गुर्जर-प्रतिहार युगीन बाडौली (बड़ोली) मंदिर समूह: एक विस्तृत पुरातात्विक एवं ऐतिहासिक सर्वेक्षण (8वीं-12वीं शताब्दी)

1. प्रस्तावना: चम्बल की घाटी में विस्मृत वैभव

राजस्थान के चित्तौड़गढ़ जिले में, रावतभाटा के परमाणु ऊर्जा संयंत्रों और राणा प्रताप सागर बांध की आधुनिकता से परे, चम्बल नदी के पूर्वी तट पर भारतीय वास्तुकला का एक अनमोल रत्न छिपा हुआ है—बाडौली (जिसे बड़ोली भी कहा जाता है) के मंदिर । 8वीं से 12वीं शताब्दी के मध्य, विशेष रूप से 10वीं शताब्दी में गुर्जर-प्रतिहार साम्राज्य के वैभवशाली काल में निर्मित, यह मंदिर समूह उत्तर भारतीय ‘नागर’ शैली की वास्तुकला का एक उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करता है ।

घने जंगलों और प्राकृतिक जल स्रोतों (कुंड) के बीच स्थित, बाडौली के मंदिर न केवल अपनी स्थापत्य कला की शुद्धता के लिए विख्यात हैं, बल्कि वे उस संक्रमणकालीन दौर के साक्षी भी हैं जब गुप्तकालीन कला की शास्त्रीयता मध्यकालीन भारत की अलंकृत शैली में परिवर्तित हो रही थी। कर्नल जेम्स टॉड, जिन्होंने 19वीं शताब्दी में इन मंदिरों को पश्चिमी दुनिया के समक्ष प्रस्तुत किया, ने इनकी प्रशंसा करते हुए इन्हें “अपने युग के सबसे पूर्ण और अद्वितीय” स्मारकों की संज्ञा दी थी ।

यह शोध प्रतिवेदन बाडौली मंदिर समूह का एक गहन, विस्तृत और आलोचनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। इसमें मंदिरों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, गुर्जर-प्रतिहारों और हूणों से जुड़ी किंवदंतियों का द्वंद्व, वास्तुशिल्प की बारीकियां, मूर्तिशास्त्रीय (iconographic) विश्लेषण, और आधुनिक संरक्षण की चुनौतियों—जिसमें नटराज की मूर्ति की चोरी और वापसी शामिल है—पर विस्तार से चर्चा की गई है। लगभग 15,000 शब्दों का यह दस्तावेज इस बात की पड़ताल करता है कि कैसे एक सुदूर वन क्षेत्र में स्थित यह तीर्थस्थल भारतीय संस्कृति और कला का एक जीवंत दस्तावेज बना हुआ है।

2. ऐतिहासिक भूगोल और खोज का इतिहास

2.1 भौगोलिक स्थिति: अरावली और चम्बल का संगम

बाडौली मंदिर समूह (24°57′29″N 75°35′37″E) कोटा से लगभग 45-50 किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम में और चित्तौड़गढ़ जिला मुख्यालय से लगभग 115 किलोमीटर दूर स्थित है । यह स्थल बामनी और चम्बल नदियों के संगम के निकट, रावतभाटा शहर की बाहरी सीमा पर स्थित है। ऐतिहासिक रूप से, यह क्षेत्र ‘पचैल’ (Puchail) के घने जंगलों का हिस्सा था, जो मेवाड़ और हाड़ौती के राज्यों को अलग करता था ।

मंदिरों की स्थिति का चयन अत्यंत सोच-समझकर किया गया था। प्राचीन भारतीय वास्तुशास्त्र के अनुसार, नदी के तट और वनों के एकांत को तपस्या और देव-पूजन के लिए श्रेष्ठ माना जाता है। बाडौली में एक प्राकृतिक जल स्रोत (कुंड) की उपस्थिति ने इसे एक पवित्र ‘तीर्थ’ का दर्जा दिया, जहाँ जल और ईश्वर का मिलन होता है । 1950 के दशक में राणा प्रताप सागर बांध के निर्माण से पूर्व, यह क्षेत्र घने अरण्य से आच्छादित था, जिसमें पीपल, कदम्ब, आम और जामुन के वृक्षों की बहुलता थी, जो आज भी मंदिर परिसर में देखे जा सकते हैं ।

2.2 कर्नल जेम्स टॉड और बाडौली की ‘खोज’ (1821 ई.)

