5000 करोड़ का ‘डिजिटल डकैती’ मॉडल; ‘लाइक-सब्सक्राइब’ के नाम पर कैसे खाली हो रहे हैं बैंक खाते? पढ़िए ठगी की पूरी ‘इन्साइड स्टोरी’

Highlights
  • ● 'ताजमहल कहां है?' जैसे आसान सवालों से शुरू होता है खेल, और खत्म होता है जीवनभर की जमा-पूंजी गंवाने पर
  • ● इन्फ्लुएंसर्स की रील और टेलीग्राम के स्क्रीनशॉट्स का वो सच, जो आपको जानना जरूरी है

भारत में बेरोजगारी और ‘घर बैठे पैसे कमाने’ की चाहत ने एक ऐसे संगठित अपराध को जन्म दिया है, जिसका टर्नओवर अब 5000 करोड़ रुपये को पार कर चुका है। यह स्कैम इतना शातिर है कि इसमें आईआईटी के छात्र से लेकर रिटायर्ड बैंक कर्मचारी तक फंस रहे हैं। हमारी पड़ताल में सामने आया है कि यह गिरोह केवल तकनीक का नहीं, बल्कि मानव मनोविज्ञान (Human Psychology) का इस्तेमाल करता है।

इस पूरे स्कैम का Modus Operandi (काम करने का तरीका) किसी हॉलीवुड फिल्म की स्क्रिप्ट से कम नहीं है। पेश है इस सिंडिकेट की परत-दर-परत रिपोर्ट:


1. जाल बिछाना: ‘छोटा निवेश, बड़ा शिकार’ (The Bait)

स्कैमर्स सबसे पहले एक बेहद साधारण और सस्ती वेबसाइट बनाते हैं, जिस पर मुश्किल से 1000-2000 रुपये का खर्च आता है। इनकी पूरी टीम मिलकर कुछ लाख रुपये का ‘फंड’ इकट्ठा करती है, जिसे वे ‘हंस को फंसाने के लिए दाना’ (Bait Money) की तरह इस्तेमाल करते हैं।

  • बचकाने सवाल: शिकार को फंसाने के लिए वेबसाइट पर बेहद आसान सवाल पूछे जाते हैं। जैसे— “ताजमहल कहां स्थित है?” या “नीचे दिए गए रंगों में लाल रंग कौन सा है?”
  • इंस्टेंट रिवॉर्ड: सही जवाब देते ही यूजर के वॉलेट में 49 रुपये से लेकर 150 रुपये तक क्रेडिट कर दिए जाते हैं। सबसे बड़ी बात, शुरुआत में आपको पैसे निकालने (Withdrawal) की पूरी छूट दी जाती है। यह पहला कदम है जब यूजर सोचता है— “अरे वाह! यह तो सच में पैसे दे रहे हैं।”

2. आदत डालना: ‘भरोसे की नींव’ (The Conditioning)

एक बार जब आप उनके जाल में आ जाते हैं, तो अगले 2 से 3 दिनों तक आपको ‘टास्क’ दिए जाते हैं। ये टास्क होते हैं— गूगल मैप पर रिव्यू देना, यूट्यूब वीडियो लाइक करना या इंस्टाग्राम पेज फॉलो करना।

  • हर रिव्यू का आपको 50 से 150 रुपये तुरंत मिलता है।
  • जब 2-3 दिन में आपके खाते में 1000-1500 रुपये आ जाते हैं, तो आपका दिमाग तार्किक सोचना बंद कर देता है। आप सोचते हैं, “इतनी बड़ी-बड़ी कंपनियां हैं, एक रिव्यू का 50 रुपये तो दे ही सकती हैं।” यहीं आप सबसे बड़ी गलती करते हैं।

3. गियर बदलना: ‘वीआईपी’ ग्रुप और क्रिप्टो का भ्रम (The Switch)

अब स्कैमर्स आपको नॉर्मल प्लेटफॉर्म से हटाकर एक ‘VIP Telegram Group’ या किसी एन्क्रिप्टेड चैट ऐप पर शिफ्ट कर देते हैं।

