शासन का ‘विऔपनिवेशीकरण’: PMO अब सत्ता का केंद्र नहीं, कहलाएगा ‘सेवा तीर्थ’; राजभवन से भी हटा ‘राज’, अब ‘लोक भवन’ के नाम से होगी पहचान

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(विशेष संवाददाता / लाइव सच)

नई दिल्ली: भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में यह केवल नाम बदलने की घटना नहीं है, बल्कि यह शासन की मानसिकता (Mindset of Governance) को बदलने का एक क्रांतिकारी प्रयास है। प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO), जो दशकों से भारत में ‘सत्ता के सर्वोच्च केंद्र’ का पर्याय रहा है, अब एक नई पहचान के साथ ‘सेवा तीर्थ’ (Seva Teerth) के रूप में जाना जाएगा।

सरकार द्वारा उठाए गए इस कदम को औपनिवेशिक मानसिकता (Colonial Mindset) को मिटाने और प्रशासन को जनता के प्रति जवाबदेह बनाने की दिशा में अब तक का सबसे बड़ा सांकेतिक सुधार माना जा रहा है।

1. ‘सेवा तीर्थ’: प्रधान सेवक की अवधारणा का विस्तार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 में पदभार संभालते ही खुद को ‘प्रधानमंत्री’ के बजाय ‘प्रधान सेवक’ कहा था। नए PMO परिसर का नाम ‘सेवा तीर्थ’ रखना उसी विचार की परिणति है।

  • गहराई से समझें: ‘तीर्थ’ शब्द भारतीय संस्कृति में पवित्रता और निस्वार्थ भाव का प्रतीक है। सरकारी दफ्तर को ‘तीर्थ’ कहकर यह संदेश दिया गया है कि यहाँ आने वाली फाइलों को महज कागज न समझा जाए, बल्कि उन्हें जनता के जीवन को बदलने का माध्यम माना जाए। यह ‘एग्जीक्यूटिव एन्क्लेव’ (Executive Enclave) का हिस्सा होगा।

2. केंद्रीय सचिवालय अब ‘कर्तव्य भवन’ लुटियंस दिल्ली की पहचान रहे केंद्रीय सचिवालय (Central Secretariat) का नाम बदलकर ‘कर्तव्य भवन’ (Kartavya Bhavan) किया गया है।

  • संदर्भ: इससे पहले ‘राजपथ’ का नाम बदलकर ‘कर्तव्य पथ’ किया गया था। अब उस पथ के दोनों ओर स्थित सचिवालय को ‘कर्तव्य भवन’ नाम देकर यह स्पष्ट किया गया है कि अधिकारी यहाँ ‘हक’ (Right) जताने नहीं, बल्कि अपना ‘कर्तव्य’ (Duty) निभाने आते हैं। यह ‘अधिकार भाव’ से ‘कर्तव्य भाव’ की ओर जाने का बदलाव है।

3. राजभवन से ‘लोक भवन’: सामंतवाद का अंत स्वतंत्रता के 75 साल बाद भी राज्यों में राज्यपालों के आवास को ‘राजभवन’ (Royal Palace) कहा जाता था, जो ब्रिटिश काल के ‘गवर्नमेंट हाउस’ का हिंदी अनुवाद था। इसमें ‘राज’ शब्द शासक होने का बोध कराता था।

  • बदलाव: इसे ‘लोक भवन’ (Lok Bhavan) नाम देकर यह संदेश दिया गया है कि लोकतंत्र में कोई ‘राजा’ नहीं है, सब कुछ ‘लोक’ (जनता) का है। यह संवैधानिक पद को जनता के और करीब लाने की पहल है।

विशेषज्ञों की राय राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, “इमारतों के नाम बदलना प्रतीकात्मक लग सकता है, लेकिन इसका मनोवैज्ञानिक असर गहरा होता है। जब कोई अधिकारी ‘सचिवालय’ के बजाय ‘कर्तव्य भवन’ में प्रवेश करेगा, तो अवचेतन मन में उसे अपनी जिम्मेदारियों का अहसास होगा। यह ‘रूलर’ (Ruler) से ‘सर्विस प्रोवाइडर’ (Service Provider) बनने की यात्रा है।”

सेंट्रल विस्टा का हिस्सा यह बदलाव नए संसद भवन और सेंट्रल विस्टा पुनर्विकास परियोजना (Central Vista Redevelopment Project) के व्यापक विजन का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य भारत के प्रशासनिक ढांचे को आधुनिक और भारतीय मूल्यों के अनुरूप बनाना है।

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