बाडौली के मंदिरों का आधुनिक इतिहास लेखन मुख्य रूप से लेफ्टिनेंट-कर्नल जेम्स टॉड के वृत्तांतों पर आधारित है। ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के राजनीतिक एजेंट के रूप में, टॉड ने 1821 ईस्वी में इस स्थल का दौरा किया । अपनी प्रसिद्ध कृति Annals and Antiquities of Rajasthan में, टॉड ने बाडौली के मंदिरों का वर्णन अत्यंत भावुक और प्रशंसात्मक शैली में किया है।

टॉड के लिए, बाडौली केवल पत्थरों का ढेर नहीं था, बल्कि एक “स्वर्ण युग” का अवशेष था जो अब “पतित” हो चुका था। उन्होंने लिखा कि इन मंदिरों की वास्तुकला का वर्णन करना “कलम के बस की बात नहीं, यह केवल चित्रकार की पेंसिल का काम है, और वह भी अनंत श्रम की मांग करता है” । टॉड ने मंदिरों की नक्काशी और शिल्प की तुलना ओसियां और झालरापाटन के मंदिरों से की, लेकिन बाडौली के बफ (buff) रंग के बलुआ पत्थर की गुणवत्ता को श्रेष्ठ बताया, जिसने शिल्पकारों को अधिक गोल और मांसल आकृतियाँ उकेरने की स्वतंत्रता दी ।

चित्रकार घासी (Gassi) और ‘प्रतिरोध’ का कलात्मक आख्यान

टॉड के साथ उनके स्थानीय चित्रकार, जिन्हें ‘घासी’ (Gassi) या ‘घसी’ के नाम से जाना जाता है, भी थे। हालिया शोध और पुरातात्विक विश्लेषणों से पता चलता है कि जहाँ टॉड ने अपने लेखन में मंदिरों को “खंडहर” और “क्षय” के रूप में प्रस्तुत किया (जो औपनिवेशिक दृष्टिकोण को दर्शाता था कि भारत का गौरवशाली अतीत समाप्त हो चुका है), वहीं घासी ने अपने चित्रों में मंदिरों को अक्सर “पूर्ण” और “भव्य” रूप में चित्रित किया ।

एक अत्यंत रोचक तथ्य यह है कि घासी ने बाडौली के मंदिर के शिखर के एक चित्र में एक “रात्रिकालीन पर्वतारोही” (Night Climber) या प्रेमी की आकृति को उकेरा, जो रस्सी के सहारे मंदिर पर चढ़ रहा था। यह वास्तुकला का हिस्सा नहीं था, बल्कि राजस्थानी लोककथाओं का एक चरित्र था—एक प्रेमी जो अपनी प्रेमिका से मिलने के लिए जान की बाजी लगाता है। विद्धानों का मानना है कि यह घासी द्वारा टॉड के शुष्क पुरातात्विक दृष्टिकोण के प्रति एक “मूक प्रतिरोध” या “शरारत” (mischief) थी, जो यह दर्शाती थी कि यह स्थान केवल एक मृत खंडहर नहीं, बल्कि जीवित लोक-संस्कृति और मानवीय भावनाओं का केंद्र था ।

3. ऐतिहासिक संदर्भ: गुर्जर-प्रतिहार साम्राज्य बनाम हूण किंवदंती

बाडौली के मंदिरों की तिथि और निर्माणकर्ता के विषय में ऐतिहासिक तथ्यों और स्थानीय किंवदंतियों के बीच एक गहरा द्वंद्व है।

3.1 पुरातात्विक साक्ष्य: गुर्जर-प्रतिहार काल (10वीं शताब्दी)

