब हम भागदौड़ भरी जिंदगी से रुककर, शांत होकर मंत्र बोलते हैं, तो हमारा दिमाग ‘तनाव’ (Stress) मोड से हटकर ‘विश्राम’ (Relaxation) मोड में आता है। इससे शरीर में पाचक रस (Digestive Enzymes) का स्राव बेहतर होता है।
- माइंडफुल ईटिंग (Mindful Eating): मंत्र बोलने से हमारा पूरा ध्यान भोजन पर केंद्रित हो जाता है। जब हम ध्यान से खाते हैं, तो हम ओवर-ईटिंग से बचते हैं और भोजन का स्वाद बेहतर महसूस होता है।
- कृतज्ञता (Gratitude): यह मंत्र हमें उन किसानों, रसोइयों और प्रकृति का शुक्रिया अदा करने का मौका देता है, जिनकी वजह से यह थाली हमारे सामने है। यह ‘ग्रेटीट्यूड’ मानसिक शांति देता है।
निष्कर्ष
अगली बार जब आप भोजन की थाली के सामने बैठें, तो तुरंत खाना शुरू करने के बजाय 30 सेकंड रुकें। हाथ जोड़ें, भोजन को देखें और मंत्र (या अपनी भाषा में धन्यवाद) बोलें। आप महसूस करेंगे कि वह भोजन केवल पेट नहीं भरेगा, बल्कि आपके मन और आत्मा को भी तृप्त करेगा।
