(विचार / विश्लेषण)

राधारमण शर्मा
(पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता)
प्रकृति की संरचना जिस प्रकार पांच तत्वों से मिलकर हुई है, उसी प्रकार एक सशक्त समाज की संरचना में भी पांच अक्षर “समरसता” और उसके भाव की महत्वपूर्ण भूमिका है। हमारा देश भारत विविधताओं से पूर्ण, अनेकता में एकता का भाव रखने वाला एक महान राष्ट्र है। हमारे यहां भाषा, जाति, धर्म, संस्कृति और वेशभूषा में विविधता होते हुए भी एकता विद्यमान है। यही हमारी सांस्कृतिक विरासत की खूबसूरती और राष्ट्रीय पहचान है।
समरसता के मायने: मन, वचन और कर्म में एकरूपता
मानवीय मूल्यों में समरसता का स्थान अहम है। समाज में समरस भाव के मायने हैं—समान रस या उसके भावों से युक्त होना। भावों और विचारों में समानता, सामंजस्य और एकरूपता, यह सब सामाजिक संदर्भों में इसका निश्चितार्थ है।
समाज के सभी वर्गों के बीच समानता और सौहार्द हो, सभी वर्ग, जाति, धर्म, पंथ, संप्रदाय और लिंग के लोग बिना किसी ऊंच-नीच और भेदभाव के एक-दूसरे को समान समझें—यही सच्ची समरसता है। सामाजिक समरसता को स्थापित करने के लिए जरूरी है कि समाज में जातिगत भेदभाव, अस्पृश्यता जैसी कुरीतियों का अंत हो, तभी समतामूलक, समरस और सशक्त समाज की परिकल्पना साकार हो सकती है। उदारमना व्यक्ति संपूर्ण विश्व में ही परिवार का भाव रखते हैं। मन, वचन, वाणी, कर्म और क्रिया में एकरूपता ही समरसता का लक्षण है। समरसता सामाजिक अवधारणा के साथ-साथ एक भावनात्मक, दार्शनिक और सांस्कृतिक चेतना का पर्याय भी है।
चुनौतियाँ: तुष्टिकरण और विघटनकारी शक्तियाँ
समरसता की राह में कुछ चुनौतियां भी हैं। देश में ‘धर्मनिरपेक्षता’ की आड़ में तुष्टिकरण की राजनीति और विघटनकारी शक्तियाँ सामाजिक समरसता को चुनौती दे रही हैं। विविधता कभी-कभी विघटन और सामाजिक विषमता का कारण बन जाती है। ‘समरसता’ ही एक ऐसा माध्यम है जिससे इस पर आसानी से अंकुश लगाया जा सकता है।
संघ का उद्देश्य: संगठित और सुसंस्कारित राष्ट्र
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मूल उद्देश्य एक संगठित, समरस और सुसंस्कारित राष्ट्र का निर्माण करना रहा है। संघ की शाखाओं में स्वयंसेवकों को अनुशासन, समरसता, सेवा तथा राष्ट्रभक्ति को बढ़ाने वाली प्रेरणा ही मिलती है, ताकि समाज द्वारा समाज के लिए समर्पित भाव से कार्य किया जा सके। संघ के विविध प्रकल्प समाज के विभिन्न वर्गों को जोड़कर सेवा, अनुशासन, समरसता, सहयोग और राष्ट्रप्रेम को बढ़ावा दे रहे हैं।
‘पंच परिवर्तन’ और बदलता परिदृश्य
संघ ने समयानुकूल अपनी कार्यशैली एवं दृष्टिकोण में परिवर्तन किया है। समाज के बदलते परिदृश्य के अनुरूप संघ ने समाज में “पंच परिवर्तन” के माध्यम से व्यापक और बहुआयामी परिकल्पना की है। जिससे आज और भविष्य के अखंड भारत की सामाजिक चुनौतियों का समाज ‘स्व-बोध’ से समाधान कर सकेगा। पारस्परिक संवाद, शिक्षा, सहभागिता और सेवा कार्यों के माध्यम से जातिगत, पंथ, धर्म और संप्रदाय का भेदभाव समाप्त कर सामाजिक एकीकरण को बल दिया जा रहा है।
धरातल पर बदलाव: सहभोज और एकल विद्यालय
समरसता की दृष्टि से संघ के छह प्रमुख उत्सवों में ‘रक्षाबंधन’ सामाजिक समरसता का प्रतीक है। इस दिन समरसता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से संघ द्वारा वंचित, दलित और जनजातीय वर्गों के बीच जाकर उन्हें शिक्षा, स्वास्थ्य और आत्मनिर्भरता के माध्यम से मुख्यधारा से जोड़ने का कार्य किया जा रहा है।
- एकल विद्यालय: आदिवासी क्षेत्रों में एकल विद्यालयों के माध्यम से जनजातीय बच्चों को आधुनिक एवं संस्कारित शिक्षा प्रदान की जा रही है, जिससे सामाजिक समरसता को मूर्त रूप मिल रहा है।
- सहभोज: संघ द्वारा अस्पृश्यों के साथ ‘सहभोज’ के कार्यक्रम के माध्यम से वर्ण व्यवस्था और ऊंच-नीच की असमानता को दूर करने के लिए व्याख्यान और कार्यशाला के जरिए सामाजिक जनजागरण किया जा रहा है।
निष्कर्ष: इस राष्ट्र यज्ञ में समाज के सभी समुदायों को एकजुट होकर अखंड भारत के निर्माण में योगदान देना है। इसमें प्रत्येक नागरिक राष्ट्र के प्रति समर्पित हो और सभी धर्म, पंथ, संप्रदाय, भाषा व संस्कृति के लोग समरसता के सूत्र में एक साथ चलें और अखंड विकसित भारत का निर्माण करें।