  • फेक स्क्रीनशॉट्स का मायाजाल: इस ग्रुप में आपको सैकड़ों लोग (जो असल में बॉट्स या गिरोह के ही सदस्य होते हैं) हर मिनट 50 हजार से 1 लाख के मुनाफे का स्क्रीनशॉट भेजते हुए दिखेंगे।
  • क्रिप्टो ट्रेडिंग: अब आपसे कहा जाता है कि “रिव्यू टास्क खत्म हो गए हैं, अब हम क्रिप्टो/ट्रेडिंग करेंगे।”
  • पहला दांव: शुरुआत में केवल 1000 से 1500 रुपये निवेश करने को कहा जाता है। भरोसा पक्का करने के लिए आपको तुरंत 1.5 गुना या 2 गुना पैसा वापस भी लौटा दिया जाता है। अब शिकार पूरी तरह से लालच की गिरफ्त में होता है।

4. चक्रव्यूह: ‘निकलने के सारे रास्ते बंद’ (The Trap)

अब खेल का सबसे खतरनाक हिस्सा शुरू होता है। आपको 3000 से 5000 रुपये का निवेश करने को कहा जाता है। जैसे ही आप यह पैसा भेजते हैं, विथड्रॉल रोक दिया जाता है।

  • नियमों का हवाला: बताया जाता है कि आपने “गलत कोड” डाल दिया या “सर्वर फ्रीज” हो गया। पैसे निकालने के लिए आपको ‘3 टास्क’ का एक सेट पूरा करना होगा।
  • रिकवरी का लालच: आप सोचते हैं, “पिछले 2 दिनों में इन्होंने सब पैसा प्रॉफिट सहित वापस किया है, मैं बेवजह शक कर रहा हूं।” इसी भ्रम में आप रिकवरी के चक्कर में 5,000, फिर 30,000 और अंत में 1 लाख रुपये तक जमा कर देते हैं।
  • इसकी कोई सीमा नहीं है। 5-6 लोग बैठकर डिसाइड करते हैं कि किस बकरे से कितना पैसा हलाल करना है। ज्यादातर लोग 10 हजार से 50 हजार के बीच लुटते हैं, लेकिन कइयों ने लाखों गंवाए हैं।

5. पुलिस जांच की चुनौतियां: ‘किराये के खाते’ (Mule Accounts)

जब लाखों गंवाने के बाद पीड़ित पुलिस के पास जाता है, तो हाथ कुछ नहीं लगता।

  • असली अपराधी गायब: पुलिस उन बैंक खातों को ट्रेस करती है जिनमें आपने पैसे भेजे थे। जांच में पता चलता है कि ये खाते रिक्शा चालकों, मजदूरों, गरीब छात्रों या गांव के सीधे-सादे लोगों के हैं।
  • म्यूल अकाउंट्स (Mule Accounts): स्कैमर्स इन गरीब लोगों के खाते कुछ हजार रुपये कमीशन देकर ‘किराये’ पर लेते हैं। असली अपराधी क्रिप्टो और विदेशी सर्वर के जरिए पैसा ट्रांसफर कर गायब हो जाते हैं। असली मास्टरमाइंड अक्सर देश के बाहर (दुबई, चीन, दक्षिण पूर्व एशिया) बैठे होते हैं।

6. इन्फ्लुएंसर्स का काला सच: ‘विश्वास का व्यापार’

इस स्कैम को बढ़ावा देने में सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स की बड़ी भूमिका है।

  • छोटे इन्फ्लुएंसर्स (10k-1L फॉलोवर्स): छोटी और नई स्कैम वेबसाइट्स को प्रमोट करते हैं।
  • बड़े इन्फ्लुएंसर्स (1L-Millions): बड़े ऐप्स और कथित ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म्स का प्रचार करते हैं।
  • हैरानी की बात यह है कि कुछ बड़े मीडिया चैनल्स और वेरीफाइड पेजों ने भी चंद पैसों के लिए ऐसे फ्रॉड ऐप्स को प्रमोट किया है।

जनहित में चेतावनी: सोशल मीडिया पर किसी के फॉलोवर्स की संख्या उसकी ईमानदारी का सबूत नहीं है। इंटरनेट पर ‘फ्री मनी’ जैसा कुछ नहीं होता। अपनी गाढ़ी कमाई को लुटेरों के हवाले न करें।

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