आधुनिक पुरातत्व और वास्तुकला इतिहासकार (जैसे ए.एस.आई. और वासुदेव शरण अग्रवाल) इन मंदिरों को निर्विवाद रूप से 10वीं से 11वीं शताब्दी के मध्य का मानते हैं । यह काल उत्तर भारत में गुर्जर-प्रतिहार साम्राज्य (Gurjara-Pratihara Empire) के चरमोत्कर्ष और बाद के विखंडन का काल था।

प्रतिहार शासक, जो स्वयं को लक्ष्मण (राम के प्रतिहार या द्वारपाल) का वंशज मानते थे, कला और संस्कृति के महान संरक्षक थे। उनके शासनकाल में ‘मारू-गुर्जर’ (Maru-Gurjara) शैली का विकास हुआ, जो बाद में पश्चिमी भारत की प्रमुख मंदिर शैली बनी। बाडौली के मंदिर इसी शैली के परिपक्व चरण का प्रतिनिधित्व करते हैं । मंदिरों के तल-विन्यास (Plan), शिखर की संरचना, और मूर्तियों के आभूषणों की शैली 10वीं शताब्दी के प्रतिहार कला मुहावरों (idioms) से मेल खाती है ।

3.2 हूण राजा मिहिरकुल की किंवदंती

इसके विपरीत, स्थानीय जनश्रुतियों और जेम्स टॉड के विवरणों में इन मंदिरों को हूण राजा मिहिरकुल (6वीं शताब्दी) से जोड़ा जाता है। मंदिर परिसर में स्थित ‘शृंगार चौरी’ (Sringar Chauri) को स्थानीय लोग मिहिरकुल का विवाह मंडप मानते हैं ।

  • ऐतिहासिक विरोधाभास: मिहिरकुल (शासनकाल लगभग 515–542 ई.) एक अल्चोन हूण (Alchon Hun) राजा था, जो अपनी क्रूरता और बौद्ध धर्म के प्रति वैर भाव के लिए जाना जाता था । उसका काल 6वीं शताब्दी है, जबकि बाडौली के मंदिर वास्तुकला की दृष्टि से 10वीं शताब्दी के हैं। अतः, 400 वर्षों का यह अंतर यह सिद्ध करता है कि मिहिरकुल ने वर्तमान मंदिरों का निर्माण नहीं कराया था।
  • किंवदंती का मूल: संभव है कि इस क्षेत्र में हूणों का कोई पुराना इतिहास रहा हो, या मिहिरकुल, जो एक कट्टर शैव था , की स्मृतियाँ स्थानीय लोककथाओं में जीवित रहीं और बाद में इन भव्य मंदिरों के साथ जुड़ गईं। टॉड ने, जो राजपूतों की उत्पत्ति को सीथियन या हूणों से जोड़ते थे, इस किंवदंती को बिना आलोचनात्मक परीक्षण के स्वीकार कर लिया, जिससे यह भ्रांति लंबे समय तक बनी रही ।

निष्कर्षतः, बाडौली के मंदिर गुर्जर-प्रतिहार वास्तुकला के उत्कृष्ट नमूने हैं, न कि हूणों के निर्माण, यद्यपि हूणों की किंवदंती ने स्थल को एक रहस्यमय आभामंडल प्रदान किया है।

4. वास्तुकला और स्थापत्य शैली: नागर और मारू-गुर्जर का समन्वय

बाडौली मंदिर समूह में कुल 9 मंदिर हैं, जिनमें से 8 एक चारदीवारी (walled enclosure) के भीतर स्थित हैं और एक मंदिर लगभग 1 किलोमीटर दूर है । ये मंदिर स्थानीय सैंडस्टोन (बलुआ पत्थर) से निर्मित हैं, जिन्हें बिना चूने या गारे के, केवल लोहे की कीलों (dowels) और गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत पर इंटरलॉकिंग तकनीक (dry masonry) से जोड़ा गया है ।

4.1 वास्तु योजना (Architectural Plan)

बाडौली के अधिकांश मंदिर नागर शैली की उप-शैली ‘महा-मारू’ या प्रारंभिक ‘मारू-गुर्जर’ परंपरा का पालन करते हैं। इनके मुख्य घटक निम्नलिखित हैं:

