साल में सिर्फ 24 घंटे खुलता है महाकाल के शिखर पर बसा यह रहस्यमयी मंदिर, जहाँ सर्प शय्या पर विष्णु नहीं, भोलेनाथ विराजते हैं

उज्जैन। भारत मंदिरों का देश है, लेकिन मध्य प्रदेश की धार्मिक राजधानी उज्जैन में एक ऐसा मंदिर है जो अपने आप में एक रहस्य और आश्चर्य समेटे हुए है। यह है नागचंद्रेश्वर मंदिर (Nagchandreshwar Mandir)। द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक श्री महाकालेश्वर मंदिर के परिसर में स्थित यह मंदिर साल में 365 दिनों में से केवल एक दिन— नागपंचमी (श्रावण शुक्ल पंचमी) के दिन ही भक्तों के लिए खोला जाता है। बाकी 364 दिन यहाँ सन्नाटा और रहस्य का पहरा रहता है।

महाकाल के शिखर पर, तीसरी मंजिल का रहस्य

यह दुर्लभ मंदिर महाकालेश्वर मंदिर के गर्भगृह के ठीक ऊपर तीसरी मंजिल पर स्थित है। यहाँ तक पहुँचने के लिए एक विशेष लोहे की सीढ़ी का उपयोग किया जाता है, जो साल में केवल एक बार आम श्रद्धालुओं के लिए खोली जाती है। नागपंचमी की मध्यरात्रि (रात 12 बजे) महानिर्वाणी अखाड़े के महंत द्वारा त्रिकाल पूजा के साथ इसके पट खोले जाते हैं और अगले 24 घंटे तक यहाँ आस्था का सैलाब उमड़ता है।

दुनिया की इकलौती प्रतिमा: जहाँ शिव हैं सर्प शय्या पर

आमतौर पर हिंदू धर्मशास्त्रों और मंदिरों में भगवान विष्णु को शेषनाग की शय्या पर लेटे हुए दिखाया जाता है। लेकिन नागचंद्रेश्वर मंदिर पूरी दुनिया में एकमात्र ऐसा स्थान है जहाँ भगवान शिव और माता पार्वती सर्प शय्या पर विराजमान हैं।

  • नेपाल से कनेक्शन: इतिहासकारों और मान्यताओं के अनुसार, यह अद्वितीय प्रतिमा 11वीं शताब्दी की है और इसे नेपाल से यहाँ लाया गया था। परमार कालीन यह मूर्ति कला का बेजोड़ नमूना है।
  • दशमुखी नाग: इस प्रतिमा में नागराज तक्षक अपने 10 फनों को फैलाकर शिव-पार्वती और गणेश जी के लिए आसन बनाए हुए हैं। शिवजी के गले और भुजाओं में भी भुजंग लिपटे हुए हैं, जो अद्भुत दृश्य प्रस्तुत करते हैं।

पौराणिक कथा: तक्षक नाग की एकांत तपस्या

इस मंदिर के साल में एक बार खुलने के पीछे एक गहरी पौराणिक कथा छिपी है। मान्यता है कि सर्पराज तक्षक ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए घोर तपस्या की थी। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भोलेनाथ ने उन्हें अमरत्व का वरदान दिया। तक्षक नाग ने वरदान में शिव के सान्निध्य में रहने की इच्छा जताई, लेकिन साथ ही यह शर्त भी रखी कि उनके एकांत में कोई विघ्न न पड़े।

अतः प्रभु की आज्ञा से तक्षक नाग महाकाल वन (उज्जैन) में वास करने लगे। उनकी एकांत साधना भंग न हो, इसलिए यह मंदिर साल भर बंद रहता है। केवल नागपंचमी के दिन, जो कि नागों की पूजा का विशेष पर्व है, तक्षक राज भक्तों को दर्शन देने के लिए उपलब्ध होते हैं।

कालसर्प दोष से मुक्ति का महाद्वार

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, जिन लोगों की कुंडली में कालसर्प दोष होता है, उनके लिए नागचंद्रेश्वर के दर्शन अमोघ फलदायी माने जाते हैं। मान्यता है कि नागपंचमी के दिन इस अद्भुत प्रतिमा के दर्शन मात्र से और यहाँ बहने वाली हवा के स्पर्श से ही कालसर्प दोष और सर्प भय समाप्त हो जाते हैं। यही कारण है कि इस एक दिन यहाँ देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु कतारों में लगकर अपनी बारी का इंतजार करते हैं।

पूजा विधि और परंपरा

नागपंचमी के दिन यहाँ तीन विशेष आरतियां होती हैं:

  1. प्रथम पूजा: रात 12 बजे पट खुलते ही महानिर्वाणी अखाड़े के महंत द्वारा।
  2. द्वितीय पूजा: दोपहर 12 बजे शासकीय (सरकारी) पूजा।
  3. तृतीय पूजा: शाम को महाकाल मंदिर समिति द्वारा।

अगले दिन रात 12 बजे पुनः आरती के बाद मंदिर के पट एक साल के लिए बंद कर दिए जाते हैं, और तक्षक नाग फिर से अपनी अनंत तपस्या में लीन हो जाते हैं।

Live Sach – तेज़, भरोसेमंद हिंदी समाचार। आज की राजनीति, राजस्थान से ब्रेकिंग न्यूज़, मनोरंजन, खेल और भारतदुनिया की हर बड़ी खबर!

Share This Article