जयपुर – राजस्थान के जन स्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग (PHED) ने प्रदेश की दशकों पुरानी पेयजल वितरण व्यवस्था में ऐतिहासिक और आमूल-चूल परिवर्तन करने का फैसला किया है। राज्य सरकार की नई ‘ओएंडएम’ (Operations and Maintenance) पॉलिसी के तहत अब जिलों में पानी की सप्लाई और रखरखाव का काम सरकारी फाइलों और छोटे ठेकेदारों से निकलकर देश के बड़े कॉरपोरेट घरानों के हाथों में होगा। इस बड़े बदलाव के तहत अदाणी वॉटर लिमिटेड (Adani Water Limited) और एलएंडटी (L&T) जैसी दिग्गज कंपनियां अब मरुधरा की प्यास बुझाने का जिम्मा संभालेंगी।
क्यों पड़ी इस बड़े बदलाव की जरूरत?
विभाग के उच्च अधिकारियों के अनुसार, वर्तमान व्यवस्था में एक ही जिले में अलग-अलग इलाकों, पंप हाउसों और टंकियों के रखरखाव के लिए सैकड़ों छोटे-छोटे ठेकेदार काम करते हैं। इससे पूरा सिस्टम बिखरा हुआ रहता था।
- निगरानी में विफलता: एईएन (AEN) और एक्सईएन (XEN) स्तर के अधिकारियों के लिए दर्जनों अलग-अलग ठेकेदारों के काम को ट्रैक करना और उनकी जवाबदेही तय करना मुश्किल होता था।
- तकनीकी अभाव: छोटे ठेकेदारों के पास आधुनिक मशीनरी, लीकेज ढूंढने की तकनीक और कुशल प्रबंधन (Management) की भारी कमी थी, जिसका खामियाजा जनता को भुगतना पड़ता था।
- बिखरी हुई व्यवस्था: जनता की शिकायतों के निवारण के लिए कोई एक ‘सिंगल विंडो’ नहीं थी।
नई नीति: ‘एक जिला, एक कंपनी’ (Single Accountability)
नई पॉलिसी का मूल मंत्र है—पूरी जिम्मेदारी एक ही बड़ी एजेंसी की होगी।
- सिंगल विंडो अकाउंटेबिलिटी: अब पूरे जिले की जलापूर्ति का जिम्मा एक ही कंपनी पर होगा। इससे ‘ब्लेम गेम’ (आरोप-प्रत्यारोप) खत्म होगा और चीफ इंजीनियर सीधे कंपनी के टॉप मैनेजमेंट से जवाब तलब कर सकेंगे।
- केंद्रीकृत कॉल सेंटर: हर जिले के लिए एक हाई-टेक ‘सेंट्रलाइज्ड कॉल सेंटर’ बनेगा। उपभोक्ताओं को अब लाइनमैन या जेईएन के पीछे भागना नहीं पड़ेगा; एक कॉल पर शिकायत दर्ज होगी और समय सीमा में समाधान न होने पर कंपनी पर गाज गिरेगी।
- परफॉर्मेंस आधारित भुगतान: कंपनियों को भुगतान फिक्स नहीं, बल्कि काम की गुणवत्ता (Quality of Service) पर मिलेगा। अगर पानी की शुद्धता (TDS/Chlorine level) या सप्लाई के समय में गड़बड़ी मिली, तो भारी दंड (Penalty) का प्रावधान रखा गया है।
प्री-टेंडर कॉन्फ्रेंस में दिखी कॉरपोरेट रुचि
जयपुर में हाल ही में आयोजित ‘प्री-टेंडर स्टेकहोल्डर कॉन्फ्रेंस’ में इस नए मॉडल की झलक देखने को मिली। इसमें अदाणी वॉटर लिमिटेड, एलएंडटी प्रा. लि. और जीवीपीआर (GVPR) जैसी इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र की दिग्गज कंपनियों ने हिस्सा लिया और राजस्थान के जल प्रबंधन में गहरी रुचि दिखाई। इससे साफ है कि आने वाले दिनों में प्रदेश का वाटर मैनेजमेंट पूरी तरह हाई-टेक होने वाला है।
विरोध के स्वर: छोटे ठेकेदारों में आक्रोश
सरकार के इस फैसले से छोटे ठेकेदारों में हड़कंप मच गया है। बरसों से पंप हाउस और छोटी स्कीम्स चला रहे ठेकेदारों के एक गुट ने इसे ‘कॉर्पोरेट की मनमानी’ और एकाधिकार (Monopoly) करार दिया है। उनका कहना है:
“बड़ी कंपनियों के आने से स्थानीय छोटे ठेकेदार पूरी तरह बाजार से बाहर हो जाएंगे। इससे हजारों सुपरवाइजर, पंप ऑपरेटर और लेबर बेरोजगार हो जाएंगे। सरकार को हमारे हितों के बारे में भी सोचना चाहिए।”
उपभोक्ताओं (आम जनता) को क्या मिलेगा? तमाम विरोधों के बीच विभाग का दावा है कि अंतिम फायदा जनता का ही है।
- गर्मियों में राहत: भीषण गर्मी में जब पानी की मांग बढ़ती है, तब बड़ी कंपनियों के पास बेहतर संसाधन होंगे जिससे सप्लाई बाधित नहीं होगी।
- SCADA सिस्टम: पानी की चोरी और लीकेज रोकने के लिए ‘स्काडा’ (SCADA) जैसी आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल होगा।
- दूषित जल से मुक्ति: पुरानी और लीकेज पाइपलाइनों को बदलने और पानी की गुणवत्ता जांचने के लिए अब विश्वस्तरीय मानक अपनाए जाएंगे।
फिलहाल, निविदा प्रक्रिया अंतिम चरणों में है और माना जा रहा है कि अगले वित्तीय वर्ष की शुरुआत से कई जिलों में यह नई व्यवस्था लागू हो जाएगी।