  1. गर्भगृह (Garbhagriha): मुख्य देवता का कक्ष, जो आमतौर पर वर्गाकार होता है।
  2. अंतराल (Antarala): गर्भगृह और मंडप के बीच का गलियारा।
  3. मुखमंडप/मंडप (Mukhamandapa): स्तंभों पर आधारित प्रवेश कक्ष।
  4. शिखर (Shikhara): गर्भगृह के ऊपर उठने वाला वक्राकार मीनार, जो मेरु पर्वत का प्रतीक है।
  5. वेदीबंध (Vedibandha): मंदिर का आधार या प्लिंथ, जिसमें खुर, कुम्भ, कलश और कपोतपाली जैसे पारंपरिक मोल्डिंग्स होते हैं ।

तालिका 1: बाडौली मंदिर समूह का वर्गीकरण

क्र.सं.मंदिर का नामसमर्पित देवतावास्तुकला शैलीविशेष लक्षण
1.घटेश्वर महादेवशिवपंचरथ, लतिना शिखरपरिसर का सबसे भव्य मंदिर, तोरण द्वार, शृंगार चौरी।
2.त्रिमूर्ति मंदिरशिव (महेशमूर्ति)पंचरथ, नागरतीन मुखों वाली शिव प्रतिमा (क्षतिग्रस्त)।
3.वामन मंदिरविष्णु (वामन)लघु नागर शैलीवामन अवतार की प्रतिमा, गर्भगृह और अंतराल।
4.शेषशायी विष्णुविष्णुआयताकार तल-विन्यासवल्लभी शिखर (अनुपस्थित), लेटे हुए विष्णु।
5.गणेश मंदिरगणेशनागर शैलीपूर्वमुखी, विघ्नहर्ता की प्रतिमा।
6.महिशसुरमर्दिनी (1)दुर्गाफमसना/नागरपरिसर के भीतर, देवी की पूजित प्रतिमा।
7.महिशसुरमर्दिनी (2)दुर्गालतिना शिखरपरिसर से 1 किमी दूर, नव-भूमि शिखर।
8.जल मंदिर (कुंड में)शिवसर्वतोभद्रजल के बीच स्थित, जालीदार दीवारें।
9.अष्टमाता/माताजीदेवीदेवी को समर्पित अन्य लघु मंदिर।

5. घटेश्वर महादेव मंदिर: वास्तुकला का शिखर

घटेश्वर महादेव मंदिर बाडौली समूह का सबसे प्रमुख और संरक्षित मंदिर है। यह 10वीं शताब्दी की प्रतिहार कला का एक ‘टेक्स्टबुक’ उदाहरण है । इसका नामकरण यहाँ स्थित शिवलिंग के ‘घट’ (घड़े) के आकार के होने के कारण हुआ है, या संभवतः इसके शिखर की पूर्णता के कारण ।

5.1 मुख्य मंदिर (मूलप्रासाद)

मंदिर का गर्भगृह ‘पंचरथ’ योजना (pancharatha plan) पर आधारित है, अर्थात इसकी बाहरी दीवारों पर प्रत्येक तरफ पाँच उर्ध्वाधर (vertical) प्रक्षेपण हैं। यह संरचना न केवल सौंदर्य बढ़ाती है बल्कि प्रकाश और छाया का एक अद्भुत खेल भी रचती है।

  • शिखर: इसका शिखर ‘लतिना’ (Latina) श्रेणी का है, जो एक एकल वक्राकार मीनार है। शिखर की सतह पर ‘गवाक्ष’ (जाली) का अत्यंत बारीक अलंकरण है। शिखर के शीर्ष पर एक विशाल ‘आमलक’ (ribbed disc) और ‘कलश’ स्थापित है, जो इसे पूर्णता प्रदान करते हैं ।
  • शुकनास (Sukanasa): शिखर के सामने के भाग में, अंतराल के ऊपर, एक अलंकृत प्रक्षेपण है जिसे शुकनास (तोते की चोंच जैसा) कहा जाता है। इसके दक्षिणी फलक पर एक अद्वितीय दृश्य उकेरा गया है—एक छज्जे पर तीन स्त्रियाँ और उनके ऊपर एक बंदर शांतिपूर्वक फल खा रहा है। धार्मिक गंभीरता के बीच यह हास्य और स्वाभाविकता का एक दुर्लभ उदाहरण है ।
  • प्रवेश द्वार (मकर-तोरण): मंदिर में प्रवेश एक भव्य ‘मकर-तोरण’ के माध्यम से होता है। यह एक अलंकृत मेहराब है जो दो मकरों (पौराणिक मगरमच्छ) के मुख से निकलता है। तोरण पर मालाधारी विद्याधर, गंधर्व और कीर्तिमुख का अंकन है, जो इसे एक शाही भव्यता प्रदान करता है ।

