राजस्थान के दौसा जिले के महुवा उपखंड स्थित पावटा गांव में होली खेलने का अंदाज पूरे देश से बिल्कुल अलग है। यहाँ धुलंडी के दिन नहीं, बल्कि उसके अगले दिन (होली की दूज पर) गुर्जर समाज द्वारा सदियों पुरानी ‘डोलची होली’ (Dolchi Holi) खेली जाती है। हदीरा मैदान में पानी की बौछारों और चमड़े की डोलची के प्रहार से खेली जाने वाली इस होली को देखने के लिए देशभर से लोग पहुंचते हैं।
शहीद बल्लू सिंह के अदम्य साहस की याद
हजारों साल पुरानी यह परंपरा वीर योद्धा बल्लू सिंह (बल्लू शहीद) की याद में निभाई जाती है। गांव के बुजुर्गों के अनुसार, प्राचीन काल में दो समुदायों के बीच हुए एक भीषण युद्ध में पावटा गांव के बल्लू सिंह का सिर धड़ से अलग हो गया था। लेकिन उनका शौर्य ऐसा था कि सिर कटने के बावजूद उनका धड़ विपक्षी सेना से लड़ता रहा और जब तक दुश्मनों का खात्मा नहीं हो गया, वे नहीं रुके। उन्हीं की इस वीरगति और बलिदान को नमन करने के लिए हर साल डोलची होली का आयोजन होता है।
एक महीने पहले से शुरू हो जाती है तैयारी
इस अनोखी होली की तैयारियां गांव में एक महीने पहले से ही शुरू हो जाती हैं। युद्ध के मैदान जैसा एहसास जगाने के लिए युवा अपनी पीठ को मजबूत करने के लिए पहले से ही हल्दी और तेल की मालिश करवाते हैं। वहीं, पानी मारने के लिए उपयोग होने वाले चमड़े के पात्र (डोलची) को 15 दिन पहले से तेल पिलाया जाता है, ताकि चमड़ा नरम रहे और प्रहार करते समय फटे नहीं।
हदीरा मैदान में दो सेनाओं का आमना-सामना
होली की दूज पर पावटा गांव के हदीरा मैदान में दो सेनाएं (गुट) आमने-सामने होती हैं। एक तरफ पीलवाड़ पट्टी (गोत्र) और दूसरी तरफ दडगस गोत्र (जिंद पार्टी) के युवा हाथों में चमड़े की डोलची और रंग-पानी की बाल्टियां लेकर उतरते हैं। इस दौरान युवा एक-दूसरे की नंगी पीठ पर डोलची से पानी की जोरदार बौछार मारते हैं और ‘शहीद बल्लू सिंह’ के जयकारे लगाते हैं। इस आक्रामक खेल के कारण इसे कई बार ‘खूनी होली’ भी कहा जाता है।
इस मुख्य आयोजन के बाद ‘देवर-भाभी की होली’ खेली जाती है, जिसमें भाभियां अपने देवरों पर डोलची से प्रहार करती हैं और अंत में पूरे उत्साह के साथ ढोला-मारू की सवारी निकाली जाती है।
जब परंपरा टूटी, तो गांव में पड़ा था अकाल
इस परंपरा को लेकर गांव वालों में गहरी आस्था है। बुजुर्ग बताते हैं कि इतिहास में एक बार किसी कारणवश गांव में डोलची होली नहीं खेली गई थी। इसका परिणाम यह हुआ कि पूरे गांव को प्राकृतिक आपदाओं ने घेर लिया और भयंकर अकाल पड़ गया। तब ग्रामीणों ने बल्लू शहीद के स्थान पर जाकर मन्नतें मांगीं और शपथ ली कि वे हर साल धूलंडी के अगले दिन यह होली जरूर खेलेंगे। तब जाकर गांव को आपदाओं से छुटकारा मिला। उस दिन से लेकर आज तक यह परंपरा बिना रुके अनवरत चली आ रही है।
