संपादकीय नोट: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक डॉ. मोहन राव भागवत के हालिया बयानों और संघ के शताब्दी वर्ष के संकल्पों पर वरिष्ठ पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता श्री राधारमण शर्मा ने गहन समीक्षा की है। उनका यह लेख संघ की समावेशी सोच और ‘हिंदुत्व’ की व्यापक परिभाषा को स्पष्ट करता है।
(विचार / विश्लेषण)

राधारमण शर्मा
(पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता)
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉक्टर मोहन राव भागवत की मणिपुर हिंसा के बाद पहली यात्रा से पूर्व यह बयान आया कि “हिंदुत्व सीमाओं में बंधा नहीं, बल्कि समावेशी है।” यह बयान संघ के सामाजिक समरसता के विराट स्वरूप को दर्शाता है।
यदि मुस्लिम और ईसाई इस देश की पूजा करें, भारतीय संस्कृति का पालन करें और अपनी परंपराएं व रीति-रिवाज कायम रखते हुए राष्ट्र के प्रति आस्था रखें, तो वे भी हिंदू हैं। संघ प्रमुख का यह कथन स्पष्ट करता है कि भारत को अलग से ‘हिंदू राष्ट्र’ घोषित करने की जरूरत नहीं है। यहां रहने वाला और भारतीय संस्कृति को मानने वाला प्रत्येक व्यक्ति, चाहे वह किसी जाति, पंथ, धर्म और संप्रदाय का हो, वह अपने आप में ‘हिंदू’ है। यह परिभाषा अपने आप में बहुत गहरे मायने रखती है।
शताब्दी वर्ष: राष्ट्र निर्माण के नए संकल्प
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने सौ वर्ष पूर्व राष्ट्र निर्माण के जो ध्येय तय किए, उस पर वह विश्व पटल पर खरा उतरता दिख रहा है। शताब्दी वर्ष पर संघ देश और समाज को नई दिशा देने के लिए और सामाजिक परिवर्तन करने के संकल्प को साकार करने के लिए विशेष जोर दे रहा है। इसके तहत मुख्य बिंदु हैं:
- सामाजिक सद्भाव
- परिवार जागरण
- नागरिक अनुशासन
- आत्मनिर्भरता
- पर्यावरण संरक्षण
हिंदुत्व: धर्म नहीं, जीवन पद्धति
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को प्रायः हिंदूवादी संगठन के रूप में देखा जाता रहा है, जबकि भारतीय सनातन संस्कृति की आत्मा सामाजिक समरसता के भाव “वसुधैव कुटुम्बकम्” पर आधारित है। संघ प्रमुख ने मणिपुर यात्रा से पूर्व और हाल ही बेंगलुरु में साफतौर से कहा कि “ईसाई और मुसलमान भी संघ में शामिल हो सकते हैं।”
उनका यह कथन नए भारत, विकसित भारत और संतुलित भारत की सोच को दर्शाता है। संघ में मुस्लिम, ईसाई सहित सभी धर्म और संप्रदाय के लोगों का स्वागत उसकी व्यापक सोच का परिचायक है। उसके प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए।
भारतीय दर्शन में धर्म का अर्थ संप्रदाय नहीं, बल्कि जीवन-मूल्यों का आधार है। संघ के लिए हिंदुत्व किसी धर्म विशेष का नाम नहीं, बल्कि जीवन जीने की वह पद्धति है जिसमें समरसता, सह-अस्तित्व, करुणा और राष्ट्रनिष्ठा का समावेश है।
समरसता का अर्थ: भारतीयता
समरसता का अर्थ भारतीयता है, अर्थात् भारत की संस्कृति, परंपरा, इतिहास, संवेदना और जीवनशैली से आत्मीय जुड़ाव। हिंदू को लेकर संघ की अपनी विशिष्ट धारणा और परिभाषा है। उसके अनुसार देश में रहने वाले सभी लोग हिंदू ही हैं, भले ही उनका संप्रदाय और उनकी उपासना पद्धति कुछ भी हो।
यह एक शाश्वत सत्य भी है कि इस देश में रहने वाले समस्त लोगों के पूर्वज हिंदू ही थे। इसलिए संघ का यह मानना कि वह देश के प्रत्येक नागरिक को हिंदू के रूप में देखता, मानता और संबोधित करता है, गलत नहीं है। संघ यह मानता है कि भारत में रहने वाले सभी लोग, चाहे वे किसी भी पंथ या विश्वास से जुड़े हों, भारत के सांस्कृतिक उत्तराधिकारी हैं। इसीलिए वे भारतीय हैं और इस दृष्टि से हिंदू हैं।
सांस्कृतिक अवधारणा और राजनीति
संघ की दृष्टि में ‘हिंदू’ शब्द धार्मिक पहचान से अधिक एक सांस्कृतिक अवधारणा है। यह भारतीय जीवन का पर्याय है, जो समानता, सहिष्णुता और एकात्मता में विश्वास करता है।
दूसरी ओर, राजनीति को लेकर देश में समाज को जाति, धर्म और भाषा के आधार पर बांटने का जो जहर भरा जा रहा है, उससे राष्ट्र की समरसता को गहरी चोट पहुँच रही है। संघ का उद्देश्य ऐसी विभाजनकारी मानसिकता के प्रतिरोध में खड़ा होना है। संघ प्रमुख का राष्ट्र को लेकर यह चिंतन हर वर्ग को विश्वास दिलाता है कि राष्ट्र की आत्मा किसी संकीर्ण धार्मिक पहचान में नहीं, बल्कि साझा सांस्कृतिक चेतना में है। संघ के लिए राष्ट्र ही सर्वोच्च है।
मतभेद हो सकते हैं, मनभेद नहीं
समरसता के नए स्वरूप में धर्मनिरपेक्षता नहीं, बल्कि धर्मसम्मतता है। ऐसी समरसता जो सभी मतों का सम्मान करती है। समग्र भारतीय समाज की एकता का लक्ष्य और संदेश उस भारत की परिकल्पना है, जिसमें मतभेद तो हो सकते हैं, पर मनभेद नहीं।
भारतीय सभ्यता ने विविध रूपों में विकसित होकर अनेक धर्मों और संप्रदायों को अपनाया है। सब जाति, धर्म, और संप्रदाय में समरसता का समावेशी भाव राष्ट्र की एकता का आधार बन सकता है। यदि संघ का उद्देश्य हिंदुओं को संगठित करना है, तो इसका अर्थ यही है कि वह सभी भारतीयों को संगठित करके एक सशक्त राष्ट्र की परिकल्पना कर रहा है।
निष्कर्ष संघ प्रमुख ने समरसता की नई परिभाषा देते हुए अपने विरोधियों और आलोचकों की ओर मित्रता का हाथ बढ़ाया है। संघ कार्यक्रमों में सभी संप्रदायों को आमंत्रण एक ऐसी सकारात्मक पहल है, जिसका व्यापक स्तर पर स्वागत भी होना चाहिए। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सामाजिक समरसता की यह वृहत सोच इक्कीसवीं सदी के भारत को आर्थिक, तकनीकी महाशक्ति बनाने के साथ-साथ सामाजिक, मानसिक और सांस्कृतिक एकता को भी मजबूत बनाएगी।