5.2 मंडप और स्तंभ

गर्भगृह के सामने छह स्तंभों वाला एक मुखमंडप है। इसके स्तंभों पर अप्सराओं और ‘सुरसुंदरियों’ का अंकन है। ये सुरसुंदरियाँ विभिन्न मुद्राओं में हैं—नृत्य करती हुई, दर्पण देखती हुई, या आलस्य में अंगड़ाई लेती हुई। जेम्स टॉड ने इन स्तंभों की नक्काशी को “अद्वितीय” बताया था। छत (ceiling) पर वर्गाकार और गोलाकार डिजाइनों में कमल के फूलों का अत्यंत विस्तृत अलंकरण है, जो केंद्र में एक लटकते हुए कमल के रूप में परिणत होता है ।

6. शृंगार चौरी (रंगमंडप): एक वास्तुकला पहेली

घटेश्वर मंदिर के ठीक सामने, एक अलग चबूतरे पर स्थित ‘शृंगार चौरी’ (Sringar Chauri) इस परिसर का सबसे आकर्षक और चर्चित हिस्सा है।

  • नाम और कार्य: यद्यपि इसे मिहिरकुल का ‘विवाह मंडप’ कहा जाता है, वास्तुशास्त्र की दृष्टि से यह एक ‘रंगमंडप’ (Rangamandapa) है, जिसका उपयोग देव-पूजन के समय संगीत और नृत्य के प्रदर्शन के लिए किया जाता था । ‘शृंगार’ का अर्थ है सजावट या प्रेम, और ‘चौरी’ का अर्थ है मंडप।
  • संरचना: यह एक खुला स्तंभयुक्त हॉल है। इसके केंद्र में चार मुख्य स्तंभ हैं, जो अत्यधिक अलंकृत हैं, और परिधि पर 20 साधारण स्तंभ हैं। यह विन्यास इसे एक क्रूसिफ़ॉर्म (cruciform) योजना देता है। इसके चारों ओर ‘कक्षासन’ (पत्थर की सीटें) बनी हैं, जहाँ बैठकर भक्त अनुष्ठानों का अवलोकन कर सकते थे ।
  • शिखर: मुख्य मंदिर के वक्राकार शिखर के विपरीत, शृंगार चौरी की छत ‘फमसना’ (pyramidal) शैली की है, जो कई स्तरों में ऊपर उठती है और घंटी के आकार के तत्वों से सजी है ।
  • कालक्रम: विद्वानों का मानना है कि शृंगार चौरी का निर्माण मुख्य मंदिर के कुछ समय बाद, संभवतः 10वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में, एक अतिरिक्त संरचना के रूप में किया गया था ।

7. परिसर के अन्य प्रमुख मंदिर: विविधता और विशिष्टता

7.1 त्रिमूर्ति मंदिर

यह मंदिर, यद्यपि आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त है, अपनी मूर्तिशास्त्रीय महत्ता के लिए जाना जाता है।

  • महेशमूर्ति: गर्भगृह में शिव की एक विशाल ‘त्रिमूर्ति’ या ‘महेशमूर्ति’ स्थापित है। इसमें शिव के तीन रूप एक साथ दिखाए गए हैं: मध्य में ‘तत्पुरुष’ (शांत/सौम्य), दाईं ओर ‘अघोर’ (रौद्र/भयानक), और बाईं ओर ‘वामदेव’ (स्त्रीसुलभ/सुंदर)। दुर्भाग्यवश, यह मूर्ति विरूपित (defaced) है, संभवतः आक्रांताओं द्वारा या समय के साथ क्षतिग्रस्त हो गई है ।
  • ललाटबिंब: गर्भगृह के द्वार के ललाटबिंब (lintel) पर नटराज की मूर्ति है, जो शिव के तांडव रूप को दर्शाती है ।

7.2 वामन मंदिर

परिसर का सबसे छोटा मंदिर, वामन मंदिर, 10वीं शताब्दी का है।

  • वामन अवतार: इसके गर्भगृह में विष्णु के वामन अवतार (बौने ब्राह्मण) की चतुर्भुज मूर्ति है। वामन का पेट निकला हुआ है (potbelly) और वे उपदेश देने की मुद्रा में प्रतीत होते हैं। यह वैष्णव वास्तुकला का एक सुंदर लघु उदाहरण है।
  • शिल्प: मंदिर की दीवारों पर ‘ग्रासमुख’ (कीर्तिमुख) की पट्टियाँ हैं और शिखर क्षतिग्रस्त होने के बावजूद अपने मूल नागर स्वरूप का संकेत देता है ।

7.3 शेषशायी विष्णु मंदिर

यह मंदिर अपनी आयताकार योजना (Rectangular Plan) के कारण अद्वितीय है। सामान्यतः हिंदू मंदिर वर्गाकार होते हैं, लेकिन लेटे हुए (शेषशायी) विष्णु की मूर्ति को समायोजित करने के लिए इसे आयताकार बनाया गया था।

  • वल्लभी शिखर: इसका मूल शिखर संभवतः ‘वल्लभी’ शैली (गजपृष्ठाकार या wagon-vault) का था, जो अब नष्ट हो चुका है। गर्भगृह के अंदर की शेषशायी विष्णु की मूर्ति, जिसे टॉड और अन्य शुरुआती यात्रियों ने “भारत की सबसे सुंदर मूर्तियों में से एक” माना था, अब यहाँ नहीं है; इसे सुरक्षा कारणों से कोटा के संग्रहालय में स्थानांतरित कर दिया गया है ।

7.4 जल मंदिर (कुंड के मध्य शिव मंदिर)

परिसर के एक ओर स्थित प्राकृतिक कुंड के मध्य में एक शिव मंदिर बना है। यह ‘सर्वतोभद्र’ शैली (चारों दिशाओं से खुला) का प्रतीत होता है। पानी के बीच स्थित होने के कारण इसका वातावरण अत्यंत शांत और पवित्र है। इसमें जालीदार दीवारों का प्रयोग किया गया है जो हवा और प्रकाश को गर्भगृह तक पहुँचाती हैं ।

8. मूर्तिशास्त्र और कला का सौंदर्य (Iconography and Aesthetics)

बाडौली की मूर्तिकला परिपक्व प्रतिहार शैली का प्रतिनिधित्व करती है। यहाँ की मूर्तियाँ खजुराहो की कामुकता और गुप्त काल की आध्यात्मिक शांति का एक संतुलित मिश्रण हैं।

8.1 शिव के विविध रूप

  • अंधकासुर-वध: घटेश्वर मंदिर की बाहरी दीवार (जंघा) के दक्षिण आला (niche) में शिव को अंधकासुर-वध मूर्ति (Andhakantaka) के रूप में दिखाया गया है। शिव ‘आलीढ़’ मुद्रा (धनुर्धर की मुद्रा) में हैं, उनके हाथों में त्रिशूल है जिससे वे अंधक राक्षस का वध कर रहे हैं, और गजासुर की खाल को ओढ़े हुए हैं। नीचे चामुंडा खप्पर (कपाल) लिए रक्त पीने को तैयार खड़ी हैं। यह मूर्ति गति और रौद्र रस का अद्भुत प्रदर्शन है 16
  • नटराज: मंदिरों के ललाटबिंबों और आलों में नटराज (नटेश) की कई मूर्तियाँ हैं। 1998 में चोरी हुई और 2020 में वापस लाई गई नटराज मूर्ति (जिसका विवरण आगे है) इसी कलात्मकता का प्रमाण थी।

8.2 सुरसुंदरियाँ: पत्थर में कविता

बाडौली के स्तंभों और दीवारों पर अंकित ‘सुरसुंदरियाँ’ (अप्सराएं) केवल सजावट नहीं हैं, बल्कि मंदिर की ‘शक्ति’ और ‘मंगल’ का प्रतीक हैं।

  • कंटक-शोधिनी: एक प्रसिद्ध मूर्ति में एक नायिका को अपने पैर से कांटा निकालते हुए (Removing thorn) दिखाया गया है। उसके चेहरे पर पीड़ा और सुकुमारता का मिश्रित भाव अत्यंत सजीव है ।
  • शृंगार: अन्य मूर्तियों में नायिकाओं को बाल निचोड़ते हुए, अंजन (काजल) लगाते हुए, या पालतू पक्षियों के साथ खेलते हुए दिखाया गया है। ये दृश्य मंदिर को एक जीवंत मानवीय स्पर्श देते हैं ।

8.3 चोरी हुई नटराज मूर्ति का प्रकरण (1998-2020)

बाडौली की कलात्मक महत्ता का एक दुर्भाग्यपूर्ण प्रमाण 1998 में सामने आया, जब घटेश्वर मंदिर से नटराज की एक दुर्लभ मूर्ति चोरी हो गई।

  • मूर्ति का विवरण: यह 10वीं शताब्दी की पत्थर की मूर्ति थी, जिसमें शिव 16 भुजाओं के साथ नृत्य मुद्रा में थे। उनके जटामुकुट पर मोतियों की माला और एक बड़ा मुकुट (diadem) था। चेहरे के भाव अत्यंत सूक्ष्म और सुंदर थे ।
  • वापसी: इस मूर्ति को तस्करों द्वारा लंदन ले जाया गया और एक निजी संग्रहकर्ता को बेच दिया गया। दो दशकों के कूटनीतिक प्रयासों और पुलिस जांच (ऑपरेशन ब्लैक होल) के बाद, 2020 में यह मूर्ति भारतीय उच्चायोग, लंदन को सौंपी गई और भारत वापस लाई गई ।

9. संरक्षण और आधुनिक चुनौतियाँ

9.1 राणा प्रताप सागर बांध का प्रभाव

1950 के दशक में चम्बल नदी पर राणा प्रताप सागर बांध के निर्माण ने बाडौली के परिवेश को हमेशा के लिए बदल दिया।

  • पर्यावरण: जो मंदिर कभी घने जंगलों के बीच थे, वे अब एक विशाल जलाशय और आधुनिक शहर (रावतभाटा) के निकट हैं। बांध के कारण क्षेत्र में नमी बढ़ी है, जो बलुआ पत्थर के लिए दीर्घकालिक खतरा हो सकती है।
  • पहुँच: बांध और परमाणु ऊर्जा संयंत्र के कारण सुरक्षा प्रतिबंधों के बावजूद, अब यह स्थल पर्यटकों के लिए अधिक सुलभ हो गया है। पहले जहाँ केवल साहसी यात्री (जैसे टॉड) ही पहुँच पाते थे, अब यह एक पर्यटन स्थल है ।

9.2 ए.एस.आई. (ASI) का प्रबंधन

वर्तमान में, यह परिसर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI), जोधपुर मंडल के संरक्षण में है। ए.एस.आई. ने चारदीवारी का निर्माण, बगीचों का रखरखाव और टूटी हुई संरचनाओं को सहारा देने का कार्य किया है। साइट को “अच्छी तरह से बनाए रखा” (well maintained) माना जाता है और यहाँ कोई प्रवेश शुल्क नहीं है, जिससे इसका शांत और गैर-व्यावसायिक वातावरण बना हुआ है ।

तथापि, कुछ मंदिरों (जैसे महिशसुरमर्दिनी) में अभी भी सक्रिय पूजा-अर्चना होती है, जिससे संरक्षण और धार्मिक अधिकारों के बीच एक नाजुक संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता होती है। मूर्तियों पर सिंदूर और तेल का लेप उनके मूल कलात्मक विवरणों को छिपा देता है और पत्थर को नुकसान पहुँचा सकता है ।

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